Saturday, 22 February 2020

मिट्टी डाल भी दो यार...

व्यंग्य

                        मिट्टी डाल भी दो यार...

कल शाम एक लॉन्ग ड्राइव से लौटते समय मैं एक चाय की दुकान पर रुक गया। दुकान में ज्यादा भीड़ भाड़ नही थी। कुछ दूरी पर सामने की बैंच पर बैठे दो युवा नेता अपनी बहस में मसरूफ़ थे। मैं उनको बिल्कुल साफ सुन पा रहा था, मुझे उन दोनों की बहस इतनी मज़ेदार लग रही थी कि अगर समय पर चाय मिल गई होती तो अनंत आनंद की अनुभूति हो गई होती।
"क्या... बे हरिया! तू ये फेसबुक पर क्या अंटशंट लिखता रहता है?... क्या हमेशा दलित सम्मान..दलित, सम्मान का रट्टा लगाये रखता है? कितनी बार समझाया है तुझे... समझ नहीं आता क्या?" पंडित जी अपने भगवे पटके को गले में दुरुस्त करते हुए अनवरत प्रश्नों के बाण छोड़े ही जा रहे थे।
"अरे!..तुम लोग हम पर पाँच हजार साल से अत्याचार करते आ रहे हो.. हमसे भेदभाव करते हो..छुआछूत करते हो.. नीच समझते हो! हमें सम्मान से जीने का अधिकार ना है क्या?..अब भी बोलें नहीं क्या..?" हरिया ने भी बड़ी शान से अपने गले में पिरोये नीले पटके को दुसरुस्त किया। दोनों के हावभाव और तेवर से साफ झलक रहा था कि दोनों वर्गसंघर्ष के महानायक बनने की होड़ में अग्रिम पंक्ति में खड़े थे।
"देख हरिया!...क्या हमने तुमसे भेदभाव किया? तुम्हारे साथ खाना नहीं खाया, चाय नहीं पी या तुम्हे अपने घर में नहीं घुसने दिया..? तुम्हे अपने भाई की तरह मानते हैं.. और तुम हो के..! माना के हमारे पूर्वजों ने गलत व्यवहार किया है तुम्हारे साथ पर...इसमें हमारा क्या दोष? पुरानी बातों को कब तक लिये बैठे रहोगे..? अब मिट्टी भी डालो! गड़े मुर्दे उखाड़कर अपने सम्बन्ध क्यों बिगाड़ रहे हो?" पंडित जी लगभग भावुक होने की कगार पर ही थे कि तभी छोटू चाय ले आया। टेबल पर रखी चाय ने दोनों का ध्यान भंग करने में बड़ी सफलता प्राप्त कर ली थी। दोनों ने चाय से भरे कप उठाये और होठों से चिपका लिये।
"हम्म...!" हरिया ने चाय की घूँट भरी और पंडित जी से मुख़ातिब हुआ। " यार बात तो तुम ठीक कहते हो, हम बचपन के साथी है..पुरानी बातों को लेकर हम क्यों अपने सम्बन्ध खराब करें! तुम सही कहते हो पंडित.. मिट्टी डालो यार पुरानी बात पर। चल चाय पी।" अब दोनों के चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी। मेरे मन को भी बड़ा सकून मिला, मैं मन ही मन इस बात से खुश था कि देर सवेर दोनों युवाओं ने बरसों से चले आ रहे इस वर्गसंघर्ष को विराम देने की राह निकाल ही ली। उन दोनों के साथ मैं भी चाय का मज़ा ले रहा था कि हरिया के फोन की रिंग ने रंग में भंग डाल दिया। "हेल्लो...! हाँ निसार भाई बोलो...! अभी पंडित जी के साथ चाय पी रहा हूँ...तुम काम बोलो...! दावत..? ईद की दावत..कब..? आज रात को...? हाँ..ठीक है भाई.. पहुँच जाऊँगा! ओके।"
फोन डिस्कनेक्ट करने के बाद हरिया ने ज्योंही पंडित जी की और देखा..पंडित जी की त्यौरियाँ चढ़ी हुई थी। वो कुछ समझ पाता उससे पहले ही पंडित बोल पड़ा।
"क्या रे हरिया...! तू इन मुगलों की औलादों के साथ क्यों रहता है बे? इनके घर की दावत भी खाता है तू..! क्या तुझे नही पता इन्होंने हमारे साथ क्या किया था? हमारी बहन बेटियों की आबरू लूट ली, हमें ग़ुलाम बनाके रखा, हमारे मन्दिर तोड़ डाले,.. हमारा धर्म बदलवा दिया! और तू है कि इन हरामखोरों से दोस्ती रखता है! मेरा बस चले तो मैं इन सब हरामियों को पाकिस्तान भेज दूँ! मेरा तो एक ही मक़सद है इन मुगलों की औलादों से अपने पर हुए अत्याचारों का बदला लेना! अरे!...तू कुछ बोलता क्यों नहीं...? मुझे इस तरह क्यों घूर रहा है? ऐसे क्यों देख रहा है मुझे...?" पंडित थमा तो लगा जैसे मूसलाधार बारिश थम गई हो।
"मैं ये देख रहा हूँ पंडित...! बड़ी कमाल के आदमी हो यार तुम तो...! हमसे तो बीती बातों पर मिट्टी डलवा दी..... और ख़ुद.....?" इससे पहले कि
हरिया अपनी बात पूरी कर पाता मैं ज़ोर का ठहाका लगाकर हंस पड़ा।।

सुनील पंवार की क़लम से...

चुनावी मुद्दा

लघुकथा                                                       सुनील पंवार
                                    चुनावी मुद्दा

आज सुबह से ही दलित बस्ती में बड़ी गहमागहमी थी। सैंकड़ो युवा कार्यकर्ताओं ने बस्ती के बीचों बीच भव्य पंडाल लगा दिया था। पेयजल व बैठने की भी उचित व्यवस्था कर दी गई थी, और उसमें एक भव्य मंच की सजाया जा चुका था। बस्ती में युवा कार्यकर्ताओं ने घर घर जाकर सभा में उपस्थिति का निमंत्रण देने का कार्य भी पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से किया था, और करे भी क्यों न! स्थानीय निकायों के चुनाव जो थे!
सौ से डेढ़ सौ महिलाएं ही सभा में शामिल हो पायी थीं, इसके अलावा कुछ वृद्ध व्यक्ति भी मौजूद थे, पर युवाओं की उपस्थित तो ना के बराबर ही थी। सारी तैयारियां हो चुकी थीं। सभा आरम्भ होने से पूर्व ही निर्धारित समय पर दलित बस्ती की संकड़ी गलियों का सीना चीरते हुए चमचमाती गाड़ियों का काफ़िला लक्ष्य की ओर बढ़ता चला आ रहा था।
टूटी फूटी सड़के, बिना प्लस्तर के पक्की ईंटों के मकान, ओवर फ्लो नालियों से बहकर जमा हुए पानी से आती दुर्गंध, मकानों की छतों तक चढ़ी सीलन, अर्धनग्न घूमते बच्चे, दुर्गंध मारती नुक्कड़ पर कच्चे मीट की दुकानें, लोहे की चद्दरों से बने घर के दरवाज़े, सड़क की एक तरफ़ देशी शराब की दुकान, और उसके बाहर लगा बेवड़ों का जमावड़ा! स्थिति को और भी भयावह बना रहा था। काफ़िला अपने गन्तव्य तक पहुंच चुका था। अधेड़ आयु के नेताजी गाड़ी से उतरे और सबका अभिवादन करते हुए मंच की और बढ़ गये।
नेताजी ने अपनी सरसरी नज़र सभा में उपस्थित श्रोताओं पर दौड़ाई। कुपोषण और गरीबी के कारण काले पड़ चुके चेहरे और धँसी हुई आँखों में आज बहुत उम्मीदें थी। नेताजी ने एक बार पुनः सबका अभिवादन किया और अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया।
"भाइयो और बहनों... जैसा कि आप सब जानतें है कि इसबार नगर निकाय के चुनाव में मैं मेयर पद का उम्मीदवार हूँ..। और मैं आपकी हर समस्या से अवगत भी हूँ। मैं आपकी सभी समस्याओं का समाधान करने का प्रयत्न करूँगा.. और मैं जानता हूँ कि आपकी बस्ती की सबसे बड़ी समस्या क्या है। नशा! नशा ही आपकी समस्या है। यहाँ मौजूद मेरी माताओं और बहनों ने मुझे इस बारे में पहले ही अवगत करा दिया था की बस्ती के शतप्रतिशत युवा नशे की चपेट में आ चुकें हैं। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपकी बस्ती को पूर्णतया नशा मुक्त करके ही दम लूँगा।
मेरा चुनावी मुद्दा ही नशा मुक्त शहर बनाना है। बस आपका सहयोग, आशीर्वाद और प्रेम की आवश्यकता है। धन्यवाद।" नेताजी के भाषण समापन होते ही तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरा वातावरण ही हिला डाला। नेताजी अभिवादन करते हुए अपने काफ़िले की और बढ़ गए।
"यहाँ तो चुनाव जीतने के सारे अवसर उपलब्ध हैं,
गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और नशा।" नेताजी अपनी बगल में बैठे अपने सहायक से बतिया रहे थे।
"मैं कुछ समझा नहीं सर।" उसने आश्चर्य व्यक्त किया।
"मेरा कहने का मतलब ये है कि यहाँ चुनाव जीतना बहुत आसान है और यहाँ सभी अवसर मौजूद हैं।
तुम कल से ही महिलाओं और बच्चों के लिए भोजन, वस्त्र और चिकित्सा की व्यवस्था करो, और पुरुषों के लिए शराब की। फिर देखना हम कैसे चुटकियों में चुनाव जीतते हैं।" नेताजी अपने सहायक की और मुस्कुराते हुए बोल रहे थे।
दोनों की नज़रे आपस में मिली और फ़िर दोनों ने भेड़िये जैसी मुस्कान के साथ अपने दांत निपोर दिये।।■■◆
सुनील पंवार की क़लम से...

चौकीदार


                     लघुकथा।                 चौकीदार।              सुनील पंवार


रात की ड्यूटी पूरी करने के बाद जब वो घर पहुंचा, तो नौ साल की बिटिया ने एक खूबसूरत मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया। वो मुस्कुरा दिया और रानो की गाल पर बड़े प्यार से अपनी उंगलियों से चुटकी भी काट ली। श्रीमती जी उनके लिये चाय बनाने रसोईघर की ओर कूच कर चुकीं थी।
"कहाँ थे पूरी रात..पापा?"
"मैं अपने काम पर था रानो!" उसने रानो को उठाया और गौद में बैठा लिया।
"पर...! आप तो दिन में जाते हो ना कामपर?" उसने फिर सवाल का तीर छोड़ दिया।
"हाँ..! पर.. अब मैं रात को भी काम पर ही रहूँगा लाडो!"
"रात को क्यूँ?"
"अरे लाडो! आजकल बच्चों को उठाने वाला गिरोह शहर में काफ़ी सक्रिय हो गया है, तो...! मालकिन ने अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए मुझे रात को भी नोकरी पर रख लिया, इसलिए अब रात को भी जाना पड़ेगा।" वो रानो के सिर को बड़े प्यार से सहला रहा था।
"आप उनके बच्चों की रक्षा क्यों करते हो पापा? क्या वो खुद नहीं कर सकते?"
"पैसों के लिए करता हूँ... रानो! वो बड़े लोग है! पैसे देकर चौकीदार रख लेतें हैं, हम जैसे चौकीदार है ना! उनकी सुरक्षा के लिए।" वो उसके हर मासूम सवाल का जवाब बड़ी गम्भीरता से दे रहा था।
"वो तो चौकीदार रख लेंगे पापा पर हमारा क्या? क्या वो बच्चे चुराने वाले उन्हीं के बच्चे चुरायेंगे, हमें नही? आप उनकी रक्षा करते रहोगे तो हमें किसके सहारे  छोड़ोगे पापा? कोई मुझे उठा ले गया तो...? मेरी रक्षा कौन करेगा? मैं भी तो बच्ची हूँ! मेरे लिए चौकीदार रखोगे या भगवान भरोसे ही रहना पड़ेगा?" उसके सवाल ने चौकीदार को निःशब्द कर दिया, उसके पास रानो के सवाल का कोई जवाब नही था। उसने रानो को कसकर अपने सीने से चिपका लिया। अब रानो अपने आप को पूरी तरह से महफ़ूज महसूस कर रही थी।।
सुनील पंवार की क़लम से....

