Monday, 5 October 2020

ये दौर स्त्री वर्ग के लिए अंधकारमय युग के नाम से इतिहास में अंकित किया जायेगा।


 भारत दुनियाँ का सबसे बड़ा लोकतांत्रिक देश है इसके बावजूद भी भारतीय महिलाओं की स्थिति कैसी है ये किसी से छुपा नही है। भारत जैसे देश में महिलाओं की दयनीय स्थिति को आज के परिपेक्ष्य में अनदेखा नहीं किया जा सकता। आए दिन यौन शोषण, सामूहिक बलात्कार और घरेलू हिंसा जैसे जघन्य अपराध स्त्रियों के विरुद्ध होते हैं जो बहुत कम सामने आ पाते हैं और जो सामने आते हैं वो राजनीतिक पार्टियों और भ्र्ष्ट तंत्र की बलि चढ़कर गहरे गड्ढे में दब जाते हैं। स्त्रियों के प्रति विभेदी नीतियां, छल-कपट, घृणित मानसिकता और दोहरे चरित्र सब प्रत्यक्ष हैं। 

अपराध के विकृत रूप और दोगली नीतियां आज जघन्य अपराधों के पोषक बनते जा रहे है। महिलाओं के विरुद्ध बढ़ रहे अपराधों में बेमुरव्वत लोग, चाटुकार नेता, भ्र्ष्ट पुलिस और बिकी हुई कानून व्यवस्था, पैसा और पॉवर के दम पर खेले गए कानूनी दांव-पेंच, सोयी हुई जनता, सरकारों का प्रश्रय और यहां तक कि मुख्यधारा मीडिया ने भी इसका ग्राफ बढ़ाने में कोई कोर कसर नही छोड़ी है।

इस देश की स्त्रियों ने खूब संताप एवं त्रासदियों को झेला है और यदि अब भी सुप्तावस्था में रही तो कोई सुरक्षा कवच होगा, कोई चश्मदीद गवाह होगा, कोई सबूत या फिर कोई स्त्री मुव्वकिल होगी भी या नहीं, इसकी उम्मीद भी नहीं की जा सकती।

प्राचीनकाल से प्रचलित समाज की दोहरी नीतियां और सामाजिक व्यवस्थाओं ने महिला एवं पुरुष के बीच की खाई को सदैव गहरा करने का ही काम किया है जिसे पाटना अब बहुत जरूरी हो गया है और ये सही समय भी है।


                                                                    हे पुरुष!

तुम क्यों दिखाते हो अपने आप को श्रेष्ठ और स्वछंद? क्यों दिखाते हो कि हो तुम दबंग! क्यों देते हो नारीवादी होने का छद्म नारा? क्यों समानता नही चाहते तुम? क्यों है ये विभेद तुम्हारे संस्कारों में?

पीड़िताओं के लिए भी तुम्हारी न्याय की तुलाओं में असमानताएं हैं। नकली रुआब, झूठे खिताब, जातीय विभेद और सांप्रदायिक रंजिश जैसी  इन कुंठाओं से  उभरकर तुम कब निष्पक्ष रूप अपनाओगे? समानताऐं क्यों नागवार गुजरती हैं तुम्हें? क्यों? क्यों स्त्रियों की स्वतंत्रता देखी नहीं जाती? जब रीढ़ तोड़ते हो, जुबां काटते हो और उनके लिबासों को खूनी धब्बो से लिथड़ा देखकर जो मर्दानी शक्तियों का प्रदर्शन करते हो तब असल में वो मर्दानगी नही बल्कि तुम्हारी बुजदिली के पुख़्ता सबूत पेश कर रहे होते हो। तुम्हारी इन सामाजिक व्यवस्थाओं ने जात-बिरादरी, मर्द-औरत, धौंस, धमकी और ज़ोर जबरदस्ती के साथ छल-कपट से घृणित मानसिकता के नाम पर सम्पूर्ण राष्ट्र को दिग्भ्रमित कर दिया है। तुम कब  झूठे सभ्यताओं और संस्कारों का राग अलापना बन्द कर मानवता की कसौटी पर स्वयं को परख पाओगे?...कब? 

                                                  मुखातिब हो गई हूं मुखौटाई छवियों से!

 योर ओनर! अब मेरी दलीलों को सुनिए!  हां, मैंने ही कहा था कि जुबां काट दें मेरी! मैंने ही हथौड़े दिए हैं इन्हें रीढ़ तोड़ने को! शायद उन दूधमुँही बच्चियों ने भी जो महज़ मुस्कुराती हैं, हाथ पांव हिलती हैं और तुतलाती तक नहीं! उन्होंने भी उकसाया होगा कि उनका ये इंसान से हैवान रेप कर डाले! मुझ जैसी लहुलुहान, नोची-खरोंची और संवेदनशील अंगों में लोहे की रॉड, शीशे और  मोमबततियां घुसेड़ देने पर भी आज कटघरे में खड़ी है और दरवाज़ा खटखटा रही है उस सदन का जो सर्वोपरि न्याय का सूचक है। 

                                                                               हे ईश्वर! 

देखो कितनी लंबी कतार हैं! देखो! देखो हम स्त्रियां इंसाफ लेने आई है! टूटी रीढ़, कटी जुबान और आबरु गंवा कर! गुहार लगा रहीं हैं आंख से पट्टी हटाने की और न्याय के तराजू में समान तुलने की।  कीजिए इंसाफ! कीजिये! या बाँधें रखिये पट्टी झूठे न्याय की।

                                                                        हे नारीयों

उम्मीद छोड़ दो। नही होगा न्याय! नही होगी सुनवाई और ना ही होगा कोई खड़ा, तुम्हारी पक्ष में। तुम्हें

स्वयं के लिए लड़ना होगा। निर्भयता से प्रतिरोध करना होगा और उठाने होंगे कुछ ठोस कदम स्वयं की रक्षा के लिए। 

हम भी देश की बेटियां हैं! हमें भी वाई प्लस सुरक्षा चाहिए। हमें अपराध बोध और अफ़सोस जैसे भावों को तिलांजलि देनी होगी। चौखट लांघ बाहर आना होगा और महिला सुरक्षा के पदों पर भीगी बिल्ली बन बैठी स्त्रियों को नींद से जगाना होगा। ये दुबकने का नहीं बल्कि महिलाओं को बचाने का वक़्त है। जो आज भय से घरों में दुबके बैठे हैं, वो एक बार अवश्य पीड़िताओं की तस्वीरें देखें! फिर अपनी बच्चियों को उसी हाल में सोच कर अपने आप से सवाल करें। शायद मन के किसी कोने में कोई भाव उभर आए और वहशीपन और दरिंदगी के खिलाफ जुबान खुल जाए। नपुंसक वार्तालाप को छोड़कर धरातल पर संघर्षरत होना होगा, नही तो श्मशानों में चिताओं के ढेर होंगे फिर करते रहना प्रलाप।

मैं पूर्व प्रकाशित एक लेख में भी कह चुकी हूँ और आज फिर कह रही हूं

ये दौर स्त्री वर्ग के लिए अंधकारमय युग के नाम से  इतिहास में अंकित किया जायेगा।


Monday, 28 September 2020

पुस्तक समीक्षा

 पुस्तक समीक्षा


एक कप चाय और तुम

लेखक:- सुनील पंवार

सृष्टि प्रकाशन चंडीगढ़,भारत

मूल्य :- 150/-


एक विद्यार्थी द्वारा किसी पुस्तक की समीक्षा करना मेरे ख़्याल में सम्भव नहीं हो पाता क्योंकि, वो साहित्यिक शब्दों से अपूर्ण होता है, फिर भी मैं अपने कुछ शब्द भण्डार से निष्पक्ष समीक्षा करने की कोशिश कर रहा हूँ, आशा है इस कार्य में सफल हो पाऊंगा।

पुस्तक 'एक कप चाय और तुम' वो संग्रह हैं जिसने मुझे बहुत कुछ सिखाया हैं क्योंकि इस कहानी संग्रह में लेखक सुनील पंवार के जीवन के शुरूआती दौर के बारे में बताया गया है कि किस प्रकार से आपके घर की स्थिति दयनीय होती है और आप पॉकेटमनी से पहली बार 'सरिता', 'सरस सलिल', 'गृहशोभा, जैसी मासिक पत्रिकाएं खरीदकर पढ़ते है। आपने कई विकट परिस्थितियों से गुजरते हुए सफलता प्राप्त की है, खासकर इस पुस्तक  के माध्यम से आपने एक बड़े साहित्यकार की भूमिका निभाई है।

पुस्तक में 20 कहानियों को पढ़कर अलग-अलग नजरिये से देखा तो महसूस हुआ कि ये कहानियाँ हमें बहुत कुछ सीखाती।

जब रात के प्रहर में पुस्तक मेरे हाथों में आई तो एक अलग ही ख़ुशी महसूस हुई और उसी समय  9 बजे से अनवरत पढ़ने का सफर शुरू हुआ जो रात्रि 12 बजे तक पूर्ण हो गया। हर कहानी रोचकता, रोमांचक, मार्मिकता से भरी हुई आँखों के सामने प्रतिबिम्ब बनता चला गया। 

 यदि कहानियों की बात की जाए , तो पहली कहानी 'आख़िरी कॉल' बहुत कुछ सवाल करती रही जब तक कहानी का अंत न हुआ। एक के बाद एक दृश्य फ़िल्म की तरह चलते हुए जीवन्त चलचित्र की भाँति चलने लगे।

   कहानी 'भीगी मुस्कान' पढ़कर तो मानो आँखें ही भीग  गयी जब नायिका का प्रेमभाव उमड़कर सामने आता है। प्रेमभाव से भरी हुई यह कहानी हृदय में ख़ास स्थान बनाती है।

  'एक नदी का फ़ासला' कहानी मनोरम दृश्य के साथ प्रस्तुत की गई है। ऐसा प्रतीत होता है, जैसे हम स्वंय कहीं छिप कर नदी के किनारे चित्र बनाते चित्रकार और नायिका को देख रहें है जो अपने खुशहाल गाँव के बिखर जाने के गम में नदी को दोष दे रही है। इस कहानी के अलग-अलग दृश्य मार्मिकता लिए हुए अनोखा संगम बना रहे है और जब नायक अपनी पेंटिंग उस नायिका को देता है तब ये खूबसूरत दृश्य पाठक मन को हर्षित कर देता है। कहानी में प्रकृति सौंदर्य को लेखक ने बेहतरीन ढंग से प्रस्तुत किया है।

कहानी 'इश्क़ ऑनलाइन' एक सीख देती है कि अत्याधिक ऑनलाइन रहना और सोशल मिडिया प्रेम का परिणाम कितना घातक सिद्ध हो सकता है। लेखक ने इस कहानी को शैलीबद्ध करके भावी पीढ़ी को नई दिशा देने का प्रयास किया है।

'इन्तहा' कहानी तब मार्मिक बन जाती है जब नायिका अपने प्रियतम का इंतजार करती है। नायिका के मन की व्याकुलता और विरहाग्नि आँखों से अश्क़ बहाने पर विवश कर करती हुई ह्रदयतल तक पहुँच जाती है।

 पुस्तक का शीर्षक एवं अतिमहत्वपूर्ण कहानी 'एक कप चाय और...तुम'! रोमांचक अल्फ़ाज़ों से पूर्ण, दिल को छू लेती है और पाठक को आनन्द की अनुभूति कराती है।

'बन्द कॉटेज' एक रहस्यमयी कहानी है जो अंत में हकीकत  उजागर कर देती है। लेखक द्वारा शब्दों की पकड़ मजबूत होने की वजह से हम ऊब नहीं पाते बल्कि निरन्तर पढ़ते जाते है।

पुस्तक में चार भाग 'सुखिया' कहानी के हैं जो लेखक के अपने पारिवारिक जीवन से जुड़े हुए हालातों को उजागर करती है एवं वर्तमान संदर्भों से जोड़ती है। 'सुखिया' भाग की सभी कहानियाँ अस्पृश्यता,जातिवाद, छुआछूत और भेदभाव के बारे में बताती है जो सामाजिक हालातों को बयाँ करतीं है। सुखिया द्वारा उस समय की सामाजिक व्यवस्थाओं पर सवाल उठाये गए है। 

कहानी 'एक खनकती आवाज' का तो कहना ही क्या! इस कहानी में हिन्दी भाषा के साथ-साथ मारवाड़ी बोली के शब्द भी पढ़ने को मिलते हैं, लेखक ने वर्ष 2007 की रात को घटित अपनी एक वास्तविक घटना को कलमबद्ध जिसे  शायद लेखक कभी भुला नहीं पाए। आत्मिक प्रेम भाव से परिपूर्ण ये कहानी अंतर्मन को छू लेती हैं।

'बिना पते की चिट्ठियाँ' कहानी के मर्म में बचपन छिपा हुआ है। एक माँ की ममता को दर्शाया है। लेखक ने ऐसा मार्मिक चित्रण प्रस्तुत किया जो किसी को भी भाव विभोर कर देगा। इसका भाव बेजोड़ है।

इसी के साथ लेखक ने स्व. डॉ.मिथिलेश कुमारी मिश्र को 'छँटता कोहरा' कहानी समर्पित की है जो एक वास्तविक व अनूठा यात्रा वृत्तांत है। जो इसका मर्म समझ जाए उसके ह्रदय में छाप छोड़ दे क्योंकि एक बहुमुखी प्रतिभा के धनी किसी शख्सियत को खोने का गम क्या होता है वो तो वो ही समझ सकता है जिसने उसे खोया है।

'चुनावी मुद्दा' में लेखक ने राजनेताओं के चुनावी भाषण और खोखले वादों के बारे में बताया है कि किस प्रकार भोली-भाली जनता को अपने चुनावी भाषणों से बहकाते है। चुनावी मुद्दों की बातों को उजागर करना हर किसी के बस की बात नही है परंतु, लेखक ने हकीकत को उजागर करने का भरकस प्रयास किया है। इसी कहानी में दलित व पिछड़ी बस्तियों के जीवन्त चित्रण देखने को मिलता है।

 'चौकीदार' एक मासूम की जिंदगी के बारे में बताती है इसमें लेखक द्वारा कम शब्दों में बहुत कुछ बताने का प्रयास किया है और वो इसमें सफल होते नज़र आ रहे हैं। कहानी में मार्मिकता भी है और डर भी। मासूम से सवाल भी हैं जिनका जवाब दे पाना मुश्किल है। 

 कहानी 'वो रात' कहने को तो दो शब्द हैं पर लेखक ने जिस एक रात का भयावह मंजर दिखाने का प्रयास किया है वो हर किसी को झकझोर कर रख देने की क्षमता रखता है।कहानी के शब्द और भावार्थ नए-नए सीखने को मिलते है और ये सकारात्मकता की ओर बढ़ने की पहल करती हुई एक मार्मिक कहानी बन पड़ती है।

