Friday, 6 December 2019

सुखिया


                             सुखिया
अब तो जैसे सब कुछ बदल गया था। तीस साल पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। चारों ओर रेगिस्तान पसरा हुआ था, ना पक्की सड़कें थीं, ना बिजली और ना ही पानी की कोई सुविधा। चारों ओर रेत के टीले और उन पर कांटों की मेड़ से घिरे कच्चे मिट्टी के मकान। पूरे गांव में सिर्फ दो चीजें प्रसिद्ध थी, एक गाँव के बीच बना जोहड़, जिसमें इंसान और जानवर दोनों एक साथ नहा सकते थे और दूसरा शिव जी का पुराना बड़ा मन्दिर। घर से एक किलोमीटर दूर एक सार्वजनिक हैंडपंप था जिससे गाँव के लोग पीने का पानी लाते थे। पानी की किल्लत इतनी थी कि एक मटकी पानी के लिए भी बहुत लंबी कतार से गुजरना पड़ता था। सुखिया तक़रीबन सात वर्ष का रहा होगा, पर  सीखने के प्रति उसकी जिज्ञासा सागर की तरह विस्तृत थी। ऐसा लगता था मानो वो सारी दुनियां का ज्ञान उसी उम्र में पा लेना चाहता था। वो अपने आसपास की घटनाओं को बड़ी गौर से देखता और फिर उनकी सूक्ष्म जाँच शुरू कर देता। जिससे भी मिलता सवालों की झड़ी लगा देता। सब उसकी इस आदत से हैरान रह जाते कि एक छोटा सा बच्चा इतने सवाल लाता कहाँ से था? अपनी बाई (बड़ी बहन) के साथ हैंडपंप से पानी लेने सुखिया ही जाता था। पानी लेकर लौटते समय सुखिया ने अपनी बाई से पूछा "बाई। जब तुमने नलके (हैंडपंप) से पानी भरा था तो उस बूढ़ी औरत ने नलके को नहलाया क्यों था?"
"नहलाया नहीं बावळे। धोया था नलके को।" बाई ने जवाब दिया।
"धोया क्यों?"
"क्योंकि हम नीच जात हैं ना इसलिए।"
"नीच जात क्या होता है? नलके को धोने का क्या मतलब?"
"तू नहीं समझेगा"
"तो समझाओ बाई"
"हम नीच जात हैं। हमारे हाथ लगे थे नलके को। इसलिए  धोया था ताकि नलका शुद्ध हो जाए। अब ज्यादा दिमाग मत खा। आँधी आने वाली है जल्दी से चल।" बाई तो जैसे सुखिया के सवालों से पीछा ही छुड़ाना चाहती थी। सुखिया बाई के जवाब से अभी भी संतुष्ट नहीं था। वो तो बहुत कुछ जानना चाहता था, पर बाई से पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी उसकीसुखिया चुप रहता भी तो कितनी देर। जैसे ही वो दोनों शिवजी के मंदिर के पास पहुंचे, सुखिया फिर से शुरू हो गया।
"बाई। मुझे भी मन्दिर दिखा लाओ। मुझे वो बड़ा घण्टा बजाना है।" सुखिया ने मन्दिर में लगे घण्टे की और इशारा करते हुए कहा।
"बावळा है क्या तू? कितनी बार कहा है हम मन्दिर में नही जा सकते।"
"हम मन्दिर में क्यों नहीं जा सकते बाई?"
"अरे! बताया तो था हम नीच जात है। मन्दिर में नहीं जा सकते। कैसे समझाऊं?"
" बाई, जो हमारे घर थान (घर में बना छोटा मन्दिर) है उसका भगवान और इस मन्दिर का भगवान अलग अलग है क्या?"
"नहीं। भगवान तो सारे एक ही होतें है।"
"तो क्या हमारे थान का भगवान नीच जात है?"
"नहीं। ऐसा नही बोलते। भगवान कभी नीच नहीं होते।" बाई ने सुखिया को समझाने का पूरा प्रयास किया पर सुखिया तो बाल की खाल उधेड़ना चाहता था।
"बाई। क्या भगवान मन्दिर में ही मिलतें है? अगर ऐसा हुआ तो हम भगवान से कभी नहीं मिल पाएंगे ना?" सुखिया ने एक और मासूम सवाल दाग दिया।
"नहीं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। भगवान सिर्फ मन्दिर में मिले ये जरूरी नहीं है। भगवान तो कण कण में बसा है।"
"कण कण में? क्या इस रेत में भी भगवान है बाई?"
सुखिया ने ज़मीन पर पड़ी तपती रेत की और इशारा करते हुए पूछा।
"हाँ। इसमें भी भगवान है। अब तू जल्दी चल आँधी आने वाली है। अभी घर भी दूर है।" बाईं ने सुखिया का हाथ पकड़ा और घर की और तेज़ी से बढ़ने लगी। वे दोनों कुछ ही दूर चले थे कि आँधी का एक धूल भरा बवंडर उठा और चारों ओर धूल धूल ही बहनें लगी। तेज़ आँधी से सुखिया तनिक भी नहीं घबराया, वो तो मन ही मन खुश था उसे लगा जैसे भगवान खुद उससे मिलनें आयें हों। चारों ओर भगवान ही भगवान है।।■■■
                             सुनील पंवार