बंद कॉटेज

(कहानी)

*बंद कॉटेज, और ताला नया*
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कहानीकार: सुनील पंवार

अभी एक सप्ताह ही हुआ था मुझे यहाँ शिफ्ट हुए। रोजमर्रा की भागदौड़, दहाड़ें मारती मशीनों की चीखें और वाहनों का शोर सुनना तो जैसे बीती बातें ही रह गई थीं। मुझे बहुत सारी कहानियों पर काम  करना था और शहर की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी से मेरा मोहभंग हो चुका था। शहर में रहकर शायद मैं लेखन का काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से नहीं कर पा रहा था। बचपन के दोस्त शशांक ने शहर से बीस मील दूर अपने फार्म में छोटे छोटे कॉटेज बनाए हुए थे जिनके बीच कम से कम सौ मीटर की दूरी थी। हरे-भरे पेड़, चारों ओर शान्त वातावरण और प्राकृतिक सौन्दर्य की झलक तो देखते  ही बनती थी। एकाकी जीवन जीने के लिए शायद इससे बेहतर कोई जगह नहीं थी। एक सप्ताह में ही मुझे शारिरिक और मानसिक सुकून महसूस होने लगा था। इस कॉटेज में मेरे साथ मेरे दोस्त और सेवक मोहनदादा भी थे। मैं अपने काम में पूरी लगन से व्यस्त था कि मेरा फोन बज उठा........

"हेलो... हाँ शशांक..बोलो।"
"कैसे हो सन्नी? कैसी लगी जगह?" सामने से शशांक ने मेरा हालचाल पूछा।
"अरे ! बहुत बढ़िया! बहुत अच्छी जगह है यार.. तुमने तो बहुत अच्छी व्यवस्था कर रखी है यहाँ,मन करता है सारी उम्र यहीं बस जाऊँ।"
"अरे क्यों नही.. जब तक तुम्हारा दिल करे रह लो।"
"अच्छा ये बताओ अंकल कैसे हैं?" मैंने पूछा
"पापा तो मम्मी की मौत के बाद नेपाल सैटल हो गए..यही कोई तीन साल से... अच्छा ठीक है सन्नी मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ, अगर कोई दिक्कत हो तो कॉल करना! ओके !" फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

मैं फिर से अपने काम में व्यस्त हो गया। उसी शाम मैं मोहनदादा के साथ प्रकृति का आनंद उठाने पूरे फार्म का चक्कर लगाने निकल पड़ा। यहाँ की हर एक चीज ने मुझे प्रभावित किया लेकिन.....! एक कॉटेज जो लगभग सिरे पर था, मुझे बहुत ही अजीब सा लगा। ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से उसमें किसी मनुष्य ने पाँव तक ना रखा हो। ये कॉटेज इस पूरे फार्म की खूबसूरती को धूमिल सा कर रहा था। मैं उस कॉटेज की ओर बढ़ने लगा तो मोहनदादा भी मेरे पीछे- पीछे चल पड़े। चारों ओर से सूखे पत्तों ने उस कॉटेज को लगभग ढक रखा था। हमने उसके चारों ओर एक चक्कर लगाया, पर कोई हलचल नहीं हुई। यहाँ से मेरा कॉटेज सबसे ज्यादा दूरी पर जरूर था पर साफ दिखाई दे रहा था। ये कॉटेज देखने में बड़ा भयानक और भुतहा लग रहा था। एक अजीब बात और थी, देखने में ऐसा लग रहा था जैसे इस कॉटेज को सालों से किसी ने रहने के लिए इस्तेमाल नहीं किया था पर उसका ताला बिल्कुल भी जर्जर नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे उस ताले को समय समय पर खोला गया हो।

"आप यहाँ क्या कर रहे हैं?" मैनेजर साहब के सवाल ने हमारा ध्यान भंग कर दिया।"बस यूँही...घूमने निकले थे।" मैंने उत्तर दिया।"सर्दी काफ़ी बढ़ रही है.. अब आपको चलना चाहिए।" मैनेजर साहब का लहज़ा बड़ा शांत था। मैं साफ़तौर पर महसूस कर रहा था कि उन्हें हमारा वहाँ होना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था। हम दोनों वहाँ से अपने कॉटेज की ओर बढ़ने लगे। मुझे मैनेजर का बर्ताव बड़ा अजीब लगा। वो हमें पीछे से एकटक देखे जा रहे थे। उस रात मेरा मन काम में बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। मैं खिड़की के पास लगी आराम कुर्सी पर बैठ गया। रात के दस बज चुके थे, और सर्दी भी बढ़ गई थी मेरी नज़र उस कॉटेज की तरफ़ ही टिकी हुई थी, हालांकि अंधेरे की वजह से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था फिर भी नज़रें उसी तरफ़ थीं। अचानक मुझे वहाँ कोई हलचल नज़र आई। मैंने मोहनदादा को बुलाया और खिड़की से कॉटेज की तरफ़ देखने को कहा। "लगता है वहाँ कोई है" मोहनदादा ने मेरी ओर देखते हुए कहा।
"लगता तो है दादा।" कॉटेज की दूरी ज्यादा थी पर फिर भी ये अनुमान लगाया जा सकता था कि कोई उस कॉटेज में था। खिड़की से झाँकती हल्की रोशनी ने किसी की मौजूदगी की चुगली कर ही दी थी। हम दोनों के मन में एक बात तो जरूर थी कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है।"कौन हो सकता है दादा?"
"देखते हैं, एक बार शान्त रहकर देखते रहो।" हम आधे घंटे तक यूँ ही खिड़की से सटे रहे और नज़रें कॉटेज पर गड़ाये रखीं और ताकते रहे। कुछ ही देर में कॉटेज गहरे अंधेरे में डूब गया। यही सिलसिला हर रोज चलता रहा। रात को दस बजे के बाद से लगभग आधे या पौने घण्टे तक वहाँ रोशनी दिखाई देती और फिर गहरा अंधेरा। हम जब भी कॉटेज से निकलते मैनेजर साहब की नजरें हम पर ही होती थीं। मैंने कई बार सोचा कि इस बारे में शशांक से बात करूँ पर हर बार वो बात को टाल देता। एक रात जब मैं अपनी खिड़की से झाँक रहा था मैंने देखा एक गाड़ी कॉटेज की तरफ धीरे धीरे बढ़ रही थी। मैंने मोहनदादा को अपने पास बुला लिया। हम एक दूसरे की तरफ आश्चर्य से देख रहे थे। गाड़ी कॉटेज के सामने आकर रुक गई और हेडलाइट बुझाते ही गहरे अंधरे में गुम हो गई। 

"दादा! लगता है अब समय आ गया है कि इस रहस्य से पर्दा उठा ही दिया जाये।" मैंने दादा की तरफ देखते हुए कहा। दादा ने अपनी लाठी उठाई, तो मुझे समझते देर नही लगी कि दादा ने अपनी सहमति दे दी है। हम दोनों अंधेरे में कॉटेज की तरफ बढ़ने लगे। कॉटेज के दरवाजे पर ताला नहीं लगा था। मैंने दरवाजे को थोड़ा सा अंदर की तरफ धकेला तो वो खुल गया। रास्ता साफ देख हम दोनों अंदर घुस गए। अंदर का दृश्य तो चौकाने वाला था। अंदर की हालत बाहर से बिल्कुल विपरीत थी। एकदम साफ सुथरा, चकाचक। हम जैसे ही थोड़ा आगे पहुंचे ठिठक कर रुक गए।"निकल जाओ.... निकल जाओ यहाँ से.... क्यों आये हो यहाँ?...निकल जाओ।" हम आवाज़ सुनकर सन्न रह गए। धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे। सूट-बूट पहने एक आदमी हमारी ओर पीठ किये कमरे में खड़ा था, उसके साथ दो लोग और भी थे। हम दोनों दीवार के सहारे चिपक कर कमरे के अंदर झाँकने का प्रयास कर रहे थे। कमरे के अंदर का दृश्य देख मारे विस्मय के मेरी आँखें फट गईं।

"ये क्या? ...इतना बड़ा झूठ.. मुझसे?" मैं मन ही मन बुदबुदाया। ये दृश्य मेरे सीने को चीर देने वाला था। एक वृद्ध व्यक्ति, जिसे जंजीरों से जकड़ा हुआ था,जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, और वो किसी पिंजर से कम नहीं था। उसकी धंसी हुई आंखें हज़ारों सवाल कर रही थीं।"क्यों आये हो यहाँ?..निकल जाओ!" वृद्ध की आवाज़ में क्रोध झलक रहा था।  मैं निडरता से कमरे के दरवाज़े तक पहुंच ही गया और सूटबूट वाले व्यक्ति के पीछे खड़ा हो गया। वो मेरी ओर पलटा, स्तब्ध ,शान्त! ऐसा लग रहा था जैसे काटने पर खून ना हो। मैं उसकी आँखों में एकटक देखता रहा,  कुछ देर की चुप्पी के बाद शशांक सहसा ही बोल पड़ा। "सोसायटी में रहता हूँ... ! साथ नहीं रख सकता...! बहुत कोशिश की है संभालने की... पर! आखिर सारा बंदोबस्त तो कर ही रखा है यहाँ! और खुद भी संभालने आता हूँ ना हर महीने..! कौन संभाले? बिजनेस संभालूं या इन्हें?" वो बोलता गया और मैं चुपचाप सिर्फ़ उसकी आँखों में देखता रहा। इतनी ठंडी रात में अब सब शांत था, इतना शांत कि सांसों की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। मैं पीछे मुड़ा और धीरे धीरे थके कदमों से दरवाज़े की ओर बढ़ने लगा। वो मुझे जाते हुए देखता रहा। पूरे वातावरण में खामोशी छाई हुई थी सिर्फ नम्बर डायल करते हुए फोन के की-ट्यून की आवाज़ सुनाई दे रही थी जो शशांक कर रहा था। फोन कनेक्ट हो चुका था, सामने से एक आवाज़ सुनाई दी। "हेलो....... एम्बुलेंस।"