 'डायरी 2001' में लेखक की बेजोड़ कृति हैं। सौलह वर्ष की उम्र में लिखी वो डायरी जिसमें दिल के जज्बात और कुछ अल्फ़ाजों को साझा किया है, लड़कपन के प्रेम को दर्शाकर सूखे पड़े तालाबों में मानो जल भर दिया हो। कहानी लड़कपन के प्रेम से परिचय तो करवाती ही है साथ ही साथ युवा मन की हसरतों की आग को हवा भी देती है। इस कहानी का सृजन अनूठा व निराला है।

 अंतिम कहानी 'सच का आईना' पढ़कर ह्रदयद्रवित हो जाता है, कोई कठोर दिल वाला ही होगा जिसके आँखों से एक अश्क़ की बून्द भी न आई हो। लेखक किस प्रकार से अपने जीवन में जूझते रहना पर फिर भी हिम्मत न हारना और वो कर दिखाना जो हर किसी के बस की बात नहीं हैं। एक सकारात्मक संदेश देती है।

 पुस्तक 'एक कप चाय और तुम' का अगर सम्पूर्ण सारांश कहें तो हर कहानी को लेखक ने अपने जज्बे और लगन से एक साहित्यकार की भूमिका बखूबी निराले ढंग से निभाई है।

सच कहूँ, तो ये कृति पढ़कर अहसास हो गया कि मार्मिकता, ममता, प्रेम, दर्द, विरह और संवेदनाएं क्या होती है, इन सभी सवालों के जवाब मिलते नज़र आते हैं। हर एक लेखक इतना परिपूर्ण नहीं होता कि अपने हुनर से हर राह आसान कर दे परन्तु, सुनील पंवार में वो काबिलियत, वो जज्बा और दक्षता नज़र आ रही है जो हमें निराश नहीं करती और साहित्य के क्षेत्र में उनमें काफ़ी संभावनाएं नज़र आती दिख रही है।

लेखक सुनील पंवार का मैं शुक्रगुजार रहूंगा जिन्होंने हमें बेजोड़ कृति 'एक कप चाय और तुम' को पढ़ने का मौक़ा दिया। मैं लेखक के उज्ज्वल भविष्य की कामना करता हूँ।।


~ अरविन्द कालमा

   भादरुणा (साँचोर)

        राजस्थान

Wednesday, 6 May 2020

बहस के मुद्दे वैचारिक और तार्किक होने चाहिए ना कि निजी मसले।



पिछले दो तीन दिन से देख रहा हूँ कि सोशल मीडिया पर  दो अलग-अलग विचारधाराओं के लोग, दो अलग-अलग व्यक्तियों के निज़ी जीवन पर प्रहार करते हुए एक ही विषय से सम्बंधित पोस्ट कर रहें हैं। उन बातों में कितनी सच्चाई है ये ना तो पोस्ट करने वाले जानते हैं और ना ही पढ़ने वाले जानना चाहते हैं। पहली पोस्ट जो मैंने देखी वो भाजपा प्रवक्ता श्रीमान संबित पात्रा की पत्नी को लेकर किया गया था जिसमे मज़ाक बनाते हुए लिखा गया कि, " ब्रिटेन में रह रही संबित पात्रा की पत्नी गर्भवती है, और मज़े की बात ये है कि उनसे मिले पात्रा को डेढ़ साल हो चुका है।" दूसरी पोस्ट शाहीनबाग में एक प्रमुख प्रोटेस्टर रहीं सुफ़रा नामक युवती को लेकर किया गया था जो फ़िलहाल जैल में है। इसमें ये दावा किया गया है कि सुफ़रा गर्भवती है और अविवाहित है। इन दोनों ही मामलों में केवल महिलाओं के चरित्र पर ही उँगली उठाई गई है और दोनों ही बातों को विरोधी विचारधारा वाले लोग चटकारे ले-लेकर शेयर कर रहें हैं,पर मुझे ये बात इसलिए अखरती है कि क्या राजनीतिक मतभेदों पर विजय पाने या किसी प्रकार की राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए किसी के निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप आवश्यक है? क्या सिर्फ यही मुद्दे शेष रहें हैं हमारे पास?
सांसारिक मर्यादाओं से बाहर किये गए कृत्य समाज कभी स्वीकार नहीं करता और करे भी क्यों? प्रत्येक व्यक्ति का ये दायित्व है कि वो अपने संस्कारो का सरंक्षण करे और अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखे। लेकिन सवाल यह है कि दूसरों से संस्कारों के पालन की उम्मीद करने वाले लोग खुद कितने संस्कारी है? दुनियाँ में ऐसे अनगिनत मामले हर रोज आतें है पर हम इनका ज़िक्र तक नही करते। क्यों? क्या हम इनका ज़िक्र महज़ इसलिए कर रहें है कि ये दोनों ही लोग राजनीती से सम्बन्ध रखते हैं? भारतीय अभिनेत्री नीना गुप्ता और मशहूर टीवी होस्ट ऑपेरा विन्फ्रे जैसी सेलिब्रिटी भी अविवाहित माँ बन चुकी हैं। ये हमारी  पुरुषप्रधान मानसिकता है कि हम अपने सारे कुकर्मों का दोष केवल नारी पर ही मढ़ देतें है। जो भी लाँछल लगे महिलाओं के सिर लगे। क्या हमने उन पुरुषों का ज़िक्र एक बार भी किया जो इस कुकृत्य में भागीदार रहे? हम स्वछंद है, नियम बनाते हैं, शासन करतें है और अपने दोषों को कमज़ोर पर थोंप देते हैं। यदि एक व्यक्ति का ये कर्तव्य है कि वो अपनी सामाजिक मर्यादा बनाये रखे,तो दूसरे का भी ये दायित्व है कि वो उसकी निजता में बाधा उत्पन्न ना करे।
बहस के मुद्दे वैचारिक और तार्किक होने चाहिए ना कि निजी मसले।
बहरहाल मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि गलत कोई भी हो सकता है, मैं भी और आप भी! ये प्रकृति का सामान्य नियम है कि मनुष्य गलतियों का पुतला है और इंसान का स्वभाव है कि वो अपनी गलतियों से कुछ सीखे और उनका सुधार करे।■■■■■

सुनील पंवार की क़लम से...✍️✍️✍️

Monday, 27 April 2020

क़ानून को रौंदती रुद्र भीड़ का खामियाज़ा भुगत रही देश की अवाम।।

       आलेख                                             सुनील पंवार


ख़ाकसार ने अपना करियर पत्रकारिता से प्रारंभ किया और यही कारण है कि वो राजनैतिक और सामाजिक दोनों विषयों पर अपनी राय बेबाकी से रखता है, वो अलग बात है कि समय-समय पर उसकी आवाज़ को दबाने के भरकस प्रयास किए जाते रहें हैं; पर इतिहास टकराने वालों का लिखा जाता है तलवे चाटने वालों का नही। जीवन के उतारचढ़ाव में रुचियां और व्यवसाय बदलतें रहतें है। ख़ाकसार ने भी भले ही अपना व्यवसाय बदल लिया हो पर उसके अवचेतन में बैठा एक पत्रकार सुषुप्त अवस्था में तो हो सकता है पर मृत कतई नहीं। जब भी पत्रकारिता की बात आती है वो जीवित अवस्था में सक्रिय हो जाता है। लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तम्भ माने गए हैं जिनमें प्रेस एक मजबूत स्तम्भ है, इसे जनता की आवाज़ कहा गया है, लेकिन गतवर्षों से पत्रकारिता एक व्यवसाय मात्र बनकर रह गया है। इस मजबूत स्तम्भ को अब दीमक लग चुकी है और ये पूर्णतः ध्वस्त हो चुका है। पत्रकारिता के गिरते स्तर को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे इसने अवाम का विश्वास खो दिया हैं। सोशल मीडिया पर तो पत्रकार और मीडिया को 'दलाल' और 'भांड' जैसे अशोभनीय शब्दों से सम्बोधित किया जाने लगा है। कोरोना कालखंड में भी मीडिया ने जनता की आवाज़ बनने की बजाय अराजकता फैलाने का काम अधिक किया। इस भयानक महामारी को फैलाने का जिम्मेदार एक विशेष समुदाय को ठहराये जाने का प्रयास किया जाने लगा। जिसकी वजह से न केवल भारत बल्कि पूरी दुनियां में भारत की छवि धूमिल हुई है। तथ्यहीन और झूठी खबरों को न केवल बार-बार प्रसारित किया गया बल्कि उन्हें सच साबित करने का भरकस प्रयास किया गया। इन खबरों की वजह से सरकार और उसकी कार्यप्रणाली पर भी निरंतर प्रश्न उठने लगे।  25 अप्रैल को 'द इकोनॉमिस्ट' ने अपने कवर स्टोरी में एक विशेष समुदाय को बलि का बकरा जाने की इन खबरों के लिए भारत सरकार और सत्ताधारी पार्टी को जिम्मेदार ठहराया जो विश्वगुरु की राह पर अग्रसर भारत के लिए शुभ संकेत नही है।
हाल ही में एक टीवी पत्रकार ने एक राजनैतिक पार्टी की अध्यक्षा के बारे में टिप्पणी करते हुए पालघर (महाराष्ट्र) में भीड़ द्वारा संतो की हत्या को लेकर कुछ सवाल किए गए थे, पत्रकार का व्यवहार किसी भी रूप में पत्रकार जैसा नही था, न भाषा और न ही हावभाव से ही। उससे पहले एक विपक्ष के नेता से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कोरोना से लड़ने के विषय में सवाल-जवाब किये गये थे। पालघर की घटना एक मॉब लिंचिंग थी जो झूठी अफवाह की वजह से हुई थी, जिसे मीडिया के साथ मिलकर, एक पार्टी विशेष के अनुयायियों ने साम्प्रदायिक जामा पहनाने में कोई कसर नही छोड़ी। सौ से ज्यादा आरोपियों की तुरन्त गिरफ्तारी कर ली गई, गिरफ्तार हुए अधिकांश आरोपी भी एक ही पार्टी से संबंध रखते हैं और इनमें से एक भी आरोपी अन्य समुदाय से नही पाया गया।  इस घटना के ठीक दो या तीन दिन बाद उत्तरप्रदेश के एटा में एक परिवार के पाँच सदस्यों की नृशंस हत्या के साथ-साथकर गोरखपुर में भी एक संत की पुलिसकर्मियों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। पालघर की घटना पर शोर मचाने वाले लोग अचानक से चिड़िचुप हो गए।  संतो की हत्या पर बवाल मचाने वाले वही लोग है जिन्होंने अन्य समुदायों की मॉब लिंचिंग के समय खूब आनन्द उठाये थे। तब बस एक ही नीति का अनुसरण किया जा रहा था कि, "तुम्हारे मरे तो हम खुश और हमारे मरे तो आप खुश।" जब देश लोकतंत्र से भीड़तंत्र में तब्दील हो रहा था तब किसी ने आवाज़ नही उठाई, यही कारण है कि हम आज इस स्थिति पर पहुँच चुकें है कि ना हमें पुलिस पर भरोसा है ना न्यायालयों पर। हमें अब सड़क पर ही न्याय चाहिए। हमने जो फसल बोयी थी उसके फल अब तैयार हो चुकें है। रुद्र भीड़ देश के कानून को रौंद रही थी राजस्थान, गुजरात, झारखंड उत्तरप्रदेश के दादरी और बुलन्दशहर की घटनाएं इसका पुख़्ता प्रमाण है कि व्यक्ति कितना संवेदनहीन और क्रूर हो चुका है। आखिर इस गुस्से, इस नफ़रत की वजह क्या है? इसका मूल धार्मिक कट्टरता, और दिन रात चीख-चीख कर परोसी जाने वाली विभेदकारी नीतियों में निहित है जिसका खामियाज़ा हमें लाशों के रूप में उठाना पड़ रहा है। हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए और कानून से कोई भी ऊपर नही होना चाहिए।
अब सवाल ये है कि क्या यही सवाल सत्तापक्ष से नही किये जाने चाहिए? क्या एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए? धार्मिक मसलों के अलावा भी बहुत गम्भीर मसले है जिनसे हमारा ध्यान हटाया जा रहा है या जा चुका है।
 क्या किसी ने पूछा कि नोटबन्दी के दौरान साढ़े तेरह हज़ार करोड़ रुपयों के साथ पकड़े गए महेश शाह का क्या हुआ? पुलवामा की जाँच अब तक क्यों नहीं हो पायी? पुलवामा हमले के बाद एक रिलीफ़ फंड का गठन किया गया था जिसमे देशभर से दान लिया गया था, कितने शहीद परिवारों को वो राशि आवंटित की गई और कितनी? क्या नमस्ते ट्रम्प में एकत्रित जनसमूह की स्वास्थ्य जाँच की गई? गुजरात, मध्यप्रदेश और आगरा में कोरोना ने तबाही मचा रखी है इस पर कोई सवाल क्यों नहीं? रक्षा विभाग से रॉफेल रक्षा सौदे के दस्तावेज कहाँ व कैसे गायब हो गए?  पीएम केयर्स फण्ड की पारदर्शिता के बारे में सवाल क्यों नहीं किया जा रहा? सत्तापक्ष से सवाल करने में इतनी झिझक क्यों?