*लेखक/कहानीकार परिचय*
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*नाम :-* सुनील पंवार
*पिता:-* स्व. श्री मदन लाल पंवार
*माता:-* श्रीमती कमला देवी
*शिक्षा:-*
स्नातक (बीए), विधि स्नातक (एलएल. बी.), शिक्षा में स्नातक (बी. एड.)
*व्यवसाय:-*
वर्तमान समय में अध्यापक पद पर हनुमानगढ़ जिले में कार्यरत।
*जन्म स्थान:-* रावतसर श्री गंगानगर जिले में 1986 (वर्तमान हनुमानगढ़ जिले में) राजस्थान।
*ईमेल:-* sunil.rawatsar@gmail.com
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*(प्रस्तुति: डाटला एक्सप्रेस/साप्ताहिक/गाज़ियाबाद (उ०प्र०) 24 से 30 जुलाई 2019/प्रत्येक बुधवार/संपादक: राजेश्वर राय 'दयानिधि'/email: rajeshwar.azm@gmail.com/datlaexpress@gmail.com/दूरभाष: 8800201131/व्हाट्सप: 9540276160*

भीगी मुस्कान

                                                       भीगी मुस्कान


वो उससे पिछले आठ महीने से बात कर रहा था। फेसबुक, व्हाट्सअप, इंस्टाग्राम सब पर उसे फॉलो कर रहा था। वो अपने दिल की बात कई बार बोल चुका था, पर वो कहाँ सुनने वाली थी। वाणी से 16 साल छोटा था वो! यही कारण था कि उसे हर बार झिड़कियां ही मिली थी।
वो भी इतना ढीठ था, कहाँ हार मानने वाला था। हर दिन, हर पल नए-नए अंदाज से अपनी बात कहने का कोई मौका नहीं चूकता।
पति की मौत के बाद वाणी इंदौर से दिल्ली शिफ़्ट हो गई और स्पॉकन इंग्लिश का इंस्टिट्यूट शुरू कर लिया।
सुनील भी उससे एक स्टूडेंट के रूप में ही मिला था जो  धीरे-धीरे उसके बहुत करीब हो चुका था। 
वो जब भी फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी बोलती तो वो बस उसे एकटक निहारते ही रहता।  वो साँवला सा लड़का जो दलित परिवार में जन्मा था और जिसका अँग्रेजी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था, वाणी को दिल से दिल दे चुका था।
वाणी ने उसे बहुत समझाया पर वो मानने को तैयार ही नही था। वो तो सिर्फ उम्र को एक संख्या मानता था और उसके आसपास रहने का बहाना ढूंढता रहता। 
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कुछ दिनों से उसका बर्ताव वाणी को खल रहा था। वो कुछ उखड़ा-उखड़ा रहने लगा! ना उसका पढ़ाई में ध्यान था और ना ही ख़ुद पर। शायद वाणी का किसी से बात करना भी उसे गवारा नहीं था। वाणी ने उसे समझाने का हर सम्भव प्रयत्न किया पर उसने वाणी की एक भी नहीं सुनी।
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उस शाम घने कोहरे ने वक़्त रहते ही अपने पाँव पसारना शुरू कर दिया था। तेज़ हवाओं ने ठिठुरन बढ़ा दी थी।
वो बिल्कुल शांत! चुपचाप उसके सामने पलकें झुकाए बैठा था। पूरे कमरे में मौत जैसा सन्नाटा पसरा था। वाणी उसे अपलक देख रही थी,पर दोनों में से कोई भी बात की शुरुआत नही करना चाहता था। आखिरकार वाणी ने ही चुप्पी तोड़ी।
"क्या चाहते हो तुम? कितनी बार समझाया है तुम्हे! तुम जो सोच रहे हो वैसा नहीं हो सकता! सोलह साल बड़ी हूँ तुमसे! तुम मेरी बेटी के हमउम्र हो! क्यों सताते हो मुझे?... क्यों?" वो अपना चेहरा दोनों हथेलियों से छिपाकर फ़फ़क पड़ी।
"जानते हो, क्यों दूर रहती हूँ तुमसे? क्योंकि मैं भी तुम्हे चाहती हूँ, पर तुम्हारी पूरी लाइफ है तुम्हारे सामने! मैं तुम्हे बर्बाद होता नहीं देख सकती। पन्द्रह साल से मैंने अपने आप को जहाँ रोक रखा था, तुम वहीं ले आये मुझे! क्या सुनना चाहते हो तुम मुझेसे..? यही के मैं तुमसे प्यार करती हूँ या नहीं?...तो सुनो! आई लव यू! हाँ मैं तुम्हे चाहती हूँ, तुम जो भी हो जैसे भी हो! हाँ, मुझे भी प्यार है तुमसे। अब दफ़ा हो जाओ मेरे घर से और मेरी ज़िन्दगी से! फिर कभी लौटकर मत आना। सुना तुमने?

चले जाओ...चले जाओ! प्लीज़!" उसकी आँखों से बहते आँसू उसकी गाल से ढलते हुए गर्दन तक आते-आते विलुप्त होते जा रहे थे। वो फ़फ़क-फ़फ़क कर रो रही थी।
वो अपनी जगह से उठा और वाणी के पास सोफे पर बैठ गया। वाणी ने धीरे से उसके काँधे पर सिर रख दिया और फिर सुबकने लगी।
ऐसा पहली बार था जब वाणी रो रही थी और वो भीगी पलकों से मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था।।■■■

सुनील पंवार की क़लम से...

एक खनकती आवाज़

                                            एक खनकती आवाज़
 
आधी रात के शांत वातावरण में बजी फोन की एक रिंग ने मुझे ऐसे झकझोर दिया जैसे बम फट गया हो। इतनी रात को फोन आना,और मेरे अनवरत जारी अध्ययन में ख़लल डाल देना मुझे परेशान कर गया। रात के बारह बज रहे थे। नोरंग जल्दी ही सो गया था,पर उसके सिरहाने रखा मोबाइल फोन निरन्तर बज रहा था,और बार-बार उसे जगाने का प्रयास कर रहा था, पर वो था कि आज कुम्भकर्ण बना चैन से सो रहा था। फोन के अथक प्रयासों के बाद भी जब वो नही जागा तो मैंने उसका फोन उठाया और रिसीव कर लिया।
"हेलो... हेलो!" सामने से कोई आवाज़ नही आयी। फोन कट गया। इससे पहले कि मैं फोन रखता वो फिर बजने लगा।
"हेलो....हेलो!" फिर से कोई प्रत्युत्तर नही। मैंने कई दफा हेलो-हेलो करने के बाद फोन काट दिया और फिर उसे नोरंग के सिरहाने रख दिया। मैं फोन रखकर ज्योहीं पलटा एक बार फिर फोन चीख पड़ा।
"हेलो!" अबकी बार मेरा लहज़ा सख़्त था।
"हेलो! भैरोंसिंह जी बोल रह्या हो?" एक खनकदार आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
"नही।" मैंने उसका जवाब दिया।
"तो फेर आप कुण बोल रहया हो?" उसकी आवाज़ बहुत ही मधुर थी।
"मैं सुनील पंवार बोल रहा हूँ राजस्थान से! लगता है आपका रोंग नम्बर लग गया है।"
"रामराम सा! मैं भी राजस्थान स बोल रही हूं, जोधपुर स।" वो थोड़ा रुकी और फिर बोलना शुरू हो गई।
"म्हे भैरोसिंह जी न कॉल लगायौ पर थारौ नम्बर लाग ग्यो। कोई बात कोनी सा। रोंग नम्बर कुछ कोनी हौवे जी, जब जिससे बात होणी होती है तब-तब होकर रैवेह है। और सुणाओ काँय हाल है थारै गाँव का?" वो अपनी मिश्री जैसी मीठी आवाज़ में मुझसे ऐसे बात कर रही थी जैसे मुझे बहुत पहले से जानती हो। उसके लहज़े में जरा सा भी अजनबीपन नहीं था।
"आपकी आवाज नही आ रही थी। मैं हेलो-हेलो बोल रहा था।" मैंने कहा।
"हाँ! जणा ही मैं सोचूं कोई बोल क्यूँ नहीं रहयो! शायद नेटवर्क म ही दिक्कत है, बार-बार फोन कट रहयो जी। थे हनुमानगढ़ स हो और म्हे जोधपुर स! थे हिन्दी मांय क्यूँ बोल रह्या हो ? राजस्थानी हो तो राजस्थानी मांय बात करो।" उसने अपनी बात जारी रखी।
"मुझे मारवाड़ी भाषा नही आती।" मैंने फिर उत्तर दिया।
"कोई बात नहीं सा! आप हिन्दी बोलो। अच्छा बताओ हनुमानगढ़ मांय मौसम रा कायं मिज़ाज़ है? बारिश पानी कियाँ है?"
"बहुत बढ़िया है जी।"
"म्हारे यहाँ भी बहुत बढ़िया है जी सब कुछ। और सुणाओ, घर मे सब ठीक ठाक है? खेतीबाड़ी सब बढ़िया?"
"जी सब बढ़िया है।" आमतौर पर मैं ना तो किसी का फोन रिसीव करता हूँ और ना ही अजनबियों से बात करता हूँ, पर आज मैं उसकी हर बात का जवाब दिए जा रहा था। मैंने एक बार भी उसकी बात काटने की कोशिश नहीं की, उसकी मधुर वाणी मेरे कानों को सुकून पहुंचा रही थी। घर, परिवार, शहर, गाँव और भाषा सब विषयो पर बात होती गई,और समय का तो पता ही नही चला। ऐसा पहली बार था जब किसी अनजान से इतनी बातें की थी मैंने,और वो भी इतनी आत्मीयता से। मुझे उसकी भाषा इतनी मिट्ठी लग रही थी कि मेरे मन में एक-बार भी फोन डिस्कनेक्ट करने ख़्याल तक नहीं आया। यही कमाल है राजस्थानी भाषा का! ये इतनी आदर, सत्कार, प्रेम, संयम और भावों से लबरेज़ मधुर एवं सुरीली भाषा है कि मन करता है इसे सुनते ही जायें।
"थे कायं काम करो हो?" उसने बड़ी विनम्रता से मुझसे सवाल किया।
"जी! मैं पढ़ता हूँ, और अभी भी पढ़ ही रहा था जब आपका फोन आया।" मैंने भी सरलता से जवाब दिया।
"अरे! ईति रात भी पढ़ रह्या हो? म्हारे को माफ़ करना! म्हे थारै को डिस्टर्ब किया। थे पढ़ो और खूब तरक्की करो। चलो अब सो ज्याओ! सुबह पढ़ लीज्यो। थारै स बात करके घणी खुशी हुई। अब फोन रखतें हैं। थारै को घणे मान स्यूँ, घणी-घणी राम राम।" फोन डिस्कनेक्ट हो गया। मैंने घड़ी की और देखा तो दंग रह गया! रात का एक बज रहा था। उस अजनबी महिला से बात करते हुए पूरा एक घण्टा हो चुका था। मैंने अपनी किताब बन्द की और बिस्तर की और लपक पड़ा, पर वो मधुर आवाज कहाँ मेरा पीछा छोड़ने वाली थी। इतने बरस गुज़र जाने के बाद भी मेरे कानों में वो आवाज़ आज भी गूंजती रहती है।
मेरा यकीन कीजिये उसके जैसी आवाज़ उस दिन से पहले और उसके बाद मैंने आज तक नहीं सुनी। उसके बाद कभी उससे बात नहीं हो सकी। कई दफा उस नम्बर पर कॉल करने का प्रयास किया,पर वो नम्बर अस्तित्व में नही था।
समय के साथ-साथ उसका नम्बर भी खो गया। वो कौन थी, क्या करती थी! मुझे ना उसका नाम पता है और ना काम। मैं आज भी किसी अनजान नम्बर से आये फोन को इस उम्मीद के साथ रिसीव कर लेता हूँ कि शायद वही खनकदार कर्णप्रिय आवाज़ एक बार फिर से सुनाई दे दे।।
सुनील पंवार
(ये वर्ष 2007 में एक रात की वास्तविक घटना है।।)
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इन्तहा