इसका सीधा सा जवाब है कि सत्तापक्ष से सवाल करने के लिए गुर्दे की जरूरत होती है जो अब मीडिया के पास नही है। बहरहाल वैचारिक और बुद्धिजीवियों ने टीवी डिबेट और समाचार पत्रों का खुले तौर पर बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया है।
अभी भी समय है कि देश के पत्रकार एक जिम्मेदार नागरिक की तरह जनहित के अहम मुद्दों को उठाएं और निष्पक्ष व बेबाक पत्रकारिता का परिचय दें ताकि इस पेशे की गरिमा को बरकरार रखा जा सके।।■■■

सुनील पंवार की क़लम से....✍️✍️

Friday, 24 April 2020

ख़ैर! कोई कमी है तो बताओ।।


       
       
लॉक डाउन ने मानवीय जीवन को नीरस बना दिया है, टीवी ,मोबाइल और न्यूज़पेपर ही वक़्त गुजारने का एक मात्र सहारा रह गया है, लेकिन ऐसा भी नही है कि इस अवधि के दौरान कुछ नया नही हो रहा, बहुत कुछ सीखने को भी मिल रहा है। हाल ही में मैं अपना खाली समय व्यतीत करने के लिए यूट्यूब पर वीडियो देख रहा था कि यकायक मेरे सामने एक वीडियो आ गया जिसे मैंने बड़ी रुचि लेकर देखा। ये वीडियो एक मशहूर कॉमेडी शो का था  ये वीडियो इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि इसमें वर्तमान राजनैतिक स्थिति पर भी तंज कसा गया था।
जब कभी भी अफरा-तफरी का माहौल बनता है, मुझे इस कॉमेडी शो का ये एपिसोड याद आ ही जाता है, जिसमें बॉलीवुड के स्टार रणदीप हुड्डा ने एक चुटकुला ठेठ हरयाणवी भाषा में सुनाया था। हरयाणवी भाषा लिखना तो मेरे लिए आसान नहीं है पर मैं आपको हिंदी में अनुवाद करके जरूर बताऊँगा। मामला कुछ इस तरह था कि एक बार एक बन्दर को शेर के स्थान पर जंगल का राजा नियुक्त किया गया। कुछ ही दिनों बाद उसी जंगल में एक हाथी के बच्चे को शिकारी ने कैद कर लिया। सारे जानवर मिलकर  बन्दर राजा के पास अपनी समस्या लेकर गए और शिकारियों से रक्षा करने की गुहार लगाई। बन्दर राजा ने उनकी समस्या सुनकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाना शुरू कर दिया और मदद का पूरा आश्वासन दिया।
शिकारियों के हमले निरन्तर जारी रहे,और समस्या जस की तस बनी रही।
जब भी जानवर बन्दर राजा के पास अपनी ये समस्या लेकर जाते वो एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाने लगता। जब बार-बार बन्दर राजा के पास जाने के बाद भी इस समस्या का हल नही हुआ तो पेड़ पर उछलकूद करते बन्दर राजा से एक बुज़ुर्ग हाथी ने खीझकर पूछा।
"आपको हमारी समस्या से बार बार अवगत कराने पर भी हमारी समस्या जस की तस है, आपने इसका कोई समाधान अब तक क्यों नहीं किया?"
इस पर बन्दर बोला ने बड़ा ही सरल और तार्किक जवाब दिया। "देखो भाई! तुम्हारा काम हो या ना हो, मेरी भागदौड़ में कोई कमी है तो बताओ?"
देश आज महामारी के भयंकर दौर से गुजर रहा है और पूरा देश इस स्थिति से निपटने में अपना सहयोग दे रहा है। लोग अपना काम काज छोड़कर घरों में क़ैद है। ये सर्वविदित है कि देश में संसाधनों का अभाव है, पुलिस, सफाईकर्मी और डॉक्टरों के पास भी आवश्यक वस्तुओं का नितांत अभाव है, गरीब मजदूर लाचार है और सरकार पूर्ति करने में नाकाम रही है। सरकारें मूल समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय अजीबोगरीब फरमान जारी किए जा रहे हैं। हर कोई अपना श्रेय लेने के चक्कर मे दिख रहें है पर नतीजा अभी तक संतोषजनक नहीं है। समस्याएं जस की तस बनी है।
ख़ैर! नतीज़े कुछ भी हों, क्या फ़र्क पड़ता है! भागदौड़ में कोई कमी है तो बताओ?
सुनील पंवार की क़लम से....✍️✍️

Wednesday, 8 April 2020

नवाब का झूठ, रफ़ुगर की सिरदर्दी


मुझे ठीक से तो याद नहीं है, पर उस समय शायद मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ता था। उन दिनों टीवी देखने का अपना ही एक मज़ा था। टीवी के नाम पर घर वाले मुश्किल से मुश्किल काम भी बोल देते तो उसे भी हम बड़ी आसानी से कर दिया करते थे।
उन दिनों रामायण, नुक्क्ड़, जंगल बुक और विक्रम बैताल जैसे पारिवारिक धारावाहिक दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ करते थे। सबके साथ टीवी देखने का आनन्द ही कुछ और था। देखते ही देखते घर मिनी सिनेमाघर में तब्दील हो जाया करता था और वो भी हाउसफुल।
ख़ैर! मैं इन बातों का ज़िक्र आज क्यों कर रहा हूँ ये एक महत्वपूर्ण सवाल है। आइये थोड़ा बीते समय की सैर कर आतें हैं।
उन्ही दिनों दोपहर में एक धारावाहिक प्रसारित होता था जिसका नाम और कलाकार को अब मुझे याद नहीं है पर कहानी कुछ प्रकार थी, कि एक गप्पी नवाब अक्सर महफिलों में अपने बहादुरी के झूठे किस्से,जो सुनने में असंभव लगते थे, सुनाकर शेख़ी बघारने का आदि था, और उसके लिए उसने वाकायदा अपने किस्सों को रफ़ू करने के लिए रफ़ुगर नियुक्त कर रखा था। रफ़ुगर का काम था कि वो नवाब के झूठे किस्सों को सच का जामा पहनाऐ, ताकि सुनने वालों को वो वास्तविक और सच्चे लगे।
नवाब ने एक दिन शेख़ी बघारते हुए कहा कि एक दिन उसने शेर के सिर पर गोली चलायी लेकिन गोली हाथ से निकली। सुनने वालों को भले ही आश्चर्य हुआ हो पर नवाब के चेहरे पर इस झूठ की शिकन तक नही थी। उसे पता था कि रफ़ुगर सब सम्भाल लेगा।
रफ़ुगर ने बात को तुरंत सम्भाल लिया और बोला कि जब नवाब ने शेर पर गोली चलायी तब शेर सिर खुजला रहा था, इसलिए गोली हाथ में लग गई। रफ़ुगर ने इस झूठे किस्से को चुटकियों में सच साबित कर दिया। श्रोताओं ने तालियों से नवाब का मान बढ़ाया।
आज इतने सालों बाद मुझे इस धारावाहिक का स्मरण हो आना स्वभाविक है। आज भी स्थिति वही है नवाब अपने किस्से सुनाते हैं और रफ़ुगर तरह-तरह के लॉजिक लगाकर, अधिकाधिक जानकारी जुटाकर रफ़ू करने में जुट जातें है और झूठे किस्सों को यथार्थ में बदल देते हैं। श्रोता सत्य होने के भ्रम में तालियों से नवाब का मान बढ़ातें है।
नवाब कर्तव्यपरायण है, उसका कर्तव्य है डींगें हाँकना, उसे यथार्थरूप देना रफ़ुगर की सिरदर्दी है।।
सुनील पंवार की क़लम से.....

Sunday, 5 April 2020

हाशिए पर न्यायपालिका


"अब देश में कानून जैसी कोई चीज नहीं रही, न्यायालय बन्द कर देने चाहिये। पैसे के दम पर हमारे आदेशों को रोका जा रहा है।"
                                      .........जस्टिस अरुण मिश्रा
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा दिया गया वक्तव्य न केवल व्यवस्था बल्कि सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठाता है। ये बयान भले ही किसी भी संदर्भ में दिया गया हो परन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ये पूर्ण प्रासंगिक है। ये प्रथम बार नहीं है जब न्यायालय द्वारा इस प्रकार की टिप्पणी की गई हो। ज्ञातव्य है कि गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायधीशों ने भी सामूहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से अपनी बात रखने का प्रयास किया था। इसी क्रम में जस्टिस चंद्रचूड़ ने भी कहा कि "असहमत होना देशद्रोह नहीं है।" हम किसी विचार पर सहमत या असहमत हो सकतें है परन्तु हमें विचारों का सम्मान करना चाहिए। विगत कुछ वर्षों से असहमति की परिभाषा ही बदल चुकी है और उसे राष्ट्रद्रोह के नाम से नवाज़ा जा चुका है। जो आपकी बात से सहमत नहीं है वो देशद्रोही है।
अखण्ड भारत की परिकल्पना करने वालों ने ही भारत को खण्ड-खण्ड कर दिया है। हिन्दू बनाम मुसलमान, दलित बनाम सवर्ण, गरीब बनाम अमीर और राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही! और ऊपर से देश के जिम्मेदार लोगों के भड़काऊ भाषणों ने तो आग में घी का काम किया ही है।
न्याय के संरक्षकों द्वारा की गई ये टिप्पणियां इस ओर इशारा इंगित करती है कि कुछ तो है जो सही नहीं है।
देश आज मुश्किल दौर से गुज़र रहा है जिससे कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहा है। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी में इज़ाफ़ा हुआ है तो वहीं हत्या, बलात्कार, शोषण, जातीय हिंसा जैसे अपराधों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। आज देश के हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं। लोकतंत्र अब भीड़तंत्र में तब्दील होता जा रहा है। लोगों को न्यायालय और कानून में कोई विश्वास नहीं रह गया है वे अब सड़क पर ही न्याय चाहतें हैं। अब कानून किताबों में बंद शब्द मात्र रह गए हैं।
देश की शिक्षण संस्थानों पर बढ़ते हमलों की घटनाएं, शाहीन बाग और जामियाँ में गोलीबारी, तबरेज़ और पहलू ख़ाँ की भीड़ द्वारा हत्या, दुष्कर्म पीड़िता को सरेआम जलाकर हत्या, गार्गी महाविद्यालय में हुई यौन हिंसा, जेएनयू के हॉस्टल में हिंसा जैसी अनगिनत घटनाओं ने पुलिस और सरकार की कमजोर कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है। लगभग इन सभी घटनाओं में पुलिस ने केवल मूकदर्शक की भूमिका निभाई है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। एक बड़े प्रदेश के स्कूली कार्यक्रम में एक नाटक में भूमिका निभाने वाले चौथी कक्षा के छात्रों को केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन्होंने सरकार द्वारा लागू कानून को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया जिसे राष्ट्र के खिलाफ समझा गया और बच्चों के साथ अपराधियों की भाँति बर्ताव किया गया। ऐसे माहौल में न्यायालय का फिक्रमंद होना वाज़िब है।
मौजूदा समय में लगता है जैसे व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता। रोजगार, भुखमरी, भ्रष्टाचार,शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है। टीवी पर चल रही अनवरत निरर्थक बहस ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। सरकार की मौजूदा नीतियों के खिलाफ दुनियां के प्रमुख समाचार पत्रों ने भारत को लेकर आलोचनात्मक संपादकीय लेख प्रकाशित कियें है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठनों ने भी भारत सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की है। ख़बर तो यहाँ तक आयी है कि कई देशों ने अपने नागरिकों को भारत आने को लेकर यात्रा चेतावनियां जारी कर दी है। माहिलाओं की असुरक्षा के मामले में तो भारत कई पायदान लाँघ चुका है जिससे देश की गरिमा का ह्रास हुआ है और हम इस भ्रम में है कि देश का मान बढ़ रहा है, परन्तु इन सभी मामलों में भारतीय मीडिया सरकार के प्रति पूर्णरूप से नतमस्तक है।
बहरहाल निष्कर्ष ये है कि सर्वशक्तिमान, पूर्णस्वतंत्र न्यायपालिका भी हाशिये पर धकेल दी गई है और न्याय सदन से आने वाले बयानों ने न्यायपालिका की बेबसी को उजागर कर दिया है।
आम आदमी सदियों से मौन है और झूठ का प्रपंच पूरे शोर से रचा जा रहा है।
बहरहाल छुपन-छुपाई का खेल जारी है। मीडिया असल मुद्दों को छुपा रही है, सरकार आँकड़े छुपा रही है।
कहीं दीवार चुन कर गरीबी छिपाई जा रही है तो कहीं नदियों की दुर्गंध छिपाई जा रही है, पर सत्य को कब तक छुपाया जा सकेगा! गड़े मुर्दे जब कभी भी उखड़ेंगे, सड़ी-गली व्यवस्थाओं की दुर्गंध दूर तलक़ पसर जायेगी।।
सुनील पंवार (स्वतन्त्र युवा लेखक)
रावतसर (राजस्थान)

Saturday, 4 April 2020

अघोषित विश्वयुद्ध या सामुहिक आत्महत्या।।

                                       अघोषित विश्वयुद्ध या सामुहिक आत्महत्या।।

आज पूरी दुनिया एक अघोषित विश्वयुद्ध को झेल रही है, जिसमें न कोई हथियार है और ना ही कोई सैनिक! ज्ञातव्य है कि एक अनजान वायरस 'कोरोना वायरस' ने पूरी दुनियां को घुटनों के बल कर दिया है,जिसका अब तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। कोई भी देश इसके कहर से अछूता नहीं रह गया है। चीन के वुहान शहर से शुरू हुई इस महामारी ने सम्पूर्ण विश्व में तीव्र गति से अपने पाँव पसार लिए है।
ये मनुष्य, प्रकृति या विज्ञान, किसी की भी गलती से हुआ हो लेकिन इसने सर्वाधिक मनुष्य को ही अपना ग्रास बनाया है।
इस विश्व स्तरीय आपदा ने न केवल अर्थव्यवस्थाओं बल्कि मजबूत सरकारों की भी चूलें हिलाकर रख दी है।
भारत मे भी इसका व्यापक असर पड़ा है, अब तक करीब आठ सौ से ज्यादा संक्रमित मामले सामने आ चुकें है,जिसके चलते सरकार को इक्कीस दिन के सम्पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लेना पड़ा। सोशल डिस्टेंस एक वैकल्पिक उपचार है,पर भारत का आम नागरिक सोशल डिस्टेंस को नहीं जानता।
अन्य देशों की अपेक्षा भारत की स्थिति भिन्न है। यहाँ की लगभग अस्सी करोड़ आबादी का जीवन दैनिक मजदूरी व दिहाड़ी पर निर्भर करता है। सम्पूर्ण लॉकडाउन का पालन करना इनके लिए सामूहिक आत्महत्या करने जैसा है। भारत इस भयंकर स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं है और ना ही इससे निपटने की कोई पूर्व तैयारी ही है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता से एक दिन के 'जनता कर्फ़्यू' व थाली और ताली बजाने की अपील की, तथा उसके लिए उन्होंने चार दिन का पर्याप्त समय भी दिया। पर पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लेते समय ना तो कोई समय दिया गया तथा ना ही प्रवासी मजदूरों व कामगारों के रहने,खाने से संबंधित कोई चर्चा ही हुई। नतीज़तन
इक्कीस दिन की लम्बी अवधि से मजदूर वर्ग व असंगठित कामगारों में अफरा तफरी का माहौल बन गया और देखते ही देखते लाखों की तादाद में लोगों का हुज़ूम सड़कों पर उमड़ पड़ा।
पुलिस, प्रशासन तथा सरकार ने बार बार कहा कि जनता लॉकडाउन का पालन नहीं कर रही है तथा वे इस बीमारी को गंभीरता से नही ले रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सरकार ने स्वंय इसे कितनी गम्भीरता से लिया है। नवम्बर 2019 में इस महामारी के लक्षण दिखने प्रारम्भ हो गए थे और दिसम्बर 2019 में इसका पहला मामला सामने आ चुका था। फरवरी माह तक आते-आते इसने दुनियां के अन्य हिस्सों में भी अपने पाँव जमाने शुरू कर दिए। 12 फरवरी 2020 को राहुल गांधी द्वारा किए गए एक ट्वीट ने सरकार को पहले ही चेता दिया था कि ये महामारी भारत के लिए न केवल एक चुनौती होगी बल्कि विनाशकारी साबित होगी। सरकार को पूर्व तैयारी की आवश्यकता है और इसे गम्भीरता से लेना चाहिए। पर इस बात पर कोई गौर नहीं फ़रमाया गया। इसके बाद भी विदेशों से आने वाले प्रवासियों की जाँच प्रकिया में घोर लापरवाही हुई है इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल अभी भी समय है कि सभी सरकारों को केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर, कार्य करने व मानव जीवन को बचाने और इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है।■■■

Saturday, 22 February 2020

मिट्टी डाल भी दो यार...