                                                                              इन्तहा

बादलों की गड़गडाहट ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी, जैसे वो नींद से जाग गई हो। उसे लगा जैसे दरवाजे पर किसी ने आहट दी है। वो उठी और खिड़की से बाहर झांकने लगी। आज फिर मौसम ने अपना रुख बदल लिया था, काली घटाओं ने दिन को रात में तब्दील कर दिया। कौंधती हुई बिजली और बहती हुई तेज़ हवाओं ने आने वाले तूफ़ान का संकेत दे दिया था। रेडियो पर मधुर गीत की धुन बज रही थी। पूरा घर तरह तरह के व्यंजनों की खुशबू से महक रहा था। आज सुबह से ही वो चैन से नही बैठी। सारे दिन अपने काम में व्यस्त रही पर ध्यान सिर्फ दरवाजे पर था उसका। वो श्रृंगार से सजी किसी अप्सरा से कम नहीं दिख रही थीं, वो बार बार आईने के सामने अपने माथे की बिंदिया को ठीक करती तो कभी साड़ी के पल्लू को। दो साल बीत गए उसे देखे हुए। वो कभी उसे मन भर  देख भी नहीं पाई थी।  पहले तो हर रोज बात होती थी पर अब तो कभी कभार ही उससे फोन पर बात हो पाती है। शादी के कुछ ही महीनों बाद सुनील, वाणी को छोड़कर विदेश चला गया था। वो अपने कामों में इतना व्यस्त रहा कि आज तक लौटकर नहीं आया। वाणी हर रोज विरह की आग में झुलसती रही। न जाने कैसे कैसे विचारों ने उसके मन मस्तिष्क में घर कर लिया था। "क्या वो मुझे पसन्द नही करते?....क्या मैं अब सुंदर नहीं रही? .........कहीं उन्होंने किसी और से तो........? नहीं..... नहीं...वो ऐसा नहीं कर सकते.... व्यस्त होंगे...शायद समय नहीं मिलता होगा...।"  सोचकर अपने मन को दिलासा देती रहती। एक सप्ताह पहले ही सुनील का फोन आया था। दो साल बाद वो घर लौटकर आ रहा था। वाणी ने दो साल तो जैसे-तैसे गुजार दिए, पर बीता सप्ताह कैसे गुजरा, उसका मन ही जानता है। अकेलापन हर रोज उसे डसता,नोचता, खसोटता रहता।
वो बार बार घड़ी की और देख रही थी। शाम के चार बजे चुके थे। ऐसा लग रहा था जैसे समय ठहर गया हो। वैसे भी इंतज़ार में घड़ी हमेशा धीरे ही चलती है। हवाएं और तेज़ हो गई थीं। सुबह से अब तक एक पल के लिए भी उसकी नज़र दरवाजे से नहीं हटी थी। गीतों की मधुर धुनों के बीच रेडियो पर बार बार मौसम खराब होने और भयंकर तूफान आने की चेतावनी प्रसारित की जा रही थी। एक एक पल बरस के समान गुजर रहा था उसका। उसके आने भर की खबर ने ही उसके मन में प्रेम की कंपोले अंकुरित कर दी थी। उसकी जागती आँखे न जाने कितने स्वप्न सजो रहीं थी। पिछले सप्ताह से ही पूरे घर को उसकी पसन्द का सजाने में लगी थीं वो। घर की हर चीज उसके हिसाब से सजी थी। मौसम की वजह से रेडियो का सिग्नल लड़खड़ाने लगा था। साढ़े चार बजने को थे और सुनील का न कोई फोन न कोई ख़बर।  "इतनी देर क्यों लगा दी..........? और कितना इंतज़ार करूँ.........? सब ठीक तो है ना....?" उसके मन में एक पल में न जाने कितने विचार कौंध रहे थे। बाहर भी तूफ़ान, अन्दर भी तूफ़ान । उसका मन बहुत घबरा रहा था। वो भारी मन से बाल्कनी में आ गई। चारों ओर अंधेरा पसरा पड़ा था, दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। ये उसके सब्र की इंतहा थी।
"ट्रिंग........ ट्रिंग....... ट्रिंग........ ट्रिंग" फोन की रिंग बज उठी। फोन की रिंग सुनकर वाणी का चेहरा खिल उठा।
वाणी ने दौड़कर फोन उठाया। "हेलो.....हेलो" खराब सिग्नल की वजह से आवाज़ साफ सुनाई नही दे रही थी उसे।
"हेलो....."
"हैलो..... वाणी मैं सुनील बोल रहा हूँ....."
"हाँ.... बोलिये....कहाँ हैं आप?"
" आई एम सॉरी! वाणी।.......मेरी फ़्लाइट मौसम खराब होने की वजह से रद्द हो गई है। दूसरी फ़्लाइट मौसम ठीक होने तक नही है। मौसम का क्या भरोसा कब तक ठीक हो।..... तब तक मेरी छुट्टियां पूरी हो जाएगी.........हेलो...... आवाज़ आ रही है?।"
"हाँ..... मैं सुन रही हूँ...... हेलो।"
"आई एम सॉरी! शायद इस बार भी तुमसे मिलना नही होगा........ सॉरी!............" फोन डिसक्नेक्ट हो गया।
"हेलो............हेलो.............हेलो......." वाणी चीखती रही पर  सामने से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। वो निःशब्द फोन को कान से लगाये खड़ी रही। एक पल को लगा जैसे वो जड़ हो गई हो, वक़्त थम गया हो और हृदय ने धड़कना बन्द कर दिया हो। वो सुन्न, निढ़ाल, बूत बनी खड़ी रही। उसकी आँखे भर आई । आँखों से बहते आँसू गालों पर लुढ़कने लगे। अचानक तूफ़ान ने पूरी ताकत से प्रहार किया सभी खिड़कियां और दरवाजे खुल गए और बरसात के बादल फट पड़े।
ऐसा लग रहा था जैसे आसमान का सीना फट गया हो■■■■■■■
                   सुनील पंवार रावतसर।

डायरी 2001

                                    डायरी 2001

दिन के ग्यारह बजने वाले थे । मै बार-बार घड़ी देख रहा था । अचानक डोर बेल बजा। दरवाजा खोला तो सामने हरी था । जो हर महीने पुराने अखबार और किताबें लेने आता है । मैं उसे स्टडी रूम  की तरफ़ ले गया और किताबें निकाल कर देने लगा । मुझे बचपन  से किताबें पढ़ने का बहुत शौक रहा है । किताबें ही आपकी सबसे अच्छी दोस्त होती है जब आप निहायत तन्हा होते हैं । ये आपका विरोध नही करतीं पर आपको सही रास्ता जरूर दिखा देती है । " ये डायरी आपके काम की है ?" हरी के हाथ में एक रेड कवर डायरी थी । "ये तो वर्ष 2001 की है।" मैंने हरी के हाथ से डायरी ले ली । "ये बहुत काम की है। कहाँ से मिली ?"  "यहीं किताबों के बीच । ये तो बहुत साल पुरानी है वकील साहब । कुछ खास लिखा है क्या इसमें ? " "नहीँ कुछ खास नही । ये मेरे स्कूल टाइम की डायरी है। मुझे तब से ही लिखने का शौक रहा है । तुम किताबें  पैक कर लो, मैं ड्राइंग रूम में तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ ।" मैं हरी को स्टडी रूम में छोड़ कर ड्राइंग रूम में आ गया । मैं आराम कुर्सी पे बैठ कर  रेड कवर डायरी को पढ़ने लगा । डायरी के पन्नों के साथ-साथ वक्त भी पलटता गया और अतीत ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया । बीता हुआ एक-एक पल आँखों के सामने तैर रहा था । 
बात 2001 की है, जब मैं जूनियर क्लास में पढ़ता था। मेरी उम्र महज़ सोलह वर्ष रही होगी । उम्र का ऐसा दौर , जिसमें  बचपन रुखसत हो  चुका था और लड़कपन नये सपने,. नयी चाहत, और जुनून के साथ जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने को बेताब था । इस दौर में अक्सर लडखड़ाने का डर सताता रहता है। मैंने एक किताब में पढ़ा था लड़कपन बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह होता है। कभी भी एक्सीडेंट हो सकता है । शायद ये सही भी है । हर युवा की तरह मेरे अन्दर भी उम्र के लिहाज़ से मानसिक और शारीरिक बदलाव साफ नज़र आने लगे थे । मन हसरतों से भरा पड़ा था।  ********************
सेंट जेवियर स्कूल । शहर के सबसे बड़े स्कूल के वार्षिक समारोह में रूप मुझे भी अपने साथ ले गया । यहीं देखा था मैंने उसे पहली बार। गोरा रंग, सुनहरे बाल, बिलौरी आँखें । बिल्कुल कहानियों की परी जैसी। और उसकी नृत्यकला तो कमाल की थी । एक पल के लिये भी कोई उससे नज़र हटा ले । ये सम्भव ना था । मैं तो उसे एक-टक देखे ही जा रहा था । ये पहली बार था, जब मैंने किसी के प्रति आकर्षण महसूस किया था। जिया नामक था उसका । यहीं से शुरु हुआ एक अनकही , भूलीबिसरी, एक तरफी प्रेम कहानी का दौर । प्रेम कहानी कहें या आकर्षण ? ये मैं आजतक नहीं समझ पाया । उसी दिन से मेरे अन्दर एक अजीब सा बदलाव था । शायद मैं उसे पसंद करने लगा था । शायद क्या ? सचमुच पसंद करने लगा था । मेरे पास उसका पूरा शेडयूल था । कोचिंग क्लास ,डाँस क्लास ,स्कूल टाइम । सब । मैं हर रोज बड़ी हिम्मत के साथ उसे देखने उसके रास्ते में खड़ा होता पर उसके सामने जानें की हिम्मत कभी जुटा ही नहीं पाया । उसे तो कभी अहसास ही नहीं हुआ की कोई उसकी एक झलक पाने की चाह में हर रोज उसके राह में बेताब खड़ा रहता है ।
रूप हमेशा कहता था की मैं जाके जिया को सब कुछ  बोल दूँ। या फिर उसके पीछे अपना वक्त बर्बाद ना करूँ । पर ये मेरे लिये सम्भव नहीँ था । मुझे अंजाम का डर था । मुझे पता था उसका जवाब क्या होगा। उसकी ना सुनने की हिम्मत नहीँ थी मुझमें । वो मुझसे श्रेष्ठ थी। हर तरह से श्रेष्ठ । वो शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ती थी जबकि  मैं गवर्नमेंट स्कूल में । वो ऑफिसर की बेटी थी तो  मैं किसान का बेटा । वो सीनियर थी मैं जूनियर । वो आत्मविश्वासी थी, मैं संकोची । वो आत्मविश्वास से लबरेज़ थी । मेरी स्थित हर तरफ़ से उसके विपरीत थी । मुझमें ऐसी कोई खाशियत नहीँ थी जो किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखती हो । वो मुझे पसंद करती भी तो इसकी कोई वजह नहीं थी । दो साल गुजर गये इसी कशमश में ।  वक्त बढ़ता गया और मेरा तनाव भी ।      *******************
एक सप्ताह बीत गया था जिया को देखे हुए । ना कॉलेज जाती ,ना कोचिंग । मैं हर रोज़ की तरह रास्ते में उसका इंतजार करता , पर उसकी कोई खबर नहीं थी । मेरा मन बहुत खराब रहता । मन में अजीबोगरीब ख़याल आते रहते । यकीन मानीये ये ऐसा वक्त  था जब मैं दर्द , सम्वेदना , प्रेम और तनाव हर मंजर से गुजर रहा था ।***********
उस दिन सीने को चीर देने वाली सर्द हवायें चल रही थी । दरख्तों के पत्तों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था जैसे चीख-चीख कर मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रहें हो । रुप एकटक मुझे देख रहा था । उसकी आँखों में  बहुत उदासी थी। वो मुझसे कुछ कहना चाह रहा था पर शायद उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी । "क्या हुआ?'' मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा। वो सिर्फ मुझे देखे जा रहा था । शांत । उदास । उसके मुँह से एक बोल तक नहीं फूटा । बस देख रहा था मुझे। '' क्या हुआ ? कुछ तो बोल यार ।" वो कुछ नहीं बोला । अपनी जेकेट से एक लिफाफा निकाल कर मेरी और बढा दिया । वो किसी की शादी का कार्ड था जो हमारे प्रिंसिपल सर के लिए भेजा था । " ये क्या है ? ये तो प्रिंसिपल सर का है, मुझे क्यों दे रहा है ?" "इसे पढ़ लो ।" वो सिर्फ इतना ही बोला । मेरी आँखे कार्ड पर ही ठहर कर रह गयी थी । वो जिया की शादी का कार्ड था । मैं स्तब्ध खड़ा रहा । ऐसा लगा जैसे ढेरों मलबे के नीचे दब गया हूँ और कहीं से कोई आवाज़ नहीं सुन रहा है । हवायें और तेज हो गई थी । मैं अपलक कार्ड पर लिखे जिया के नाम को देख रहा था । सिर्फ नाम । "हो गया । वकील साब ।" हरी की आवाज़ ने मेरे अतीत की यादों के क्रम को तोड़ दिया। "सब हो गया सर । अब मैं चलता हूँ ।" हरी के जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद किया और फिर डायरी खोल ली। पर डायरी के आगे के सारे पन्ने बिल्कुल खाली थे। शायद यहीं सब ख़त्म हो गया था । अगर कुछ बचा था तो सिर्फ डायरी । और इस तरह मेरे दिल में जज्बात , और डायरी में अल्फाज। दोनों हमेशा के लिए दफन हो कर रह गये ।