व्यंग्य

                        मिट्टी डाल भी दो यार...

कल शाम एक लॉन्ग ड्राइव से लौटते समय मैं एक चाय की दुकान पर रुक गया। दुकान में ज्यादा भीड़ भाड़ नही थी। कुछ दूरी पर सामने की बैंच पर बैठे दो युवा नेता अपनी बहस में मसरूफ़ थे। मैं उनको बिल्कुल साफ सुन पा रहा था, मुझे उन दोनों की बहस इतनी मज़ेदार लग रही थी कि अगर समय पर चाय मिल गई होती तो अनंत आनंद की अनुभूति हो गई होती।
"क्या... बे हरिया! तू ये फेसबुक पर क्या अंटशंट लिखता रहता है?... क्या हमेशा दलित सम्मान..दलित, सम्मान का रट्टा लगाये रखता है? कितनी बार समझाया है तुझे... समझ नहीं आता क्या?" पंडित जी अपने भगवे पटके को गले में दुरुस्त करते हुए अनवरत प्रश्नों के बाण छोड़े ही जा रहे थे।
"अरे!..तुम लोग हम पर पाँच हजार साल से अत्याचार करते आ रहे हो.. हमसे भेदभाव करते हो..छुआछूत करते हो.. नीच समझते हो! हमें सम्मान से जीने का अधिकार ना है क्या?..अब भी बोलें नहीं क्या..?" हरिया ने भी बड़ी शान से अपने गले में पिरोये नीले पटके को दुसरुस्त किया। दोनों के हावभाव और तेवर से साफ झलक रहा था कि दोनों वर्गसंघर्ष के महानायक बनने की होड़ में अग्रिम पंक्ति में खड़े थे।
"देख हरिया!...क्या हमने तुमसे भेदभाव किया? तुम्हारे साथ खाना नहीं खाया, चाय नहीं पी या तुम्हे अपने घर में नहीं घुसने दिया..? तुम्हे अपने भाई की तरह मानते हैं.. और तुम हो के..! माना के हमारे पूर्वजों ने गलत व्यवहार किया है तुम्हारे साथ पर...इसमें हमारा क्या दोष? पुरानी बातों को कब तक लिये बैठे रहोगे..? अब मिट्टी भी डालो! गड़े मुर्दे उखाड़कर अपने सम्बन्ध क्यों बिगाड़ रहे हो?" पंडित जी लगभग भावुक होने की कगार पर ही थे कि तभी छोटू चाय ले आया। टेबल पर रखी चाय ने दोनों का ध्यान भंग करने में बड़ी सफलता प्राप्त कर ली थी। दोनों ने चाय से भरे कप उठाये और होठों से चिपका लिये।
"हम्म...!" हरिया ने चाय की घूँट भरी और पंडित जी से मुख़ातिब हुआ। " यार बात तो तुम ठीक कहते हो, हम बचपन के साथी है..पुरानी बातों को लेकर हम क्यों अपने सम्बन्ध खराब करें! तुम सही कहते हो पंडित.. मिट्टी डालो यार पुरानी बात पर। चल चाय पी।" अब दोनों के चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी। मेरे मन को भी बड़ा सकून मिला, मैं मन ही मन इस बात से खुश था कि देर सवेर दोनों युवाओं ने बरसों से चले आ रहे इस वर्गसंघर्ष को विराम देने की राह निकाल ही ली। उन दोनों के साथ मैं भी चाय का मज़ा ले रहा था कि हरिया के फोन की रिंग ने रंग में भंग डाल दिया। "हेल्लो...! हाँ निसार भाई बोलो...! अभी पंडित जी के साथ चाय पी रहा हूँ...तुम काम बोलो...! दावत..? ईद की दावत..कब..? आज रात को...? हाँ..ठीक है भाई.. पहुँच जाऊँगा! ओके।"
फोन डिस्कनेक्ट करने के बाद हरिया ने ज्योंही पंडित जी की और देखा..पंडित जी की त्यौरियाँ चढ़ी हुई थी। वो कुछ समझ पाता उससे पहले ही पंडित बोल पड़ा।
"क्या रे हरिया...! तू इन मुगलों की औलादों के साथ क्यों रहता है बे? इनके घर की दावत भी खाता है तू..! क्या तुझे नही पता इन्होंने हमारे साथ क्या किया था? हमारी बहन बेटियों की आबरू लूट ली, हमें ग़ुलाम बनाके रखा, हमारे मन्दिर तोड़ डाले,.. हमारा धर्म बदलवा दिया! और तू है कि इन हरामखोरों से दोस्ती रखता है! मेरा बस चले तो मैं इन सब हरामियों को पाकिस्तान भेज दूँ! मेरा तो एक ही मक़सद है इन मुगलों की औलादों से अपने पर हुए अत्याचारों का बदला लेना! अरे!...तू कुछ बोलता क्यों नहीं...? मुझे इस तरह क्यों घूर रहा है? ऐसे क्यों देख रहा है मुझे...?" पंडित थमा तो लगा जैसे मूसलाधार बारिश थम गई हो।
"मैं ये देख रहा हूँ पंडित...! बड़ी कमाल के आदमी हो यार तुम तो...! हमसे तो बीती बातों पर मिट्टी डलवा दी..... और ख़ुद.....?" इससे पहले कि
हरिया अपनी बात पूरी कर पाता मैं ज़ोर का ठहाका लगाकर हंस पड़ा।।

सुनील पंवार की क़लम से...

चुनावी मुद्दा

लघुकथा                                                       सुनील पंवार
                                    चुनावी मुद्दा

आज सुबह से ही दलित बस्ती में बड़ी गहमागहमी थी। सैंकड़ो युवा कार्यकर्ताओं ने बस्ती के बीचों बीच भव्य पंडाल लगा दिया था। पेयजल व बैठने की भी उचित व्यवस्था कर दी गई थी, और उसमें एक भव्य मंच की सजाया जा चुका था। बस्ती में युवा कार्यकर्ताओं ने घर घर जाकर सभा में उपस्थिति का निमंत्रण देने का कार्य भी पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से किया था, और करे भी क्यों न! स्थानीय निकायों के चुनाव जो थे!
सौ से डेढ़ सौ महिलाएं ही सभा में शामिल हो पायी थीं, इसके अलावा कुछ वृद्ध व्यक्ति भी मौजूद थे, पर युवाओं की उपस्थित तो ना के बराबर ही थी। सारी तैयारियां हो चुकी थीं। सभा आरम्भ होने से पूर्व ही निर्धारित समय पर दलित बस्ती की संकड़ी गलियों का सीना चीरते हुए चमचमाती गाड़ियों का काफ़िला लक्ष्य की ओर बढ़ता चला आ रहा था।
टूटी फूटी सड़के, बिना प्लस्तर के पक्की ईंटों के मकान, ओवर फ्लो नालियों से बहकर जमा हुए पानी से आती दुर्गंध, मकानों की छतों तक चढ़ी सीलन, अर्धनग्न घूमते बच्चे, दुर्गंध मारती नुक्कड़ पर कच्चे मीट की दुकानें, लोहे की चद्दरों से बने घर के दरवाज़े, सड़क की एक तरफ़ देशी शराब की दुकान, और उसके बाहर लगा बेवड़ों का जमावड़ा! स्थिति को और भी भयावह बना रहा था। काफ़िला अपने गन्तव्य तक पहुंच चुका था। अधेड़ आयु के नेताजी गाड़ी से उतरे और सबका अभिवादन करते हुए मंच की और बढ़ गये।
नेताजी ने अपनी सरसरी नज़र सभा में उपस्थित श्रोताओं पर दौड़ाई। कुपोषण और गरीबी के कारण काले पड़ चुके चेहरे और धँसी हुई आँखों में आज बहुत उम्मीदें थी। नेताजी ने एक बार पुनः सबका अभिवादन किया और अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया।
"भाइयो और बहनों... जैसा कि आप सब जानतें है कि इसबार नगर निकाय के चुनाव में मैं मेयर पद का उम्मीदवार हूँ..। और मैं आपकी हर समस्या से अवगत भी हूँ। मैं आपकी सभी समस्याओं का समाधान करने का प्रयत्न करूँगा.. और मैं जानता हूँ कि आपकी बस्ती की सबसे बड़ी समस्या क्या है। नशा! नशा ही आपकी समस्या है। यहाँ मौजूद मेरी माताओं और बहनों ने मुझे इस बारे में पहले ही अवगत करा दिया था की बस्ती के शतप्रतिशत युवा नशे की चपेट में आ चुकें हैं। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपकी बस्ती को पूर्णतया नशा मुक्त करके ही दम लूँगा।
मेरा चुनावी मुद्दा ही नशा मुक्त शहर बनाना है। बस आपका सहयोग, आशीर्वाद और प्रेम की आवश्यकता है। धन्यवाद।" नेताजी के भाषण समापन होते ही तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरा वातावरण ही हिला डाला। नेताजी अभिवादन करते हुए अपने काफ़िले की और बढ़ गए।
"यहाँ तो चुनाव जीतने के सारे अवसर उपलब्ध हैं,
गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और नशा।" नेताजी अपनी बगल में बैठे अपने सहायक से बतिया रहे थे।
"मैं कुछ समझा नहीं सर।" उसने आश्चर्य व्यक्त किया।
"मेरा कहने का मतलब ये है कि यहाँ चुनाव जीतना बहुत आसान है और यहाँ सभी अवसर मौजूद हैं।
तुम कल से ही महिलाओं और बच्चों के लिए भोजन, वस्त्र और चिकित्सा की व्यवस्था करो, और पुरुषों के लिए शराब की। फिर देखना हम कैसे चुटकियों में चुनाव जीतते हैं।" नेताजी अपने सहायक की और मुस्कुराते हुए बोल रहे थे।
दोनों की नज़रे आपस में मिली और फ़िर दोनों ने भेड़िये जैसी मुस्कान के साथ अपने दांत निपोर दिये।।■■◆
सुनील पंवार की क़लम से...

चौकीदार


                     लघुकथा।                 चौकीदार।              सुनील पंवार


रात की ड्यूटी पूरी करने के बाद जब वो घर पहुंचा, तो नौ साल की बिटिया ने एक खूबसूरत मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया। वो मुस्कुरा दिया और रानो की गाल पर बड़े प्यार से अपनी उंगलियों से चुटकी भी काट ली। श्रीमती जी उनके लिये चाय बनाने रसोईघर की ओर कूच कर चुकीं थी।
"कहाँ थे पूरी रात..पापा?"
"मैं अपने काम पर था रानो!" उसने रानो को उठाया और गौद में बैठा लिया।
"पर...! आप तो दिन में जाते हो ना कामपर?" उसने फिर सवाल का तीर छोड़ दिया।
"हाँ..! पर.. अब मैं रात को भी काम पर ही रहूँगा लाडो!"
"रात को क्यूँ?"
"अरे लाडो! आजकल बच्चों को उठाने वाला गिरोह शहर में काफ़ी सक्रिय हो गया है, तो...! मालकिन ने अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए मुझे रात को भी नोकरी पर रख लिया, इसलिए अब रात को भी जाना पड़ेगा।" वो रानो के सिर को बड़े प्यार से सहला रहा था।
"आप उनके बच्चों की रक्षा क्यों करते हो पापा? क्या वो खुद नहीं कर सकते?"
"पैसों के लिए करता हूँ... रानो! वो बड़े लोग है! पैसे देकर चौकीदार रख लेतें हैं, हम जैसे चौकीदार है ना! उनकी सुरक्षा के लिए।" वो उसके हर मासूम सवाल का जवाब बड़ी गम्भीरता से दे रहा था।
"वो तो चौकीदार रख लेंगे पापा पर हमारा क्या? क्या वो बच्चे चुराने वाले उन्हीं के बच्चे चुरायेंगे, हमें नही? आप उनकी रक्षा करते रहोगे तो हमें किसके सहारे  छोड़ोगे पापा? कोई मुझे उठा ले गया तो...? मेरी रक्षा कौन करेगा? मैं भी तो बच्ची हूँ! मेरे लिए चौकीदार रखोगे या भगवान भरोसे ही रहना पड़ेगा?" उसके सवाल ने चौकीदार को निःशब्द कर दिया, उसके पास रानो के सवाल का कोई जवाब नही था। उसने रानो को कसकर अपने सीने से चिपका लिया। अब रानो अपने आप को पूरी तरह से महफ़ूज महसूस कर रही थी।।
सुनील पंवार की क़लम से....

बंद कॉटेज

(कहानी)

*बंद कॉटेज, और ताला नया*
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कहानीकार: सुनील पंवार

अभी एक सप्ताह ही हुआ था मुझे यहाँ शिफ्ट हुए। रोजमर्रा की भागदौड़, दहाड़ें मारती मशीनों की चीखें और वाहनों का शोर सुनना तो जैसे बीती बातें ही रह गई थीं। मुझे बहुत सारी कहानियों पर काम  करना था और शहर की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी से मेरा मोहभंग हो चुका था। शहर में रहकर शायद मैं लेखन का काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से नहीं कर पा रहा था। बचपन के दोस्त शशांक ने शहर से बीस मील दूर अपने फार्म में छोटे छोटे कॉटेज बनाए हुए थे जिनके बीच कम से कम सौ मीटर की दूरी थी। हरे-भरे पेड़, चारों ओर शान्त वातावरण और प्राकृतिक सौन्दर्य की झलक तो देखते  ही बनती थी। एकाकी जीवन जीने के लिए शायद इससे बेहतर कोई जगह नहीं थी। एक सप्ताह में ही मुझे शारिरिक और मानसिक सुकून महसूस होने लगा था। इस कॉटेज में मेरे साथ मेरे दोस्त और सेवक मोहनदादा भी थे। मैं अपने काम में पूरी लगन से व्यस्त था कि मेरा फोन बज उठा........