सुखिया भाग 1

                                                          सुखिया


अब तो जैसे सब कुछ बदल गया था। तीस साल पहले यहाँ कुछ भी नहीं था। चारों ओर रेगिस्तान पसरा हुआ था, ना पक्की सड़कें थीं, ना बिजली और ना ही पानी की कोई सुविधा। चारों ओर रेत के टीले और उन पर कांटों की मेड़ से घिरे कच्चे मिट्टी के मकान। पूरे गांव में सिर्फ दो चीजें प्रसिद्ध थी, एक गाँव के बीच बना जोहड़, जिसमें इंसान और जानवर दोनों एक साथ नहा सकते थे और दूसरा शिव जी का पुराना बड़ा मन्दिर। घर से एक किलोमीटर दूर एक सार्वजनिक हैंडपंप था जिससे गाँव के लोग पीने का पानी लाते थे। पानी की किल्लत इतनी थी कि एक मटकी पानी के लिए भी बहुत लंबी कतार से गुजरना पड़ता था। सुखिया तक़रीबन सात वर्ष का रहा होगा, पर  सीखने के प्रति उसकी जिज्ञासा सागर की तरह विस्तृत थी। ऐसा लगता था मानो वो सारी दुनियां का ज्ञान उसी उम्र में पा लेना चाहता था। वो अपने आसपास की घटनाओं को बड़ी गौर से देखता और फिर उनकी सूक्ष्म जाँच शुरू कर देता। जिससे भी मिलता सवालों की झड़ी लगा देता। सब उसकी इस आदत से हैरान रह जाते कि एक छोटा सा बच्चा इतने सवाल लाता कहाँ से था? अपनी बाई (बड़ी बहन) के साथ हैंडपंप से पानी लेने सुखिया ही जाता था। पानी लेकर लौटते समय सुखिया ने अपनी बाई से पूछा "बाई। जब तुमने नलके (हैंडपंप) से पानी भरा था तो उस बूढ़ी औरत ने नलके को नहलाया क्यों था?"
"नहलाया नहीं बावळे। धोया था नलके को।" बाई ने जवाब दिया।
"धोया क्यों?"
"क्योंकि हम नीच जात हैं ना इसलिए।"
"नीच जात क्या होता है? नलके को धोने का क्या मतलब?"
"तू नहीं समझेगा"
"तो समझाओ बाई"
"हम नीच जात हैं। हमारे हाथ लगे थे नलके को। इसलिए  धोया था ताकि नलका शुद्ध हो जाए। अब ज्यादा दिमाग मत खा। आँधी आने वाली है जल्दी से चल।" बाई तो जैसे सुखिया के सवालों से पीछा ही छुड़ाना चाहती थी। सुखिया बाई के जवाब से अभी भी संतुष्ट नहीं था। वो तो बहुत कुछ जानना चाहता था, पर बाई से पूछने की हिम्मत नहीं हो रही थी उसकी। सुखिया चुप रहता भी तो कितनी देर। जैसे ही वो दोनों शिवजी के मंदिर के पास पहुंचे, सुखिया फिर से शुरू हो गया।
"बाई। मुझे भी मन्दिर दिखा लाओ। मुझे वो बड़ा घण्टा बजाना है।" सुखिया ने मन्दिर में लगे घण्टे की और इशारा करते हुए कहा।
"बावळा है क्या तू? कितनी बार कहा है हम मन्दिर में नही जा सकते।"
"हम मन्दिर में क्यों नहीं जा सकते बाई?"
"अरे! बताया तो था हम नीच जात है। मन्दिर में नहीं जा सकते। कैसे समझाऊं?"
" बाई, जो हमारे घर थान (घर में बना छोटा मन्दिर) है उसका भगवान और इस मन्दिर का भगवान अलग अलग है क्या?"
"नहीं। भगवान तो सारे एक ही होतें है।"
"तो क्या हमारे थान का भगवान नीच जात है?"
"नहीं। ऐसा नही बोलते। भगवान कभी नीच नहीं होते।" बाई ने सुखिया को समझाने का पूरा प्रयास किया पर सुखिया तो बाल की खाल उधेड़ना चाहता था।
"बाई। क्या भगवान मन्दिर में ही मिलतें है? अगर ऐसा हुआ तो हम भगवान से कभी नहीं मिल पाएंगे ना?" सुखिया ने एक और मासूम सवाल दाग दिया।
"नहीं। ऐसा बिल्कुल नहीं है। भगवान सिर्फ मन्दिर में मिले ये जरूरी नहीं है। भगवान तो कण कण में बसा है।"
"कण कण में? क्या इस रेत में भी भगवान है बाई?"
सुखिया ने ज़मीन पर पड़ी तपती रेत की और इशारा करते हुए पूछा।
"हाँ। इसमें भी भगवान है। अब तू जल्दी चल आँधी आने वाली है। अभी घर भी दूर है।" बाईं ने सुखिया का हाथ पकड़ा और घर की और तेज़ी से बढ़ने लगी। वे दोनों कुछ ही दूर चले थे कि आँधी का एक धूल भरा बवंडर उठा और चारों ओर धूल धूल ही बहनें लगी। तेज़ आँधी से सुखिया तनिक भी नहीं घबराया, वो तो मन ही मन खुश था उसे लगा जैसे भगवान खुद उससे मिलनें आयें हों। चारों ओर भगवान ही भगवान है।।■■■
                             सुनील पंवार

सुखिया भाग 2


                                            सुखिया भाग 2


वो बड़े ही भारी मन से पाँव उठा रहा था। उसका मन ही नही कर रहा था जाने का। पर बाई उसे जबर्दस्ती ले जा रही थी। धूप काफ़ी चढ़ आई थी। सुखिया के माथे पर पसीने की बूंदें गर्मी की वजह से कम; परेशानी की वजह से ज्यादा थीं। आज बाई सुखिया का दाखिला गांव की पाठशाला में करवाने जा रही थी। और ये सुखिया के लिए बड़े ही सकंट की घड़ी थी।
"बाई। तुम बापू को समझाती क्यों नहीं? मैं पढ़कर क्या करूँगा?"
"तू अनपढ़ रह के भी क्या करेगा?" बाई ने सवाल का जवाब सवाल से ही दिया।
"मैं खेत में बापू की मदद करूँगा। तुम्हारे काम में भी मदद करूँगा। बाई...अगर मैं पाठशाला में जाऊँगा तो तुम्हारे साथ पानी लेने कौन जाएगा? बापू की रोटी देने खेत कौन जाएगा? तुम अकेली हो जाओगी बाई।" सुखिया बातें बनाने में तो माहिर था, पर आज उसकी दाल गल्ति नज़र नही आ रही थी।
"तू मेरी फिक्र ना कर। मेरा क्या है मैं तो पराया धन हूँ। बापू मेरा ब्याह कर देगा, तो मैं तो चली जाऊँगी।"
"तुम कहाँ चली जाओगी बाई?" सुखिया ने बड़े आश्चर्य से पूछा।
"अपने घर...और कहाँ?" बाई ने उत्तर दिया।
"तो क्या बापू का घर तुम्हारा नहीं है? और ये पराया धन क्या होता है?"
"बेटी पराई होती है। वो ब्याह के बाद दूसरे घर चली जाती है।"
"बापू मेरा ब्याह कर देगा तो क्या मैं भी चला जाऊंगा?" सुखिया के मासूम सवाल में बड़ा आश्चर्य था।
"हाहाहा। बावळे। छोरे थोड़े ही जाते हैं पराए घर। बेटियां होती है पराई।" बाई ने सुखिया को समझाने का पूरा प्रयत्न किया, पर सुखिया इतनी जल्दी कहाँ संतुष्ट होने वाला था।
"मैं तुम्हे नही जाने दूँगा बाई।"
"अरे! ये तो दुनियां की रीत है बावळे। तू इसे कैसे बदलेगा?" बाई मन ही मन उसके मन की बेचैनी महसूस कर रही थी।
"चल। अब चुप हो जा। पाठशाला आ गई। और हाँ, ज्यादा बोलना मत। कहीं ऐसा ना हो कि वहाँ भी सवाल जवाब शुरू कर दे।  ना ही शरारत करना, नहीं तो कान खींच लूंगी तेरे।" बाई ने अपने हिसाब से सुखिया को पूरी तरह समझा दिया था, पर सुखिया इस पर कितना अमल करेगा ये तो वो ही जानता था। वे दोनों पाठशाला पहुँच गए। "राम राम गुरुजी।" बाई ने मास्टर जी का अभिवादन किया। "मैं मदनां की छोरी... और ये मेरा भाई सुखिया है। बापू ने बोला है इसका दाखिला पाठशाला में करवाने का।" बाई ने मास्टर जी को बताया।
"पाठशाला में दाखिला तो हो जाएगा बाई पर......." मास्टर जी बीच में ही अपनी बात पर अटक गए।
"पर...क्या गुरुजी?" बाई ने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
"बाई तुम्हे तो पता है इस स्कूल में तुम्हारी जात का कोई नहीं पढ़ता....इसलिए; सुखिया को अपना पानी और टाट (बैठने के लिए बिछाने की दरी) घर से ही लानी होगी।" मास्टर जी ने बाई से झिझकते हुए कहा।
"कोई बात नहीं गुरुजी। मैं खुद इसके लिए टाट और पानी ला दिया करूंगी.... बस सुखिया पढ़-लिख ले।" बाई ने मास्टर जी को आश्वस्त किया। सुखिया उन दोनों की बातें बड़ी ध्यान से सुन रहा था। आखिर सुखिया था चुप रहता भी तो कब तक।
"गुरुजी....आप तो बहुत पढ़े हो....एक बात बताइए। बाई कह रही है कि वो परायाधन है। मैं नहीं हूँ... बापू जब बाई का ब्याह कर देंगे तो वो अपने घर चली जायेगी। ऐसा क्यों?"
"बेटी पराई होती है, बेटा नहीं। क्योंकि ये दुनियां की रीत है। इसे बदला नहीं जा सकता।" मास्टर जी ने सुखिया के सवाल का जवाब दिया, पर मास्टर जी को क्या पता था कि अब उनपर सवालों की बारिश होने वाली है।
"गुरुजी। मैं यहाँ इस पाठशाला में पानी क्यों नहीं पी सकता?......और घर से टाट क्यों लाऊं?.....यहाँ तो बहुत सारी टाट है।"
"सुखिया। तू नहीं समझेगा। बाई को पता है, तू नीच जात है। अगर तू यहाँ का पानी पीयेगा और इन बच्चों के साथ बैठेगा  तो बाकी के बच्चे अपनें घर पर मेरी शिकायत कर देंगे। मास्टरजी सुखिया को समझाने में जुटे थे, पर सुखिया मास्टर जी को समझाने का मन बना चुका था।
"तो मैं कब बैठ पाऊँगा इनके साथ गुरुजी?"
"शायद.... कभी नहीं। क्योंकि ये दुनियां की रीत है।"
"रीत बदली नहीं जा सकती क्या गुरु जी?"
"सदियों से चली आने वाली रीत कभी नहीं बदलती सुखिया।"
"पढ़ लिखकर भी नहीं?"
"शायद..... नहीं।" गुरुजी के शब्दों में बेबसी झलक रही थी। सुखिया ने एक नज़र बाई की तरफ देखा, फिर घर की और भाग खड़ा हुआ।
"सुखिया........सुखिया....... कहाँ जा रहा है?.......रुक।"  बाई उसे आवाज़ लगती रही। सुखिया थोड़ा रुका और पीछे मुड़कर बोला। "घर आ जाओ बाई। अगर पढ़लिख कर भी रीत ही नहीं बदली जा सकती तो फिर गुरुजी की तरह पढ़ने का क्या फ़ायदा? मैं ऐसे ही ठीक हूँ।" और फिर तेज़ कदमों से दौड़ने लगा। बाई भी सुखिया को पकड़ने तेज़ी से दौड़ी, पर सुखिया कहाँ हाथ आने वाला था। वो अपने कदमों से उड़ती हुई धूल में जल्द ही बाई की आँखों से औझल हो गया।◆◆◆◆◆
सुनील पंवार एडवोकेट