"हेलो... हाँ शशांक..बोलो।"
"कैसे हो सन्नी? कैसी लगी जगह?" सामने से शशांक ने मेरा हालचाल पूछा।
"अरे ! बहुत बढ़िया! बहुत अच्छी जगह है यार.. तुमने तो बहुत अच्छी व्यवस्था कर रखी है यहाँ,मन करता है सारी उम्र यहीं बस जाऊँ।"
"अरे क्यों नही.. जब तक तुम्हारा दिल करे रह लो।"
"अच्छा ये बताओ अंकल कैसे हैं?" मैंने पूछा
"पापा तो मम्मी की मौत के बाद नेपाल सैटल हो गए..यही कोई तीन साल से... अच्छा ठीक है सन्नी मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ, अगर कोई दिक्कत हो तो कॉल करना! ओके !" फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

मैं फिर से अपने काम में व्यस्त हो गया। उसी शाम मैं मोहनदादा के साथ प्रकृति का आनंद उठाने पूरे फार्म का चक्कर लगाने निकल पड़ा। यहाँ की हर एक चीज ने मुझे प्रभावित किया लेकिन.....! एक कॉटेज जो लगभग सिरे पर था, मुझे बहुत ही अजीब सा लगा। ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से उसमें किसी मनुष्य ने पाँव तक ना रखा हो। ये कॉटेज इस पूरे फार्म की खूबसूरती को धूमिल सा कर रहा था। मैं उस कॉटेज की ओर बढ़ने लगा तो मोहनदादा भी मेरे पीछे- पीछे चल पड़े। चारों ओर से सूखे पत्तों ने उस कॉटेज को लगभग ढक रखा था। हमने उसके चारों ओर एक चक्कर लगाया, पर कोई हलचल नहीं हुई। यहाँ से मेरा कॉटेज सबसे ज्यादा दूरी पर जरूर था पर साफ दिखाई दे रहा था। ये कॉटेज देखने में बड़ा भयानक और भुतहा लग रहा था। एक अजीब बात और थी, देखने में ऐसा लग रहा था जैसे इस कॉटेज को सालों से किसी ने रहने के लिए इस्तेमाल नहीं किया था पर उसका ताला बिल्कुल भी जर्जर नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे उस ताले को समय समय पर खोला गया हो।

"आप यहाँ क्या कर रहे हैं?" मैनेजर साहब के सवाल ने हमारा ध्यान भंग कर दिया।"बस यूँही...घूमने निकले थे।" मैंने उत्तर दिया।"सर्दी काफ़ी बढ़ रही है.. अब आपको चलना चाहिए।" मैनेजर साहब का लहज़ा बड़ा शांत था। मैं साफ़तौर पर महसूस कर रहा था कि उन्हें हमारा वहाँ होना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था। हम दोनों वहाँ से अपने कॉटेज की ओर बढ़ने लगे। मुझे मैनेजर का बर्ताव बड़ा अजीब लगा। वो हमें पीछे से एकटक देखे जा रहे थे। उस रात मेरा मन काम में बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। मैं खिड़की के पास लगी आराम कुर्सी पर बैठ गया। रात के दस बज चुके थे, और सर्दी भी बढ़ गई थी मेरी नज़र उस कॉटेज की तरफ़ ही टिकी हुई थी, हालांकि अंधेरे की वजह से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था फिर भी नज़रें उसी तरफ़ थीं। अचानक मुझे वहाँ कोई हलचल नज़र आई। मैंने मोहनदादा को बुलाया और खिड़की से कॉटेज की तरफ़ देखने को कहा। "लगता है वहाँ कोई है" मोहनदादा ने मेरी ओर देखते हुए कहा।
"लगता तो है दादा।" कॉटेज की दूरी ज्यादा थी पर फिर भी ये अनुमान लगाया जा सकता था कि कोई उस कॉटेज में था। खिड़की से झाँकती हल्की रोशनी ने किसी की मौजूदगी की चुगली कर ही दी थी। हम दोनों के मन में एक बात तो जरूर थी कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है।"कौन हो सकता है दादा?"
"देखते हैं, एक बार शान्त रहकर देखते रहो।" हम आधे घंटे तक यूँ ही खिड़की से सटे रहे और नज़रें कॉटेज पर गड़ाये रखीं और ताकते रहे। कुछ ही देर में कॉटेज गहरे अंधेरे में डूब गया। यही सिलसिला हर रोज चलता रहा। रात को दस बजे के बाद से लगभग आधे या पौने घण्टे तक वहाँ रोशनी दिखाई देती और फिर गहरा अंधेरा। हम जब भी कॉटेज से निकलते मैनेजर साहब की नजरें हम पर ही होती थीं। मैंने कई बार सोचा कि इस बारे में शशांक से बात करूँ पर हर बार वो बात को टाल देता। एक रात जब मैं अपनी खिड़की से झाँक रहा था मैंने देखा एक गाड़ी कॉटेज की तरफ धीरे धीरे बढ़ रही थी। मैंने मोहनदादा को अपने पास बुला लिया। हम एक दूसरे की तरफ आश्चर्य से देख रहे थे। गाड़ी कॉटेज के सामने आकर रुक गई और हेडलाइट बुझाते ही गहरे अंधरे में गुम हो गई। 

"दादा! लगता है अब समय आ गया है कि इस रहस्य से पर्दा उठा ही दिया जाये।" मैंने दादा की तरफ देखते हुए कहा। दादा ने अपनी लाठी उठाई, तो मुझे समझते देर नही लगी कि दादा ने अपनी सहमति दे दी है। हम दोनों अंधेरे में कॉटेज की तरफ बढ़ने लगे। कॉटेज के दरवाजे पर ताला नहीं लगा था। मैंने दरवाजे को थोड़ा सा अंदर की तरफ धकेला तो वो खुल गया। रास्ता साफ देख हम दोनों अंदर घुस गए। अंदर का दृश्य तो चौकाने वाला था। अंदर की हालत बाहर से बिल्कुल विपरीत थी। एकदम साफ सुथरा, चकाचक। हम जैसे ही थोड़ा आगे पहुंचे ठिठक कर रुक गए।"निकल जाओ.... निकल जाओ यहाँ से.... क्यों आये हो यहाँ?...निकल जाओ।" हम आवाज़ सुनकर सन्न रह गए। धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे। सूट-बूट पहने एक आदमी हमारी ओर पीठ किये कमरे में खड़ा था, उसके साथ दो लोग और भी थे। हम दोनों दीवार के सहारे चिपक कर कमरे के अंदर झाँकने का प्रयास कर रहे थे। कमरे के अंदर का दृश्य देख मारे विस्मय के मेरी आँखें फट गईं।

"ये क्या? ...इतना बड़ा झूठ.. मुझसे?" मैं मन ही मन बुदबुदाया। ये दृश्य मेरे सीने को चीर देने वाला था। एक वृद्ध व्यक्ति, जिसे जंजीरों से जकड़ा हुआ था,जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, और वो किसी पिंजर से कम नहीं था। उसकी धंसी हुई आंखें हज़ारों सवाल कर रही थीं।"क्यों आये हो यहाँ?..निकल जाओ!" वृद्ध की आवाज़ में क्रोध झलक रहा था।  मैं निडरता से कमरे के दरवाज़े तक पहुंच ही गया और सूटबूट वाले व्यक्ति के पीछे खड़ा हो गया। वो मेरी ओर पलटा, स्तब्ध ,शान्त! ऐसा लग रहा था जैसे काटने पर खून ना हो। मैं उसकी आँखों में एकटक देखता रहा,  कुछ देर की चुप्पी के बाद शशांक सहसा ही बोल पड़ा। "सोसायटी में रहता हूँ... ! साथ नहीं रख सकता...! बहुत कोशिश की है संभालने की... पर! आखिर सारा बंदोबस्त तो कर ही रखा है यहाँ! और खुद भी संभालने आता हूँ ना हर महीने..! कौन संभाले? बिजनेस संभालूं या इन्हें?" वो बोलता गया और मैं चुपचाप सिर्फ़ उसकी आँखों में देखता रहा। इतनी ठंडी रात में अब सब शांत था, इतना शांत कि सांसों की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। मैं पीछे मुड़ा और धीरे धीरे थके कदमों से दरवाज़े की ओर बढ़ने लगा। वो मुझे जाते हुए देखता रहा। पूरे वातावरण में खामोशी छाई हुई थी सिर्फ नम्बर डायल करते हुए फोन के की-ट्यून की आवाज़ सुनाई दे रही थी जो शशांक कर रहा था। फोन कनेक्ट हो चुका था, सामने से एक आवाज़ सुनाई दी। "हेलो....... एम्बुलेंस।"

*लेखक/कहानीकार परिचय*
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*नाम :-* सुनील पंवार
*पिता:-* स्व. श्री मदन लाल पंवार
*माता:-* श्रीमती कमला देवी
*शिक्षा:-*
स्नातक (बीए), विधि स्नातक (एलएल. बी.), शिक्षा में स्नातक (बी. एड.)
*व्यवसाय:-*
वर्तमान समय में अध्यापक पद पर हनुमानगढ़ जिले में कार्यरत।
*जन्म स्थान:-* रावतसर श्री गंगानगर जिले में 1986 (वर्तमान हनुमानगढ़ जिले में) राजस्थान।
*ईमेल:-* sunil.rawatsar@gmail.com
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*(प्रस्तुति: डाटला एक्सप्रेस/साप्ताहिक/गाज़ियाबाद (उ०प्र०) 24 से 30 जुलाई 2019/प्रत्येक बुधवार/संपादक: राजेश्वर राय 'दयानिधि'/email: rajeshwar.azm@gmail.com/datlaexpress@gmail.com/दूरभाष: 8800201131/व्हाट्सप: 9540276160*

भीगी मुस्कान

                                                       भीगी मुस्कान


वो उससे पिछले आठ महीने से बात कर रहा था। फेसबुक, व्हाट्सअप, इंस्टाग्राम सब पर उसे फॉलो कर रहा था। वो अपने दिल की बात कई बार बोल चुका था, पर वो कहाँ सुनने वाली थी। वाणी से 16 साल छोटा था वो! यही कारण था कि उसे हर बार झिड़कियां ही मिली थी।
वो भी इतना ढीठ था, कहाँ हार मानने वाला था। हर दिन, हर पल नए-नए अंदाज से अपनी बात कहने का कोई मौका नहीं चूकता।
पति की मौत के बाद वाणी इंदौर से दिल्ली शिफ़्ट हो गई और स्पॉकन इंग्लिश का इंस्टिट्यूट शुरू कर लिया।
सुनील भी उससे एक स्टूडेंट के रूप में ही मिला था जो  धीरे-धीरे उसके बहुत करीब हो चुका था। 
वो जब भी फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी बोलती तो वो बस उसे एकटक निहारते ही रहता।  वो साँवला सा लड़का जो दलित परिवार में जन्मा था और जिसका अँग्रेजी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था, वाणी को दिल से दिल दे चुका था।
वाणी ने उसे बहुत समझाया पर वो मानने को तैयार ही नही था। वो तो सिर्फ उम्र को एक संख्या मानता था और उसके आसपास रहने का बहाना ढूंढता रहता। 
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कुछ दिनों से उसका बर्ताव वाणी को खल रहा था। वो कुछ उखड़ा-उखड़ा रहने लगा! ना उसका पढ़ाई में ध्यान था और ना ही ख़ुद पर। शायद वाणी का किसी से बात करना भी उसे गवारा नहीं था। वाणी ने उसे समझाने का हर सम्भव प्रयत्न किया पर उसने वाणी की एक भी नहीं सुनी।
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उस शाम घने कोहरे ने वक़्त रहते ही अपने पाँव पसारना शुरू कर दिया था। तेज़ हवाओं ने ठिठुरन बढ़ा दी थी।
वो बिल्कुल शांत! चुपचाप उसके सामने पलकें झुकाए बैठा था। पूरे कमरे में मौत जैसा सन्नाटा पसरा था। वाणी उसे अपलक देख रही थी,पर दोनों में से कोई भी बात की शुरुआत नही करना चाहता था। आखिरकार वाणी ने ही चुप्पी तोड़ी।
"क्या चाहते हो तुम? कितनी बार समझाया है तुम्हे! तुम जो सोच रहे हो वैसा नहीं हो सकता! सोलह साल बड़ी हूँ तुमसे! तुम मेरी बेटी के हमउम्र हो! क्यों सताते हो मुझे?... क्यों?" वो अपना चेहरा दोनों हथेलियों से छिपाकर फ़फ़क पड़ी।
"जानते हो, क्यों दूर रहती हूँ तुमसे? क्योंकि मैं भी तुम्हे चाहती हूँ, पर तुम्हारी पूरी लाइफ है तुम्हारे सामने! मैं तुम्हे बर्बाद होता नहीं देख सकती। पन्द्रह साल से मैंने अपने आप को जहाँ रोक रखा था, तुम वहीं ले आये मुझे! क्या सुनना चाहते हो तुम मुझेसे..? यही के मैं तुमसे प्यार करती हूँ या नहीं?...तो सुनो! आई लव यू! हाँ मैं तुम्हे चाहती हूँ, तुम जो भी हो जैसे भी हो! हाँ, मुझे भी प्यार है तुमसे। अब दफ़ा हो जाओ मेरे घर से और मेरी ज़िन्दगी से! फिर कभी लौटकर मत आना। सुना तुमने?

चले जाओ...चले जाओ! प्लीज़!" उसकी आँखों से बहते आँसू उसकी गाल से ढलते हुए गर्दन तक आते-आते विलुप्त होते जा रहे थे। वो फ़फ़क-फ़फ़क कर रो रही थी।
वो अपनी जगह से उठा और वाणी के पास सोफे पर बैठ गया। वाणी ने धीरे से उसके काँधे पर सिर रख दिया और फिर सुबकने लगी।
ऐसा पहली बार था जब वाणी रो रही थी और वो भीगी पलकों से मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था।।■■■

सुनील पंवार की क़लम से...

एक खनकती आवाज़

                                            एक खनकती आवाज़
 
आधी रात के शांत वातावरण में बजी फोन की एक रिंग ने मुझे ऐसे झकझोर दिया जैसे बम फट गया हो। इतनी रात को फोन आना,और मेरे अनवरत जारी अध्ययन में ख़लल डाल देना मुझे परेशान कर गया। रात के बारह बज रहे थे। नोरंग जल्दी ही सो गया था,पर उसके सिरहाने रखा मोबाइल फोन निरन्तर बज रहा था,और बार-बार उसे जगाने का प्रयास कर रहा था, पर वो था कि आज कुम्भकर्ण बना चैन से सो रहा था। फोन के अथक प्रयासों के बाद भी जब वो नही जागा तो मैंने उसका फोन उठाया और रिसीव कर लिया।
"हेलो... हेलो!" सामने से कोई आवाज़ नही आयी। फोन कट गया। इससे पहले कि मैं फोन रखता वो फिर बजने लगा।
"हेलो....हेलो!" फिर से कोई प्रत्युत्तर नही। मैंने कई दफा हेलो-हेलो करने के बाद फोन काट दिया और फिर उसे नोरंग के सिरहाने रख दिया। मैं फोन रखकर ज्योहीं पलटा एक बार फिर फोन चीख पड़ा।
"हेलो!" अबकी बार मेरा लहज़ा सख़्त था।
"हेलो! भैरोंसिंह जी बोल रह्या हो?" एक खनकदार आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
"नही।" मैंने उसका जवाब दिया।
"तो फेर आप कुण बोल रहया हो?" उसकी आवाज़ बहुत ही मधुर थी।
"मैं सुनील पंवार बोल रहा हूँ राजस्थान से! लगता है आपका रोंग नम्बर लग गया है।"
"रामराम सा! मैं भी राजस्थान स बोल रही हूं, जोधपुर स।" वो थोड़ा रुकी और फिर बोलना शुरू हो गई।
"म्हे भैरोसिंह जी न कॉल लगायौ पर थारौ नम्बर लाग ग्यो। कोई बात कोनी सा। रोंग नम्बर कुछ कोनी हौवे जी, जब जिससे बात होणी होती है तब-तब होकर रैवेह है। और सुणाओ काँय हाल है थारै गाँव का?" वो अपनी मिश्री जैसी मीठी आवाज़ में मुझसे ऐसे बात कर रही थी जैसे मुझे बहुत पहले से जानती हो। उसके लहज़े में जरा सा भी अजनबीपन नहीं था।
"आपकी आवाज नही आ रही थी। मैं हेलो-हेलो बोल रहा था।" मैंने कहा।
"हाँ! जणा ही मैं सोचूं कोई बोल क्यूँ नहीं रहयो! शायद नेटवर्क म ही दिक्कत है, बार-बार फोन कट रहयो जी। थे हनुमानगढ़ स हो और म्हे जोधपुर स! थे हिन्दी मांय क्यूँ बोल रह्या हो ? राजस्थानी हो तो राजस्थानी मांय बात करो।" उसने अपनी बात जारी रखी।
"मुझे मारवाड़ी भाषा नही आती।" मैंने फिर उत्तर दिया।
"कोई बात नहीं सा! आप हिन्दी बोलो। अच्छा बताओ हनुमानगढ़ मांय मौसम रा कायं मिज़ाज़ है? बारिश पानी कियाँ है?"
"बहुत बढ़िया है जी।"
"म्हारे यहाँ भी बहुत बढ़िया है जी सब कुछ। और सुणाओ, घर मे सब ठीक ठाक है? खेतीबाड़ी सब बढ़िया?"
"जी सब बढ़िया है।" आमतौर पर मैं ना तो किसी का फोन रिसीव करता हूँ और ना ही अजनबियों से बात करता हूँ, पर आज मैं उसकी हर बात का जवाब दिए जा रहा था। मैंने एक बार भी उसकी बात काटने की कोशिश नहीं की, उसकी मधुर वाणी मेरे कानों को सुकून पहुंचा रही थी। घर, परिवार, शहर, गाँव और भाषा सब विषयो पर बात होती गई,और समय का तो पता ही नही चला। ऐसा पहली बार था जब किसी अनजान से इतनी बातें की थी मैंने,और वो भी इतनी आत्मीयता से। मुझे उसकी भाषा इतनी मिट्ठी लग रही थी कि मेरे मन में एक-बार भी फोन डिस्कनेक्ट करने ख़्याल तक नहीं आया। यही कमाल है राजस्थानी भाषा का! ये इतनी आदर, सत्कार, प्रेम, संयम और भावों से लबरेज़ मधुर एवं सुरीली भाषा है कि मन करता है इसे सुनते ही जायें।
"थे कायं काम करो हो?" उसने बड़ी विनम्रता से मुझसे सवाल किया।
"जी! मैं पढ़ता हूँ, और अभी भी पढ़ ही रहा था जब आपका फोन आया।" मैंने भी सरलता से जवाब दिया।
"अरे! ईति रात भी पढ़ रह्या हो? म्हारे को माफ़ करना! म्हे थारै को डिस्टर्ब किया। थे पढ़ो और खूब तरक्की करो। चलो अब सो ज्याओ! सुबह पढ़ लीज्यो। थारै स बात करके घणी खुशी हुई। अब फोन रखतें हैं। थारै को घणे मान स्यूँ, घणी-घणी राम राम।" फोन डिस्कनेक्ट हो गया। मैंने घड़ी की और देखा तो दंग रह गया! रात का एक बज रहा था। उस अजनबी महिला से बात करते हुए पूरा एक घण्टा हो चुका था। मैंने अपनी किताब बन्द की और बिस्तर की और लपक पड़ा, पर वो मधुर आवाज कहाँ मेरा पीछा छोड़ने वाली थी। इतने बरस गुज़र जाने के बाद भी मेरे कानों में वो आवाज़ आज भी गूंजती रहती है।
मेरा यकीन कीजिये उसके जैसी आवाज़ उस दिन से पहले और उसके बाद मैंने आज तक नहीं सुनी। उसके बाद कभी उससे बात नहीं हो सकी। कई दफा उस नम्बर पर कॉल करने का प्रयास किया,पर वो नम्बर अस्तित्व में नही था।
समय के साथ-साथ उसका नम्बर भी खो गया। वो कौन थी, क्या करती थी! मुझे ना उसका नाम पता है और ना काम। मैं आज भी किसी अनजान नम्बर से आये फोन को इस उम्मीद के साथ रिसीव कर लेता हूँ कि शायद वही खनकदार कर्णप्रिय आवाज़ एक बार फिर से सुनाई दे दे।।
सुनील पंवार
(ये वर्ष 2007 में एक रात की वास्तविक घटना है।।)
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इन्तहा

                                                                              इन्तहा

बादलों की गड़गडाहट ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी, जैसे वो नींद से जाग गई हो। उसे लगा जैसे दरवाजे पर किसी ने आहट दी है। वो उठी और खिड़की से बाहर झांकने लगी। आज फिर मौसम ने अपना रुख बदल लिया था, काली घटाओं ने दिन को रात में तब्दील कर दिया। कौंधती हुई बिजली और बहती हुई तेज़ हवाओं ने आने वाले तूफ़ान का संकेत दे दिया था। रेडियो पर मधुर गीत की धुन बज रही थी। पूरा घर तरह तरह के व्यंजनों की खुशबू से महक रहा था। आज सुबह से ही वो चैन से नही बैठी। सारे दिन अपने काम में व्यस्त रही पर ध्यान सिर्फ दरवाजे पर था उसका। वो श्रृंगार से सजी किसी अप्सरा से कम नहीं दिख रही थीं, वो बार बार आईने के सामने अपने माथे की बिंदिया को ठीक करती तो कभी साड़ी के पल्लू को। दो साल बीत गए उसे देखे हुए। वो कभी उसे मन भर  देख भी नहीं पाई थी।  पहले तो हर रोज बात होती थी पर अब तो कभी कभार ही उससे फोन पर बात हो पाती है। शादी के कुछ ही महीनों बाद सुनील, वाणी को छोड़कर विदेश चला गया था। वो अपने कामों में इतना व्यस्त रहा कि आज तक लौटकर नहीं आया। वाणी हर रोज विरह की आग में झुलसती रही। न जाने कैसे कैसे विचारों ने उसके मन मस्तिष्क में घर कर लिया था। "क्या वो मुझे पसन्द नही करते?....क्या मैं अब सुंदर नहीं रही? .........कहीं उन्होंने किसी और से तो........? नहीं..... नहीं...वो ऐसा नहीं कर सकते.... व्यस्त होंगे...शायद समय नहीं मिलता होगा...।"  सोचकर अपने मन को दिलासा देती रहती। एक सप्ताह पहले ही सुनील का फोन आया था। दो साल बाद वो घर लौटकर आ रहा था। वाणी ने दो साल तो जैसे-तैसे गुजार दिए, पर बीता सप्ताह कैसे गुजरा, उसका मन ही जानता है। अकेलापन हर रोज उसे डसता,नोचता, खसोटता रहता।
वो बार बार घड़ी की और देख रही थी। शाम के चार बजे चुके थे। ऐसा लग रहा था जैसे समय ठहर गया हो। वैसे भी इंतज़ार में घड़ी हमेशा धीरे ही चलती है। हवाएं और तेज़ हो गई थीं। सुबह से अब तक एक पल के लिए भी उसकी नज़र दरवाजे से नहीं हटी थी। गीतों की मधुर धुनों के बीच रेडियो पर बार बार मौसम खराब होने और भयंकर तूफान आने की चेतावनी प्रसारित की जा रही थी। एक एक पल बरस के समान गुजर रहा था उसका। उसके आने भर की खबर ने ही उसके मन में प्रेम की कंपोले अंकुरित कर दी थी। उसकी जागती आँखे न जाने कितने स्वप्न सजो रहीं थी। पिछले सप्ताह से ही पूरे घर को उसकी पसन्द का सजाने में लगी थीं वो। घर की हर चीज उसके हिसाब से सजी थी। मौसम की वजह से रेडियो का सिग्नल लड़खड़ाने लगा था। साढ़े चार बजने को थे और सुनील का न कोई फोन न कोई ख़बर।  "इतनी देर क्यों लगा दी..........? और कितना इंतज़ार करूँ.........? सब ठीक तो है ना....?" उसके मन में एक पल में न जाने कितने विचार कौंध रहे थे। बाहर भी तूफ़ान, अन्दर भी तूफ़ान । उसका मन बहुत घबरा रहा था। वो भारी मन से बाल्कनी में आ गई। चारों ओर अंधेरा पसरा पड़ा था, दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। ये उसके सब्र की इंतहा थी।
"ट्रिंग........ ट्रिंग....... ट्रिंग........ ट्रिंग" फोन की रिंग बज उठी। फोन की रिंग सुनकर वाणी का चेहरा खिल उठा।
वाणी ने दौड़कर फोन उठाया। "हेलो.....हेलो" खराब सिग्नल की वजह से आवाज़ साफ सुनाई नही दे रही थी उसे।
"हेलो....."
"हैलो..... वाणी मैं सुनील बोल रहा हूँ....."
"हाँ.... बोलिये....कहाँ हैं आप?"
" आई एम सॉरी! वाणी।.......मेरी फ़्लाइट मौसम खराब होने की वजह से रद्द हो गई है। दूसरी फ़्लाइट मौसम ठीक होने तक नही है। मौसम का क्या भरोसा कब तक ठीक हो।..... तब तक मेरी छुट्टियां पूरी हो जाएगी.........हेलो...... आवाज़ आ रही है?।"
"हाँ..... मैं सुन रही हूँ...... हेलो।"
"आई एम सॉरी! शायद इस बार भी तुमसे मिलना नही होगा........ सॉरी!............" फोन डिसक्नेक्ट हो गया।
"हेलो............हेलो.............हेलो......." वाणी चीखती रही पर  सामने से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। वो निःशब्द फोन को कान से लगाये खड़ी रही। एक पल को लगा जैसे वो जड़ हो गई हो, वक़्त थम गया हो और हृदय ने धड़कना बन्द कर दिया हो। वो सुन्न, निढ़ाल, बूत बनी खड़ी रही। उसकी आँखे भर आई । आँखों से बहते आँसू गालों पर लुढ़कने लगे। अचानक तूफ़ान ने पूरी ताकत से प्रहार किया सभी खिड़कियां और दरवाजे खुल गए और बरसात के बादल फट पड़े।
ऐसा लग रहा था जैसे आसमान का सीना फट गया हो■■■■■■■
                   सुनील पंवार रावतसर।

डायरी 2001

                                    डायरी 2001

दिन के ग्यारह बजने वाले थे । मै बार-बार घड़ी देख रहा था । अचानक डोर बेल बजा। दरवाजा खोला तो सामने हरी था । जो हर महीने पुराने अखबार और किताबें लेने आता है । मैं उसे स्टडी रूम  की तरफ़ ले गया और किताबें निकाल कर देने लगा । मुझे बचपन  से किताबें पढ़ने का बहुत शौक रहा है । किताबें ही आपकी सबसे अच्छी दोस्त होती है जब आप निहायत तन्हा होते हैं । ये आपका विरोध नही करतीं पर आपको सही रास्ता जरूर दिखा देती है । " ये डायरी आपके काम की है ?" हरी के हाथ में एक रेड कवर डायरी थी । "ये तो वर्ष 2001 की है।" मैंने हरी के हाथ से डायरी ले ली । "ये बहुत काम की है। कहाँ से मिली ?"  "यहीं किताबों के बीच । ये तो बहुत साल पुरानी है वकील साहब । कुछ खास लिखा है क्या इसमें ? " "नहीँ कुछ खास नही । ये मेरे स्कूल टाइम की डायरी है। मुझे तब से ही लिखने का शौक रहा है । तुम किताबें  पैक कर लो, मैं ड्राइंग रूम में तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ ।" मैं हरी को स्टडी रूम में छोड़ कर ड्राइंग रूम में आ गया । मैं आराम कुर्सी पे बैठ कर  रेड कवर डायरी को पढ़ने लगा । डायरी के पन्नों के साथ-साथ वक्त भी पलटता गया और अतीत ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया । बीता हुआ एक-एक पल आँखों के सामने तैर रहा था । 
बात 2001 की है, जब मैं जूनियर क्लास में पढ़ता था। मेरी उम्र महज़ सोलह वर्ष रही होगी । उम्र का ऐसा दौर , जिसमें  बचपन रुखसत हो  चुका था और लड़कपन नये सपने,. नयी चाहत, और जुनून के साथ जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने को बेताब था । इस दौर में अक्सर लडखड़ाने का डर सताता रहता है। मैंने एक किताब में पढ़ा था लड़कपन बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह होता है। कभी भी एक्सीडेंट हो सकता है । शायद ये सही भी है । हर युवा की तरह मेरे अन्दर भी उम्र के लिहाज़ से मानसिक और शारीरिक बदलाव साफ नज़र आने लगे थे । मन हसरतों से भरा पड़ा था।  ********************
सेंट जेवियर स्कूल । शहर के सबसे बड़े स्कूल के वार्षिक समारोह में रूप मुझे भी अपने साथ ले गया । यहीं देखा था मैंने उसे पहली बार। गोरा रंग, सुनहरे बाल, बिलौरी आँखें । बिल्कुल कहानियों की परी जैसी। और उसकी नृत्यकला तो कमाल की थी । एक पल के लिये भी कोई उससे नज़र हटा ले । ये सम्भव ना था । मैं तो उसे एक-टक देखे ही जा रहा था । ये पहली बार था, जब मैंने किसी के प्रति आकर्षण महसूस किया था। जिया नामक था उसका । यहीं से शुरु हुआ एक अनकही , भूलीबिसरी, एक तरफी प्रेम कहानी का दौर । प्रेम कहानी कहें या आकर्षण ? ये मैं आजतक नहीं समझ पाया । उसी दिन से मेरे अन्दर एक अजीब सा बदलाव था । शायद मैं उसे पसंद करने लगा था । शायद क्या ? सचमुच पसंद करने लगा था । मेरे पास उसका पूरा शेडयूल था । कोचिंग क्लास ,डाँस क्लास ,स्कूल टाइम । सब । मैं हर रोज बड़ी हिम्मत के साथ उसे देखने उसके रास्ते में खड़ा होता पर उसके सामने जानें की हिम्मत कभी जुटा ही नहीं पाया । उसे तो कभी अहसास ही नहीं हुआ की कोई उसकी एक झलक पाने की चाह में हर रोज उसके राह में बेताब खड़ा रहता है ।
रूप हमेशा कहता था की मैं जाके जिया को सब कुछ  बोल दूँ। या फिर उसके पीछे अपना वक्त बर्बाद ना करूँ । पर ये मेरे लिये सम्भव नहीँ था । मुझे अंजाम का डर था । मुझे पता था उसका जवाब क्या होगा। उसकी ना सुनने की हिम्मत नहीँ थी मुझमें । वो मुझसे श्रेष्ठ थी। हर तरह से श्रेष्ठ । वो शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ती थी जबकि  मैं गवर्नमेंट स्कूल में । वो ऑफिसर की बेटी थी तो  मैं किसान का बेटा । वो सीनियर थी मैं जूनियर । वो आत्मविश्वासी थी, मैं संकोची । वो आत्मविश्वास से लबरेज़ थी । मेरी स्थित हर तरफ़ से उसके विपरीत थी । मुझमें ऐसी कोई खाशियत नहीँ थी जो किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखती हो । वो मुझे पसंद करती भी तो इसकी कोई वजह नहीं थी । दो साल गुजर गये इसी कशमश में ।  वक्त बढ़ता गया और मेरा तनाव भी ।      *******************
एक सप्ताह बीत गया था जिया को देखे हुए । ना कॉलेज जाती ,ना कोचिंग । मैं हर रोज़ की तरह रास्ते में उसका इंतजार करता , पर उसकी कोई खबर नहीं थी । मेरा मन बहुत खराब रहता । मन में अजीबोगरीब ख़याल आते रहते । यकीन मानीये ये ऐसा वक्त  था जब मैं दर्द , सम्वेदना , प्रेम और तनाव हर मंजर से गुजर रहा था ।***********
उस दिन सीने को चीर देने वाली सर्द हवायें चल रही थी । दरख्तों के पत्तों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था जैसे चीख-चीख कर मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रहें हो । रुप एकटक मुझे देख रहा था । उसकी आँखों में  बहुत उदासी थी। वो मुझसे कुछ कहना चाह रहा था पर शायद उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी । "क्या हुआ?'' मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा। वो सिर्फ मुझे देखे जा रहा था । शांत । उदास । उसके मुँह से एक बोल तक नहीं फूटा । बस देख रहा था मुझे। '' क्या हुआ ? कुछ तो बोल यार ।" वो कुछ नहीं बोला । अपनी जेकेट से एक लिफाफा निकाल कर मेरी और बढा दिया । वो किसी की शादी का कार्ड था जो हमारे प्रिंसिपल सर के लिए भेजा था । " ये क्या है ? ये तो प्रिंसिपल सर का है, मुझे क्यों दे रहा है ?" "इसे पढ़ लो ।" वो सिर्फ इतना ही बोला । मेरी आँखे कार्ड पर ही ठहर कर रह गयी थी । वो जिया की शादी का कार्ड था । मैं स्तब्ध खड़ा रहा । ऐसा लगा जैसे ढेरों मलबे के नीचे दब गया हूँ और कहीं से कोई आवाज़ नहीं सुन रहा है । हवायें और तेज हो गई थी । मैं अपलक कार्ड पर लिखे जिया के नाम को देख रहा था । सिर्फ नाम । "हो गया । वकील साब ।" हरी की आवाज़ ने मेरे अतीत की यादों के क्रम को तोड़ दिया। "सब हो गया सर । अब मैं चलता हूँ ।" हरी के जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद किया और फिर डायरी खोल ली। पर डायरी के आगे के सारे पन्ने बिल्कुल खाली थे। शायद यहीं सब ख़त्म हो गया था । अगर कुछ बचा था तो सिर्फ डायरी । और इस तरह मेरे दिल में जज्बात , और डायरी में अल्फाज। दोनों हमेशा के लिए दफन हो कर रह गये ।