सुखिया भाग:- 4


                             सुखिया भाग:- 4

दूर से सुनाई दे रही ढोल की मधुर आवाज़ उसे बड़ी विचलित कर रही थी, वो ढोल की ध्वनि की दिशा में बार-बार बार देख रहा था। सुखिया को नाचने का बड़ा शौक रहा था जहाँ कहीं भी ढोल की आवाज़ सुनता तो ढोल की थाप पर थिरके बिना नहीं रहता। सुखिया ने बाई से कई दफ़ा कहा कि वो उसे ढोल वाले को दिखा लाये, पर बाई घर के कामों इतनी व्यस्त थी कि उसके लिए घर से निकलना सम्भव नहीं था और सुखिया को अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी। मन मारकर सुखिया को घर मे ही रहना पड़ा, पर उसका मन तो ढ़ोल की आवाज़ में ही अटका था।
"ए सुखिया! जा मेरे लिए एक बीड़ी का बंडल और माचिस की डिबिया ले आ।" बापू ने सुखिया को दो रुपये का नोट थमाते हुए कहा।
"और सुन! जल्दी आना, मुझे खेत जाना है। कहीं इधर-उधर मुँह फाड़ते मत रहना। बीड़ी लेते ही सीधे घर आना। समझे?" बापू ने सुखिया को समझाते हुए कहा।
सुखिया को तो जैसे मुँह मांगी मुराद मिल गई हो। वो तो बस किसी बहाने से घर से बाहर निकलना ही चाहता था। वो घर से निकला और सेठ की दुकान की तरफ चल पड़ा। वो जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था वैसे ही ढ़ोल की आवाज़ भी उसके सामने ही चली आ रही थी। अब तो सुखिया और भी व्याकुल हो रहा था। वो ध्वनि की दिशा में जाना तो चाहता था पर बापू की दी हुई सख्त हिदायद उसके मस्तिष्क में थी। वो रास्ते के बीच रुक गया। कुछ देर सोच विचार करने के बाद दौड़ा-दौड़ा ढ़ोल की ध्वनि की और मुड़ गया।
वो कच्चे रास्ते से होता हुआ एक संकरी गली की और बढ़ गया। कुछ ही देर में वो गाँव के गुवाड़ (गाँव के बीच खाली जगह, जहाँ सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है) पहुँच गया। ढ़ोल वाले के इर्दगिर्द बच्चों का जमघट   था। एक तरफ पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर गाँव के बुज़ुर्ग और महिलाएं ढ़ोल की थाप का नज़ारा उठा रहे थे। उन्ही के बीच एक मंगता (भिखारी) सभी दर्शकों से अपना कटोरा बढ़ा कर भीख मांग रहा था। ढ़ोल वाले ने कुछ पल के लिए ढोल बजाना बन्द कर दिया और चबूतरे पर बैठकर सुस्ताने लगा। मंगते ने अपना काम जारी रखा। वो एक के बाद दूसरे के सामने कटोरा बढ़ाता और पैसों की माँग करता। धीरे-धीरे वो बढ़ता हुआ सुखिया के पास आ गया।
"ऊपर वाले के नाम पर कुछ देदे बच्चे!"
भिखारी की बात सुनकर पूरा गुवाड़ हंसी के ठहाकों से गूँज उठा। सुखिया को पता था कि वो सब लोग उस पर ही हंस रहे हैं, पर उसने संयम बनाये रखा।
"अरे! तुम इससे भीख मांग रहे हो? इसका तो बाप खेतों में काम करता है, और इसकी माँ लोगों के घर सफ़ाई करती है। ये  तुझे क्या देगा?" एक बच्चे ने सुखिया की मज़ाक उड़ाते हुए कहा।
"और ऊपर से नीच जात है, सो अलग।" एक तरफ खड़े युवक ने भी अपना ज्ञान पेलना शुरू कर दिया।
"अरे सुखिया! तू तो बड़ा आदमी बन गया रे। तुझसे तो भीख भी माँगने लगे हैं।" एक बुज़ुर्ग व्यक्ति भी इस दौड़ में शामिल हो गया।
"अरे भाई तू आगे बढ़! यहाँ तुझे क्या मिलने वाला है, ये तो ख़ुद माँग तांग कर गुज़ारा करते हैं।" उसने भिखारी को सलाह दी।
अब सुखिया का सब्र टूट चुका था और वैसे भी सुखिया कितनी देर चुप रहने वाला था।
"ओ ताऊ! एक बात बता। मैं तो कुछ देने के लायक नहीं हूँ, मेरी माँ लोगों के घर में सफाई करती है, बापू खेत में मजदूरी करता है, पर तु तो अच्छे खासे घर का है, फिर इस भिखारी का कटोरा खाली क्यों है? तुमने दिया नही क्या कुछ?" सुखिया की बात सुनकर एक बारगी तो सन्नाटा छा गया।
"देने के लिए कलेजा चाहिए ताऊ! जो तेरे पास नहीं है" अब सुखिया की इस बात पर तो पूरा गुवाड़ ठहाकों से गूंजना ही था।
सुखिया आगे बढ़ा और चबूतरे पर विराजमान ढोली के पास गया।
"एक घण्टे ढ़ोल बजाने के कितने पैसे लोगे?
"पाँच रुपया!"
"दो रुपये में बजाओगे?"
ढोली कुछ सोचता रहा और फिर दो रुपये में राजी हो गया। उसने ढोली की तरफ दो रुपये का नोट बढ़ा दिया जिसे ढोली ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
सुखिया ने मंगते को अपनी और आने का इशारा किया और धीरे से बोला।
"सारे पैसे उठा लेना,सिर्फ़ दो रुपये मुझे दे देना।" इससे पहले की भिखारी कुछ समझ पाता ढोली ने ढ़ोल को थाप देना शुरू कर दिया।
सुखिया ने ज्योहीं पर ढ़ोल पर थिरकना शुरू किया पूरा वातावरण हंसी और मौज भरी आवाज़ों से गूँज उठा। सुखिया पूरी लगन और आनन्द में डूबा नृत्य का लुत्फ़ उठा रहा था। देखते ही देखते लोगों का हुज़ूम गुवाड़ में उमड़ पड़ा और पाँच, दस और बीस पैसों के सिक्कों की बौछार होने लगी। मंगता नृत्य देखने में कम बल्कि पैसे इक्कट्ठे करने में अधिक व्यस्त था। चारों और हास्य और मस्ती बिखर गई थी। जो अब तक सुखिया का उपहास कर रहे थे वही अब उसका हौसला बढ़ा रहे थे।
"वाह सुखिया वाह! क्या बात है! तुम गाँव की शान हो।" भीड़ में से आ रही आवाज़े सुखिया का मनोबल बढ़ाने के लिए पर्याप्त थीं। अब सुखिया को समय की कोई परवाह नहीं थी, वो तो बस मस्ती में मस्त था। उधर जब बहुत देर होने के बाद भी सुखिया घर नही पहुँचा तो बाई उसे ढूढने निकल पड़ी। बाई को भी पता था कि सुखिया कहाँ मिल सकता है। वो ढ़ोल की आवाज़ की तरफ निकल पड़ी।
बाई गुवाड़ में उमड़ा लोगों का हुज़ूम देखते ही समझ गई कि सुखिया ने अपना करतब दिखाना शुरू कर दिया है।
वो भीड़ को चीरती हुई मस्ती में मस्त सुखिया के पास पहुंच गई और ढोली को रुकने का इशारा किया।
ढोल की थाप एकाएक रुक गयी, जो सुखिया को ना-गवार गुजरी।
"ढोल बजाना क्यों बन्द किया?" उसने जोर की आवाज़ में पूछा।
ढोली ने बाई की ओर इशारा किया तो सुखिया ने पलट कर पीछे देखा।
बाई को देखकर सुखिया की सिटीपीटी गुम हो गई।
मंगता अभी भी सिक्के चुनने में व्यस्त था।
"तुझे कहा था ना यहाँ नही आने का! फिर क्यों आया?" बाई का लहज़ा बड़ा सख्त था। सुखिया से अब कोई जवाब देना ना बन रहा था। वो सकपका गया। भीड़ भी अब छंटने लगी थी। "तुझे बापू की बीड़ी लाने के लिए भेजा था और तू यहाँ नाचने में लगा है। बापू अब तुझे पीट-पीट कर मार देगा। कहाँ है बापू की बीड़ी और बाकी के बचे पैसे?" बाई का पारा चढ़ गया।
"बीड़ी तो ली ही नहीं! वो पैसे तो ढोली को दे दिए।" सुखिया ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया।
"क्या? अब बीड़ी कहाँ से लायेगा?"
"इस मंगते से लेने है दो रुपये बाई।" सुखिया ने मंगते की इशारा करते हुए देखा तो दंग रह गया। मंगता गायब था। वो सारे पैसे लेकर रफूचक्कर हो गया। सुखिया ने इधर उधर देखा पर उसका कोई नामोनिशान तक नहीं था।
सुखिया ने अपने माथे पर जोर से हाथ मारा और ज़मीन पर बैठ गया।
"अब क्या हुआ?"बाई ने गुस्से और उत्सुकता के मिश्रित लहज़े में पूछा।
"कुछ नहीं बाई। लगता है बापू की बीड़ी के लिये एक घण्टा और नाचना पड़ेगा।"
अब ढोली ही उसका आखरी सहारा था।■■■◆◆◆