सुखिया भाग 1

                                                          सुखिया


अब तो जैसे सब कुछ बदल गया था। तीस साल पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। चारों ओर रेगिस्तान पसरा हुआ था, ना पक्की सड़कें थीं, ना बिजली और ना ही पानी की कोई सुविधा। चारों ओर रेत के टीले और उन पर कांटों की मेड़ से घिरे कच्चे मिट्टी के मकान। पूरे गांव में सिर्फ दो चीजें प्रसिद्ध थी, एक गाँव के बीच बना जोहड़, जिसमें इंसान और जानवर दोनों एक साथ नहा सकते थे और दूसरा शिव जी का पुराना बड़ा मन्दिर। घर से एक किलोमीटर दूर एक सार्वजनिक हैंडपंप था जिससे गाँव के लोग पीने का पानी लाते थे। पानी की किल्लत इतनी थी कि एक मटकी पानी के लिए भी बहुत लंबी कतार से गुजरना पड़ता था। सुखिया तक़रीबन सात वर्ष का रहा होगा, पर  सीखने के प्रति उसकी जिज्ञासा सागर की तरह विस्तृत थी। ऐसा लगता था मानो वो सारी दुनियां का ज्ञान उसी उम्र में पा लेना चाहता था। वो अपने आसपास की घटनाओं को बड़ी गौर से देखता और फिर उनकी सूक्ष्म जाँच शुरू कर देता। जिससे भी मिलता सवालों की झड़ी लगा देता। सब उसकी इस आदत से हैरान रह जाते कि एक छोटा सा बच्चा इतने सवाल लाता कहाँ से था? अपनी बाई (बड़ी बहन) के साथ हैंडपंप से पानी लेने सुखिया ही जाता था। पानी लेकर लौटते समय सुखिया ने अपनी बाई से पूछा "बाई। जब तुमने नलके (हैंडपंप) से पानी भरा था तो उस बूढ़ी औरत ने नलके को नहलाया क्यों था?"
"नहलाया नहीं बावळे। धोया था नलके को।" बाई ने जवाब दिया।
"धोया क्यों?"
"क्योंकि हम नीच जात हैं ना इसलिए।"
"नीच जात क्या होता है? नलके को धोने का क्या मतलब?"
"तू नहीं समझेगा"
"तो समझाओ बाई"
"हम नीच जात हैं। हमारे हाथ लगे थे नलके को। इसलिए  धोया था ताकि नलका शुद्ध हो जाए। अब ज्यादा दिमाग मत खा। आँधी आने वाली है जल्दी से चल।" बाई तो जैसे सुखिया के सवालों से पीछा ही छुड़ाना चाहती थी। सुखिया बाई के जवाब से अभी भी संतुष्ट नहीं था। वो तो बहुत कुछ जानना चाहता था, पर बाई से पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी उसकी। सुखिया चुप रहता भी तो कितनी देर। जैसे ही वो दोनों शिवजी के मंदिर के पास पहुंचे, सुखिया फिर से शुरू हो गया।
"बाई। मुझे भी मन्दिर दिखा लाओ। मुझे वो बड़ा घण्टा बजाना है।" सुखिया ने मन्दिर में लगे घण्टे की और इशारा करते हुए कहा।
"बावळा है क्या तू? कितनी बार कहा है हम मन्दिर में नही जा सकते।"
"हम मन्दिर में क्यों नहीं जा सकते बाई?"
"अरे! बताया तो था हम नीच जात है। मन्दिर में नहीं जा सकते। कैसे समझाऊं?"
" बाई, जो हमारे घर थान (घर में बना छोटा मन्दिर) है उसका भगवान और इस मन्दिर का भगवान अलग अलग है क्या?"
"नहीं। भगवान तो सारे एक ही होतें है।"
"तो क्या हमारे थान का भगवान नीच जात है?"
"नहीं। ऐसा नही बोलते। भगवान कभी नीच नहीं होते।" बाई ने सुखिया को समझाने का पूरा प्रयास किया पर सुखिया तो बाल की खाल उधेड़ना चाहता था।
"बाई। क्या भगवान मन्दिर में ही मिलतें है? अगर ऐसा हुआ तो हम भगवान से कभी नहीं मिल पाएंगे ना?" सुखिया ने एक और मासूम सवाल दाग दिया।
"नहीं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। भगवान सिर्फ मन्दिर में मिले ये जरूरी नहीं है। भगवान तो कण कण में बसा है।"
"कण कण में? क्या इस रेत में भी भगवान है बाई?"
सुखिया ने ज़मीन पर पड़ी तपती रेत की और इशारा करते हुए पूछा।
"हाँ। इसमें भी भगवान है। अब तू जल्दी चल आँधी आने वाली है। अभी घर भी दूर है।" बाईं ने सुखिया का हाथ पकड़ा और घर की और तेज़ी से बढ़ने लगी। वे दोनों कुछ ही दूर चले थे कि आँधी का एक धूल भरा बवंडर उठा और चारों ओर धूल धूल ही बहनें लगी। तेज़ आँधी से सुखिया तनिक भी नहीं घबराया, वो तो मन ही मन खुश था उसे लगा जैसे भगवान खुद उससे मिलनें आयें हों। चारों ओर भगवान ही भगवान है।।■■■
                             सुनील पंवार

सुखिया भाग 2


                                            सुखिया भाग 2


वो बड़े ही भारी मन से पाँव उठा रहा था। उसका मन ही नही कर रहा था जाने का। पर बाई उसे जबर्दस्ती ले जा रही थी। धूप काफ़ी चढ़ आई थी। सुखिया के माथे पर पसीने की बूंदें गर्मी की वजह से कम; परेशानी की वजह से ज्यादा थीं। आज बाई सुखिया का दाखिला गांव की पाठशाला में करवाने जा रही थी। और ये सुखिया के लिए बड़े ही सकंट की घड़ी थी।
"बाई। तुम बापू को समझाती क्यों नहीं? मैं पढ़कर क्या करूँगा?"
"तू अनपढ़ रह के भी क्या करेगा?" बाई ने सवाल का जवाब सवाल से ही दिया।
"मैं खेत में बापू की मदद करूँगा। तुम्हारे काम में भी मदद करूँगा। बाई...अगर मैं पाठशाला में जाऊँगा तो तुम्हारे साथ पानी लेने कौन जाएगा? बापू की रोटी देने खेत कौन जाएगा? तुम अकेली हो जाओगी बाई।" सुखिया बातें बनाने में तो माहिर था, पर आज उसकी दाल गल्ति नज़र नही आ रही थी।
"तू मेरी फिक्र ना कर। मेरा क्या है मैं तो पराया धन हूँ। बापू मेरा ब्याह कर देगा, तो मैं तो चली जाऊँगी।"
"तुम कहाँ चली जाओगी बाई?" सुखिया ने बड़े आश्चर्य से पूछा।
"अपने घर...और कहाँ?" बाई ने उत्तर दिया।
"तो क्या बापू का घर तुम्हारा नहीं है? और ये पराया धन क्या होता है?"
"बेटी पराई होती है। वो ब्याह के बाद दूसरे घर चली जाती है।"
"बापू मेरा ब्याह कर देगा तो क्या मैं भी चला जाऊंगा?" सुखिया के मासूम सवाल में बड़ा आश्चर्य था।
"हाहाहा। बावळे। छोरे थोड़े ही जाते हैं पराए घर। बेटियां होती है पराई।" बाई ने सुखिया को समझाने का पूरा प्रयत्न किया, पर सुखिया इतनी जल्दी कहाँ संतुष्ट होने वाला था।
"मैं तुम्हे नही जाने दूँगा बाई।"
"अरे! ये तो दुनियां की रीत है बावळे। तू इसे कैसे बदलेगा?" बाई मन ही मन उसके मन की बेचैनी महसूस कर रही थी।
"चल। अब चुप हो जा। पाठशाला आ गई। और हाँ, ज्यादा बोलना मत। कहीं ऐसा ना हो कि वहाँ भी सवाल जवाब शुरू कर दे।  ना ही शरारत करना, नहीं तो कान खींच लूंगी तेरे।" बाई ने अपने हिसाब से सुखिया को पूरी तरह समझा दिया था, पर सुखिया इस पर कितना अमल करेगा ये तो वो ही जानता था। वे दोनों पाठशाला पहुँच गए। "राम राम गुरुजी।" बाई ने मास्टर जी का अभिवादन किया। "मैं मदनां की छोरी... और ये मेरा भाई सुखिया है। बापू ने बोला है इसका दाखिला पाठशाला में करवाने का।" बाई ने मास्टर जी को बताया।
"पाठशाला में दाखिला तो हो जाएगा बाई पर......." मास्टर जी बीच में ही अपनी बात पर अटक गए।
"पर...क्या गुरुजी?" बाई ने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
"बाई तुम्हे तो पता है इस स्कूल में तुम्हारी जात का कोई नहीं पढ़ता....इसलिए; सुखिया को अपना पानी और टाट (बैठने के लिए बिछाने की दरी) घर से ही लानी होगी।" मास्टर जी ने बाई से झिझकते हुए कहा।
"कोई बात नहीं गुरुजी। मैं खुद इसके लिए टाट और पानी ला दिया करूंगी.... बस सुखिया पढ़-लिख ले।" बाई ने मास्टर जी को आश्वस्त किया। सुखिया उन दोनों की बातें बड़ी ध्यान से सुन रहा था। आखिर सुखिया था चुप रहता भी तो कब तक।
"गुरुजी....आप तो बहुत पढ़े हो....एक बात बताइए। बाई कह रही है कि वो परायाधन है। मैं नहीं हूँ... बापू जब बाई का ब्याह कर देंगे तो वो अपने घर चली जायेगी। ऐसा क्यों?"
"बेटी पराई होती है, बेटा नहीं। क्योंकि ये दुनियां की रीत है। इसे बदला नहीं जा सकता।" मास्टर जी ने सुखिया के सवाल का जवाब दिया, पर मास्टर जी को क्या पता था कि अब उनपर सवालों की बारिश होने वाली है।
"गुरुजी। मैं यहाँ इस पाठशाला में पानी क्यों नहीं पी सकता?......और घर से टाट क्यों लाऊं?.....यहाँ तो बहुत सारी टाट है।"
"सुखिया। तू नहीं समझेगा। बाई को पता है, तू नीच जात है। अगर तू यहाँ का पानी पीयेगा और इन बच्चों के साथ बैठेगा  तो बाकी के बच्चे अपनें घर पर मेरी शिकायत कर देंगे। मास्टरजी सुखिया को समझाने में जुटे थे, पर सुखिया मास्टर जी को समझाने का मन बना चुका था।
"तो मैं कब बैठ पाऊँगा इनके साथ गुरुजी?"
"शायद.... कभी नहीं। क्योंकि ये दुनियां की रीत है।"
"रीत बदली नहीं जा सकती क्या गुरु जी?"
"सदियों से चली आने वाली रीत कभी नहीं बदलती सुखिया।"
"पढ़ लिखकर भी नहीं?"
"शायद..... नहीं।" गुरुजी के शब्दों में बेबसी झलक रही थी। सुखिया ने एक नज़र बाई की तरफ देखा, फिर घर की और भाग खड़ा हुआ।
"सुखिया........सुखिया....... कहाँ जा रहा है?.......रुक।"  बाई उसे आवाज़ लगती रही। सुखिया थोड़ा रुका और पीछे मुड़कर बोला। "घर आ जाओ बाई। अगर पढ़लिख कर भी रीत ही नहीं बदली जा सकती तो फिर गुरुजी की तरह पढ़ने का क्या फ़ायदा? मैं ऐसे ही ठीक हूँ।" और फिर तेज़ कदमों से दौड़ने लगा। बाई भी सुखिया को पकड़ने तेज़ी से दौड़ी, पर सुखिया कहाँ हाथ आने वाला था। वो अपने कदमों से उड़ती हुई धूल में जल्द ही बाई की आँखों से औझल हो गया।◆◆◆◆◆
सुनील पंवार एडवोकेट