सुखिया भाग 3

                                   सुखिया भाग 3

चौराहे के बीचों बीच रखे ठीकरे को सुखिया बड़े गौर से देख रहा था। लड्डू, बिंदिया और सिंदूर के साथ-साथ पाँच, दस और पच्चीस पैसे के सिक्के भी रखे थे उसमें। इसे स्थानीय भाषा मे टूणा (टोना)  या ठीकरी निकलना कहतें है। प्रायः देवी देवताओं को प्रसन्न करने और गृह दोष दूर के लिए कुछ सामग्री भेंट स्वरूप ठीकरे में रख कर उन्हें देवताओं को अर्पित किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भी सबसे पहले टोना के ऊपर से गुजरेगा, सारी बलाएं उसी पर होगी। लड्डुओं को देख कर सुखिया का मन ललचाने लगा था। उसने अपने नन्हे साथियों को लड्डू उठा लाने को कहा, लेकिन कोई भी लड्डू उठा लाने की हिम्मत नही कर पाया। सब को डर था कि कहीं कोई बला उन पर न आ जाये। सुखिया अपने लक्ष्य पर नज़र गड़ाये बैठा था, की सेठजी की आवाज़ ने उसका ध्यान भंग कर दिया।
"माफ कीजिए मास्टरजी। बालक है, अज्ञानी है,जो आप पर मिट्टी फेंक दी।" हाथ जोड़े सेठजी मास्टर जी से क्षमा याचना कर रहे थे। सेठजी के बेटे ने राह गुजरते  मास्टर जी पर मिट्टी जो फेंक दी थी।
"कोई बात नहीं सेठजी।" मास्टरजी कपड़ों से धूल झाड़ते हुए बोले।।
"मैं अभी इसके कान खींचता हूँ।" सेठजी गुस्से में अपने बेटे की ओर लपके।
"अरे! कोई बात नहीं सेठजी। बच्चा है। बच्चे तो भगवान का रूप होता है, भला भगवान को क्या सज़ा दी जा सकती है। छोड़ दीजिए।" मास्टरजी ने विनम्रता से कहा।
सुखिया उन दोनों की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। दो लोग आपस में बात करे और सुखिया चुप रह जाये, भला ये कैसे संभव हो सकता था। सुखिया मास्टरजी के नज़दीक गया और बोल पड़ा। "गुरुजी सिर्फ सेठजी का बेटा ही भगवान का रूप है या.... हम भी है? सुखिया ने अपनी और अपने साथियों की ओर इंगित करते हुए बोला।
"बिल्कुल। सभी बच्चे भगवान का रूप होते हैं, चाहे कोई भी हो। तुम भी हो सुखिया।" मास्टरजी ने सुखिया को संतुष्ट करने की कोशिश की।
"तो फिर सेठजी को समझाइए गुरुजी। ये तो हमें देखते ही भगा देतें है।" सुखिया ने सेठजी की ओर इशारा करते हुए कहा।
"ए सुखिया। फालतू बात मत कर। चल...भाग यहाँ से।" सेठजी झल्लाये।
"ये लो... देख लो गुरुजी।" सुखिया ने सेठजी की ओर पुनः इशारा किया।
मास्टरजी सुखिया की बात पर बिना मुस्कुराये नहीं रह सके।
"तू पाठशाला क्यों नहीं आता सुखिया? क्यों सारा दिन आवारा घूमता रहता है?" मास्टरजी ने सुखिया से पूछा।
"कल से जरूर आऊँगा गुरुजी।" सुखिया ने आज फिर मास्टरजी को गोली दे दी।
मास्टरजी मुस्कुराते हुए पाठशाला की ओर चल पड़े। सुखिया ने भी निर्भीकता से ठीकरे की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिये।
"कहाँ जा रहा है सुखिया?" सुखिया के साथी ने पूछा।
"लड्डू उठाने, और कहाँ।" सुखिया ने निडरता से जवाब दिया।
"कोई बला आ गई तो?
"अभी सुना नहीं क्या? गुरुजी ने क्या कहा था? हम भगवान है, हम पर बलाओं का क्या असर?" सुखिया ने ठीकरे से लड्डू उठाये ही थे कि बाई उसे ढूंढते हुए वहाँ आ गई। बाई को देख सुखिया बाई के सामने ही आ गया।
"अरे कहाँ था तू? कब से ढूंढ रही हूं तुझे। चल बापू की रोटी देने खेत चलें।"
"मैं तुम्हारे लिए लड्डू लेने गया था बाई।" सुखिया ने लड्डू बाई की ओर बढ़ा दिया।
"कहाँ से लाया है?"
"बाद में बताऊंगा पहले लड्डू खाओ।" सुखिया ने लड्डू बाई को दिया और अपने साथियों में भी बांट दिया।
"लड्डू बहुत अच्छे हैं सुखिया। कहाँ से लाया?" बाई ने सुखिया से फिर पूछ लिया।
"वो ठीकरा देख रही हो बाई?...उसी में से उठाया है।"
सुखिया ने चौराहे में रखे ठीकरे की ओर इशारा कर दिया।
"हाय! कर्मजले! तूने मुझे टूणे वाला लड्डू खिला दिया?" बाई ने लड्डू को ज़मीन पर पटक दिया।
ज्योंही बाई ने गुस्से से लड्डू पटका, सुखिया खतरनाक स्थित को भांप चुका था और भागने के लिए पूरी तैयारी कर चुका था। बाई ने ज़मीन से छड़ी उठाई और सुखिया की ओर लपकी।
"ठहर जा तू। मैं बताती हूँ तुझे। अगर कोई बला आ गई तो?"
"कोई बला नहीं आयेगी बाई। तुम्हारे लिए तो सुखिया ही सबसे बड़ी बला है।"
सुखिया ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। अब सुखिया को पकड़ना कहाँ मुमकिन था।।■■■■■