सुखिया भाग:- 4


                             सुखिया भाग:- 4

दूर से सुनाई दे रही ढोल की मधुर आवाज़ उसे बड़ी विचलित कर रही थी, वो ढोल की ध्वनि की दिशा में बार-बार बार देख रहा था। सुखिया को नाचने का बड़ा शौक रहा था जहाँ कहीं भी ढोल की आवाज़ सुनता तो ढोल की थाप पर थिरके बिना नहीं रहता। सुखिया ने बाई से कई दफ़ा कहा कि वो उसे ढोल वाले को दिखा लाये, पर बाई घर के कामों इतनी व्यस्त थी कि उसके लिए घर से निकलना सम्भव नहीं था और सुखिया को अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी। मन मारकर सुखिया को घर मे ही रहना पड़ा, पर उसका मन तो ढ़ोल की आवाज़ में ही अटका था।
"ए सुखिया! जा मेरे लिए एक बीड़ी का बंडल और माचिस की डिबिया ले आ।" बापू ने सुखिया को दो रुपये का नोट थमाते हुए कहा।
"और सुन! जल्दी आना, मुझे खेत जाना है। कहीं इधर-उधर मुँह फाड़ते मत रहना। बीड़ी लेते ही सीधे घर आना। समझे?" बापू ने सुखिया को समझाते हुए कहा।
सुखिया को तो जैसे मुँह मांगी मुराद मिल गई हो। वो तो बस किसी बहाने से घर से बाहर निकलना ही चाहता था। वो घर से निकला और सेठ की दुकान की तरफ चल पड़ा। वो जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था वैसे ही ढ़ोल की आवाज़ भी उसके सामने ही चली आ रही थी। अब तो सुखिया और भी व्याकुल हो रहा था। वो ध्वनि की दिशा में जाना तो चाहता था पर बापू की दी हुई सख्त हिदायद उसके मस्तिष्क में थी। वो रास्ते के बीच रुक गया। कुछ देर सोच विचार करने के बाद दौड़ा-दौड़ा ढ़ोल की ध्वनि की और मुड़ गया।
वो कच्चे रास्ते से होता हुआ एक संकरी गली की और बढ़ गया। कुछ ही देर में वो गाँव के गुवाड़ (गाँव के बीच खाली जगह, जहाँ सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है) पहुँच गया। ढ़ोल वाले के इर्दगिर्द बच्चों का जमघट   था। एक तरफ पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर गाँव के बुज़ुर्ग और महिलाएं ढ़ोल की थाप का नज़ारा उठा रहे थे। उन्ही के बीच एक मंगता (भिखारी) सभी दर्शकों से अपना कटोरा बढ़ा कर भीख मांग रहा था। ढ़ोल वाले ने कुछ पल के लिए ढोल बजाना बन्द कर दिया और चबूतरे पर बैठकर सुस्ताने लगा। मंगते ने अपना काम जारी रखा। वो एक के बाद दूसरे के सामने कटोरा बढ़ाता और पैसों की माँग करता। धीरे-धीरे वो बढ़ता हुआ सुखिया के पास आ गया।
"ऊपर वाले के नाम पर कुछ देदे बच्चे!"
भिखारी की बात सुनकर पूरा गुवाड़ हंसी के ठहाकों से गूँज उठा। सुखिया को पता था कि वो सब लोग उस पर ही हंस रहे हैं, पर उसने संयम बनाये रखा।
"अरे! तुम इससे भीख मांग रहे हो? इसका तो बाप खेतों में काम करता है, और इसकी माँ लोगों के घर सफ़ाई करती है। ये  तुझे क्या देगा?" एक बच्चे ने सुखिया की मज़ाक उड़ाते हुए कहा।
"और ऊपर से नीच जात है, सो अलग।" एक तरफ खड़े युवक ने भी अपना ज्ञान पेलना शुरू कर दिया।
"अरे सुखिया! तू तो बड़ा आदमी बन गया रे। तुझसे तो भीख भी माँगने लगे हैं।" एक बुज़ुर्ग व्यक्ति भी इस दौड़ में शामिल हो गया।
"अरे भाई तू आगे बढ़! यहाँ तुझे क्या मिलने वाला है, ये तो ख़ुद माँग तांग कर गुज़ारा करते हैं।" उसने भिखारी को सलाह दी।
अब सुखिया का सब्र टूट चुका था और वैसे भी सुखिया कितनी देर चुप रहने वाला था।
"ओ ताऊ! एक बात बता। मैं तो कुछ देने के लायक नहीं हूँ, मेरी माँ लोगों के घर में सफाई करती है, बापू खेत में मजदूरी करता है, पर तु तो अच्छे खासे घर का है, फिर इस भिखारी का कटोरा खाली क्यों है? तुमने दिया नही क्या कुछ?" सुखिया की बात सुनकर एक बारगी तो सन्नाटा छा गया।
"देने के लिए कलेजा चाहिए ताऊ! जो तेरे पास नहीं है" अब सुखिया की इस बात पर तो पूरा गुवाड़ ठहाकों से गूंजना ही था।
सुखिया आगे बढ़ा और चबूतरे पर विराजमान ढोली के पास गया।
"एक घण्टे ढ़ोल बजाने के कितने पैसे लोगे?
"पाँच रुपया!"
"दो रुपये में बजाओगे?"
ढोली कुछ सोचता रहा और फिर दो रुपये में राजी हो गया। उसने ढोली की तरफ दो रुपये का नोट बढ़ा दिया जिसे ढोली ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
सुखिया ने मंगते को अपनी और आने का इशारा किया और धीरे से बोला।
"सारे पैसे उठा लेना,सिर्फ़ दो रुपये मुझे दे देना।" इससे पहले की भिखारी कुछ समझ पाता ढोली ने ढ़ोल को थाप देना शुरू कर दिया।
सुखिया ने ज्योहीं पर ढ़ोल पर थिरकना शुरू किया पूरा वातावरण हंसी और मौज भरी आवाज़ों से गूँज उठा। सुखिया पूरी लगन और आनन्द में डूबा नृत्य का लुत्फ़ उठा रहा था। देखते ही देखते लोगों का हुज़ूम गुवाड़ में उमड़ पड़ा और पाँच, दस और बीस पैसों के सिक्कों की बौछार होने लगी। मंगता नृत्य देखने में कम बल्कि पैसे इक्कट्ठे करने में अधिक व्यस्त था। चारों और हास्य और मस्ती बिखर गई थी। जो अब तक सुखिया का उपहास कर रहे थे वही अब उसका हौसला बढ़ा रहे थे।
"वाह सुखिया वाह! क्या बात है! तुम गाँव की शान हो।" भीड़ में से आ रही आवाज़े सुखिया का मनोबल बढ़ाने के लिए पर्याप्त थीं। अब सुखिया को समय की कोई परवाह नहीं थी, वो तो बस मस्ती में मस्त था। उधर जब बहुत देर होने के बाद भी सुखिया घर नही पहुँचा तो बाई उसे ढूढने निकल पड़ी। बाई को भी पता था कि सुखिया कहाँ मिल सकता है। वो ढ़ोल की आवाज़ की तरफ निकल पड़ी।
बाई गुवाड़ में उमड़ा लोगों का हुज़ूम देखते ही समझ गई कि सुखिया ने अपना करतब दिखाना शुरू कर दिया है।
वो भीड़ को चीरती हुई मस्ती में मस्त सुखिया के पास पहुंच गई और ढोली को रुकने का इशारा किया।
ढोल की थाप एकाएक रुक गयी, जो सुखिया को ना-गवार गुजरी।
"ढोल बजाना क्यों बन्द किया?" उसने जोर की आवाज़ में पूछा।
ढोली ने बाई की ओर इशारा किया तो सुखिया ने पलट कर पीछे देखा।
बाई को देखकर सुखिया की सिटीपीटी गुम हो गई।
मंगता अभी भी सिक्के चुनने में व्यस्त था।
"तुझे कहा था ना यहाँ नही आने का! फिर क्यों आया?" बाई का लहज़ा बड़ा सख्त था। सुखिया से अब कोई जवाब देना ना बन रहा था। वो सकपका गया। भीड़ भी अब छंटने लगी थी। "तुझे बापू की बीड़ी लाने के लिए भेजा था और तू यहाँ नाचने में लगा है। बापू अब तुझे पीट-पीट कर मार देगा। कहाँ है बापू की बीड़ी और बाकी के बचे पैसे?" बाई का पारा चढ़ गया।
"बीड़ी तो ली ही नहीं! वो पैसे तो ढोली को दे दिए।" सुखिया ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया।
"क्या? अब बीड़ी कहाँ से लायेगा?"
"इस मंगते से लेने है दो रुपये बाई।" सुखिया ने मंगते की इशारा करते हुए देखा तो दंग रह गया। मंगता गायब था। वो सारे पैसे लेकर रफूचक्कर हो गया। सुखिया ने इधर उधर देखा पर उसका कोई नामोनिशान तक नहीं था।
सुखिया ने अपने माथे पर जोर से हाथ मारा और ज़मीन पर बैठ गया।
"अब क्या हुआ?"बाई ने गुस्से और उत्सुकता के मिश्रित लहज़े में पूछा।
"कुछ नहीं बाई। लगता है बापू की बीड़ी के लिये एक घण्टा और नाचना पड़ेगा।"
अब ढोली ही उसका आखरी सहारा था।■■■◆◆◆

सुखिया भाग 3

                                   सुखिया भाग 3

चौराहे के बीचों बीच रखे ठीकरे को सुखिया बड़े गौर से देख रहा था। लड्डू, बिंदिया और सिंदूर के साथ-साथ पाँच, दस और पच्चीस पैसे के सिक्के भी रखे थे उसमें। इसे स्थानीय भाषा मे टूणा (टोना)  या ठीकरी निकलना कहतें है। प्रायः देवी देवताओं को प्रसन्न करने और गृह दोष दूर के लिए कुछ सामग्री भेंट स्वरूप ठीकरे में रख कर उन्हें देवताओं को अर्पित किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भी सबसे पहले टोना के ऊपर से गुजरेगा, सारी बलाएं उसी पर होगी। लड्डुओं को देख कर सुखिया का मन ललचाने लगा था। उसने अपने नन्हे साथियों को लड्डू उठा लाने को कहा, लेकिन कोई भी लड्डू उठा लाने की हिम्मत नही कर पाया। सब को डर था कि कहीं कोई बला उन पर न आ जाये। सुखिया अपने लक्ष्य पर नज़र गड़ाये बैठा था, की सेठजी की आवाज़ ने उसका ध्यान भंग कर दिया।
"माफ कीजिए मास्टरजी। बालक है, अज्ञानी है,जो आप पर मिट्टी फेंक दी।" हाथ जोड़े सेठजी मास्टर जी से क्षमा याचना कर रहे थे। सेठजी के बेटे ने राह गुजरते  मास्टर जी पर मिट्टी जो फेंक दी थी।
"कोई बात नहीं सेठजी।" मास्टरजी कपड़ों से धूल झाड़ते हुए बोले।।
"मैं अभी इसके कान खींचता हूँ।" सेठजी गुस्से में अपने बेटे की ओर लपके।
"अरे! कोई बात नहीं सेठजी। बच्चा है। बच्चे तो भगवान का रूप होता है, भला भगवान को क्या सज़ा दी जा सकती है। छोड़ दीजिए।" मास्टरजी ने विनम्रता से कहा।
सुखिया उन दोनों की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। दो लोग आपस में बात करे और सुखिया चुप रह जाये, भला ये कैसे संभव हो सकता था। सुखिया मास्टरजी के नज़दीक गया और बोल पड़ा। "गुरुजी सिर्फ सेठजी का बेटा ही भगवान का रूप है या.... हम भी है? सुखिया ने अपनी और अपने साथियों की ओर इंगित करते हुए बोला।
"बिल्कुल। सभी बच्चे भगवान का रूप होते हैं, चाहे कोई भी हो। तुम भी हो सुखिया।" मास्टरजी ने सुखिया को संतुष्ट करने की कोशिश की।
"तो फिर सेठजी को समझाइए गुरुजी। ये तो हमें देखते ही भगा देतें है।" सुखिया ने सेठजी की ओर इशारा करते हुए कहा।
"ए सुखिया। फालतू बात मत कर। चल...भाग यहाँ से।" सेठजी झल्लाये।
"ये लो... देख लो गुरुजी।" सुखिया ने सेठजी की ओर पुनः इशारा किया।
मास्टरजी सुखिया की बात पर बिना मुस्कुराये नहीं रह सके।
"तू पाठशाला क्यों नहीं आता सुखिया? क्यों सारा दिन आवारा घूमता रहता है?" मास्टरजी ने सुखिया से पूछा।
"कल से जरूर आऊँगा गुरुजी।" सुखिया ने आज फिर मास्टरजी को गोली दे दी।
मास्टरजी मुस्कुराते हुए पाठशाला की ओर चल पड़े। सुखिया ने भी निर्भीकता से ठीकरे की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिये।
"कहाँ जा रहा है सुखिया?" सुखिया के साथी ने पूछा।
"लड्डू उठाने, और कहाँ।" सुखिया ने निडरता से जवाब दिया।
"कोई बला आ गई तो?
"अभी सुना नहीं क्या? गुरुजी ने क्या कहा था? हम भगवान है, हम पर बलाओं का क्या असर?" सुखिया ने ठीकरे से लड्डू उठाये ही थे कि बाई उसे ढूंढते हुए वहाँ आ गई। बाई को देख सुखिया बाई के सामने ही आ गया।
"अरे कहाँ था तू? कब से ढूंढ रही हूं तुझे। चल बापू की रोटी देने खेत चलें।"
"मैं तुम्हारे लिए लड्डू लेने गया था बाई।" सुखिया ने लड्डू बाई की ओर बढ़ा दिया।
"कहाँ से लाया है?"
"बाद में बताऊंगा पहले लड्डू खाओ।" सुखिया ने लड्डू बाई को दिया और अपने साथियों में भी बांट दिया।
"लड्डू बहुत अच्छे हैं सुखिया। कहाँ से लाया?" बाई ने सुखिया से फिर पूछ लिया।
"वो ठीकरा देख रही हो बाई?...उसी में से उठाया है।"
सुखिया ने चौराहे में रखे ठीकरे की ओर इशारा कर दिया।
"हाय! कर्मजले! तूने मुझे टूणे वाला लड्डू खिला दिया?" बाई ने लड्डू को ज़मीन पर पटक दिया।
ज्योंही बाई ने गुस्से से लड्डू पटका, सुखिया खतरनाक स्थित को भांप चुका था और भागने के लिए पूरी तैयारी कर चुका था। बाई ने ज़मीन से छड़ी उठाई और सुखिया की ओर लपकी।
"ठहर जा तू। मैं बताती हूँ तुझे। अगर कोई बला आ गई तो?"
"कोई बला नहीं आयेगी बाई। तुम्हारे लिए तो सुखिया ही सबसे बड़ी बला है।"
सुखिया ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। अब सुखिया को पकड़ना कहाँ मुमकिन था।।■■■■■

सुनील पंवार