सुनील पंवार

वो रात

                                  वो रात

आज फिर मैं समय से पहले ही पहुंच गया। हर बार ऐसा ही हुआ है मेरे साथ। हो भी क्यों ना! आखिर महीने में एक बार ही तो मिल पाता हूँ उससे। उसकी गहरी नीली आँखें,हज़ारों सवालों का समंदर समाए हुए थीं। जबसे मेरी ज़िंदगी मे आई मुझे लगा जैसे मैं उसके बिना बहुत अधूरा था, शायद उसके आने से कुछ मकसद मिला हो ज़िन्दगी को।
अभी भी तीस मिनट बाकी थे, सो मैंने गाड़ी में ही बैठकर उसका इंतजार करना मुनासिब समझा।
काले बादलों ने आसमान को घेरना शुरू कर दिया था, हवाएं भी तेज़ हो गई थी, ऐसा लग रहा था जैसे आज फिर तूफ़ान आने वाला था। मैंने गाड़ी अन्दर से लॉक कर ली और सीट की पुश्त पर अपना सिर टिका दिया।
मेरा एक एक पल बरस के समान गुज़र रहा था, मैं बस बेताब था की कब उसका मासूम खूबसूरत चेहरा मेरी आँखों के सामने आये। आज मुझे उसके साथ बाहर जाना है, पूरे दिन एक साथ रहना है, मैं सोचकर ही उत्साहित हो रहा था। मैं आसमान में मंडराते घने बादलों की ओर देख रहा था जो हवाओं के साथ बहते ही जा रहे थे। बहते हुए समय की धार में मैं भी ना जाने कब बीते समय के भँवर में खो गया पता ही नहीं चला।
 सात साल बीत चुके थे उस भयानक रात को। मैं ऑफिस से घर के लिए देरी से चला था। बरसात ने मेरी रफ़्तार धींमी कर दी, मुझे पहले ही बहुत देर हो चुकी थी इसलिए ट्रैफिक से बचने के लिए मैंने शॉर्टकट ले लिया, ये रास्ता सुनसान जरूर था पर ट्रैफिक की परेशानी बिल्कुल नहीं थी। आसमान में चमकती बिजली जैसे धरती से आलिंगन को बेसब्र थी। सुनसान रास्ता और अंधेरी रात ने माहौल डरावना बना दिया था, मैं धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था कि अचानक एक कुत्तों का झुंड बीच रास्ते आ गया। मैंने गाड़ी रोक दी। कुत्तों का झुण्ड एक बक्से के लिए लड़ रहा था जिसे वो घसीटते हुए सड़क पर ले आये थे और जो मेरे सामने सड़क के बीचों बीच पड़ा था जिसे मैं साफ साफ देख पा रहा था।
मैंने कई बार हॉर्न दिया पर वो हटने को तैयार नहीं थे। मैं गाड़ी से उतरा और कुतों को तेज आवाज़ में दुत्कारते हुए उनकी ओर बढ़ा, मुझे अपनी ओर बढ़ते हुए देख वो इधर उधर भागने लगे। मैंने बीच रास्ते पड़े बक्से को सड़क के एक तरफ अपने पैर से खिसका दिया। रास्ता साफ देख मैं अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा ही था कि अचानक एक आवाज़ ने मेरे बढ़ते कदमो को रोक दिया। मैं ठिठक गया और मुड़ कर पीछे देखने लगा। "बच्चे के रोने की आवाज़?... यहाँ....?" मैं मन ही मन बुदबुदाया। मैं फिर गाड़ी की ओर बढ़ने लगा, बच्चे के रोने की आवाज़ और भी तेज़ हो गई। मैंने सड़क के एक तरफ पड़े बक्से  की ओर देखा जिसे अभी अभी मैंने अपनें पैरों से धकेला था। मैं सहमें हुए कदमों से बक्से की ओर बढ़ने लगा, मैंने बक्से को उठाया और उसे गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी में ले आया। मैंने जैसे ही बक्से को खोला मेरी आँखें मारे विश्मय के फट पड़ी। "हे... ईश्वर!...ये क्या?" मैंने इतना भयानक मंजर कभी नही देखा। एक जीवित बच्चा, जिसे देखने मात्र से ही पता चल रहा था कि उसका जन्म चंद ही घण्टों पहले हुआ था। "ये क्या?... कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है?"
मैंने उस मासूम को उठाया और गाड़ी में ले आया। मैंने सीट पर लगे तौलिए से उसे अच्छी तरह लपेट लिया और हीटर भी ऑन कर दिया ताकि उसे ठंड से राहत मिल सके। मुझे कुछ भी सूझ नही रहा था ऐसा लग रहा था जैसे मैं मस्तिष्कविहीन हूँ। मैंने डैशबोर्ड पर रखा फोन उठाया और पुलिस को फोन लगा दिया। मैंने पुलिस को सूचना देने के बाद गाड़ी अस्पताल की ओर दौड़ा दी। उस मासूम की किलकारियां मुझे बहुत इरिटेट कर रही थीं। कुछ ही दूर पहुचने पर हीटर की गर्मी से उसे कुछ राहत मिली और वो शान्त हो गया। मुझे न जाने क्यों उसकी परवाह हो रही थी, उसका शान्त होना मुझे और भी परेशानी में डाल गया। मैंने उसे देखा सांसे चल रही थीं तो कुछ सुकून मिला। अस्पताल तो जैसे मीलों दूर हो गया था। मौसम भी दुश्मन बना हुआ था उस मासूम का। रेंगते रेंगते आखिरकार हम अस्पताल पहुंच ही गए। मैं उसे उठाये इमरजेंसी वार्ड की ओर दौड़ा। सबसे सुकून वाली बात ये थी कि अस्पताल के स्टॉफ ने खूब मदद की, जिससे उस मासूम का उपचार शुरू हो सका। कुछ ही देर में पुलिस भी आ पहुंची। तीन पुलिस कांस्टेबल के साथ एक लम्बा चौड़ा, बड़ी बड़ी मूछों वाला इंस्पेक्टर मेरे सामने प्रकट हुआ, देखने में वो किसी दैत्य से कम नहीं था। मैं उसे देखकर थोड़ा सहम गया। "तुमने ही कॉल किया था?" उसने गुटका चबाते हुए सवाल किया।
"जी" मैं बस इतना ही कह पाया। उसने मुझे बैठने का इशारा किया। मैं बैठ गया तो उसने फिर मुझे बोलने का इशारा किया। मैं उसके इशारे को समझ गया और सारी घटना उसे बता दी। वो शांत दैत्य की तरह मेरी बात को सुन रहा था, मेरी बात पूरी होने पर उसने चुप्पी तोड़ी।
"तो तुम क्या चाहते हो?"
"मैं कुछ समझा नहीं सर!"
"देखो बेटा... ऐसा है.. तुम सच बोल रहे हो हम कैसे मान लें? हो सकता है ये कुकर्म तुम्हारा ही हो।"
"ये आप क्या बोल रहे हैं सर? आप... मुझपर...."
उसने मुझे बीच में ही चुप रहने का इशारा किया, मैं सहम गया।
"कौन विश्वास करेगा? तुम्हारे जैसे लौंडों से रोज का काम पड़ता है हमें।"
"सर आप चाहें तो मेरा डीएनए सेंपल ले सकतें है। मैं शादीशुदा हूँ...मेरे बच्चे भी हैं सर।"
"ये सब लम्बी प्रक्रिया है बेटे। ज्यादा हीरोगिरी नहीं चलेगी। इसके जन्मदाताओं ने जब इसको मरने के लिए डाल दिया तो तू किस नाते इसे यहाँ लाया? हम सब समझते है.. पहले एन्जॉय करते हो फिर अपना पाप पुलिस के मत्थे मार देते हो।" वो मुझपर इल्ज़ाम पर इल्ज़ाम लगाये जा रहा था और मैं सिर्फ सुन रहा था, मुझे अपनी गलती पर बहुत पछतावा हो रहा था। मैं उस पुलिसवाले  से डरा हुआ था। मुझे लगा जैसे मैं बेवजह फंस गया हूँ। मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही अधेड़ उम्र की नर्स एक फ़ाइल लेकर मेरी ओर बढ़ी।
"यहाँ साइन कर दीजिए सर।" उसका लहज़ा बड़ा नम्र था। "किसलिए?" मैंने आश्चर्य से पूछा।
"सर! बच्ची की हालत बहुत नाज़ुक है, इसलिए अंडरटेकिंग फॉर्म भरना होगा।"
"क्या वो बच्ची है?" मैंने पूछ लिया।
"जी।"
"लेकिन.... मैं.." मैंने अपनी बात बीच में ही रोक दी, वो दैत्य मेरी तरफ घूर घूर कर देख रहा था। मैं उसका इशारा साफ़तौर पर समझ गया और फ़ाइल में साइन करने लगा। "शुक्रिया सर!" उसने फ़ाइल ली और आगे बढ़ गई। "अब तुम अपना नाम पता बताओ और फिर चाहो तो घर जा सकते हो।" उस दैत्य समान आदमी का मैं गुलाम सा बन गया था, वो जो भी मुझे आदेश दे रहा था मैं उस काम को किये जा रहा था। अपनी औपचारिकता मात्र पूरी करने के बाद वो अपने साथियों के साथ अस्पताल से निकल गया। मैं निढ़ाल सा वहीं बैठा रहा, रात बहुत हो चुकी थी, बरसात भी मंद पड़ चुकी थी। मैं अपनी जगह से उठा और बाहर जाने के लिए चलने ही वाला था कि एक आवाज़ ने मुझे रोक दिया।
"सर.....!" मैंने पीछे मुड़कर देखा, अधेड़ उम्र की वही नर्स मेरे सामने थी। मुझे लगा जैसे वो मुझसे कोई सवाल करेगी उससे पहले ही मैं बोल पड़ा।
"मैंने कुछ नहीं किया,... मेरा यकीन करो।"
"जानती हूँ।" वो बड़े ही विनम्र लहज़े में मुझसे बात कर रही थी। उसने फिर बोलना शुरू किया।
"जानती हूँ सर आपने कुछ नहीं किया। पर आपने बहुत कुछ किया है।"
"जी... मैं कुछ समझा नहीं!"
उसने हल्की सी मुस्कान बिखेरी और बोली।
"आपने कुछ गलत नही किया सर! ईश्वर पर भरोसा रखिये,  किसी दूसरे का पाप आपका पुण्य बन गया है। घर जाइए सर!...शुभरात्रि।" वो मुड़ी और वार्ड की तरफ बढ़ गई।
रात के दो बज चुके थे, मैं घबराया हुआ सा घर मे घुसा। सब गहरी नींद में सो रहे थे तो मैं भी चुपचाप बिस्तर में घुस गया।
"बहुत देर कर दी!.. तीन घण्टे लग गए घर पहुंचने में!"  वाणी बिना आँखे खोले ही मुझसे बात कर रही थी। "हाँ...देर हो गई.. अस्पताल में।" अस्पताल का नाम लेते ही उसने आँखे खोली और बोली "क्या हुआ?...अस्पताल क्यो?"
मैंने उसे जो भी घटित हुआ वो सब बताया। इसके बदले उसने सिर्फ एक ही बात कही। "बहुत बुरा हुआ।" उसने गहरी सांस छोड़ी और करवट बदल ली। मैं कुछ देर चुप रहा फिर धीरे से बोला। "वाणी!..क्या हम उस बच्ची को घर ले आयें?"
वो मेरी ओर पलटी और बोली। " पागल हो? खुद के बच्चे तो संभलते नहीं और चले हो दुसरो के बच्चे पालने.... सो जाओ।" उसका सीधा सपाट जवाब सुनकर मुझसे हिम्मत नहीं हुई दोबारा बात करने की। मैं करवट बदल कर सो गया पर नींद मुझसे कोसों दूर थीं। आज मैंने दो स्त्री रूप देखे, एक वो जिसने एक मासूम को जन्म दिया और मरने को छोड़ दिया और दूसरी, वो जो खुद एक माँ होकर भी मासूम का दर्द नही समझ पा रही थीं, पर मेरे अंदर छुपी नारी शायद ये महसूस कर रही थी। मैंने रात जैसे तैसे गुज़ारी और सुबह ऑफिस जाने से पहले अस्पताल पहुंच गया। मैं उस अधेड़ महिला को ढूंढ रहा था कि सहसा ही वो मेरे सामने आ गई। "वो नहीं मानी ना?" उसने मुझसे पूछा।
"कौन?" मैंने आश्चर्य से पूछा। "आपकी पत्नी।"
उसके चेहरे पर मुस्कान थी, मैं उससे झूठ नहीं बोल पाया और हामी में गर्दन हिला दी। वो मेरे नज़दीक आयी और बोली। "अक्सर ऐसा ही होता है सर। आप चाहें तो मैं कुछ महिलाओं को जानती हूँ जो एक संस्था चलाती है आप चाहें तो उनसे इस मासूम के बारे में बात कर सकतें है।" मुझे उसकी बात ज्यादा बेहतर लगी। मैंने उस महिला की मदद से एक संस्था से सम्पर्क किया और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद एक सप्ताह में उसे वहाँ दाखिला दिला दिया। मैं उस बरसाती रात को कभी नही भूल पाया, मैंने उसका नाम "बरखा" रखा। हर महीने मैं उससे मिलने यहाँ आता हूँ, वो मुझे "सर" कहती है, मैं आज भी हमारे रिश्ते की पहचान नहीं कर पाया।
गाड़ी के शीशे पर दस्तक ने मेरी यादों के चक्र को तोड़ दिया। मैंने देखा वो मेरे सामने खड़ी थी, समंदर जैसी नीली आँखों वाली। मैंने दरवाज़ा खोला तो वो अन्दर आ गई। मैंने उसे बाहों में लिया और कस कर सीने से लगा लिया। मैं उससे अपने से दूर नही करना चाहता था।
"चलें.... सर!" उसने मुस्कुराते हुए अपनी मख़मली आवाज़ में कहा।
"जरूर।" मैं मुस्कुराया और फिर एक अनजान दिशा की तरफ गाड़ी दौड़ा दी।।■■■■■■


सुनील पंवार

छँटता कोहरा

छँटता कोहरा

पटना से राँची जाने वाली ट्रैन ज्योंही स्टेशन पर रुकी, यात्रियों की भीड़ इस कदर उमड़ पड़ी जैसे सारा शहर आज ही पटना को अलविदा कहने वाला हो। मीरा ने बच्चों के साथ अपना सामान एसी कोच में रखवाया तब जाकर उसे सुकून की साँस आई। एक तो गर्मी और ऊपर से लोगों की भीड़ ने तो जैसे वातावरण में आग ही लगा दी थी। ट्रैन चलने में अभी समय था। मीरा ने कोच में बैठे अपने सहयात्रियों की और नज़र दौड़ाना शुरू कर दिया। आख़िर ये जरूरी भी है कि आप इतना लंबा सफर तय करें तो आपके सहयात्रियों को जानना आपके लिए बेहद जरूरी है।
ट्रैन ने पटरी पर धीरे-धीरे रेंगना शुरू कर दिया था। सभी यात्रियों ने अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लिया। मीरा भी अपनी बर्थ पर आराम से बैठ गई। अचानक उसकी नज़र बगल वाली बर्थ पर पड़ी,तो देखा एक साधारण सी शक्ल सूरत वाली साँवली सी अधेड़ उम्र की महिला, जो देखने से ही असभ्य लग रही थी। अस्त व्यस्त साड़ी, बिखरे हुए बाल और चौकड़ी मारकर सीट पर बैठना तो उसकी फूहड़ता में चार चाँद लगा रहा था। महिलाओं वाली नज़ाकत तो उसमें बिल्कुल भी नहीं थीं। ऐसा लगा जैसे कोई जनरल डिब्बे की सवारी गलती से एसी कोच में चढ़ गई हो।
ट्रैन ने अब रफ़्तार पकड़ ली थी और पूरी ट्रैन धीरे-धीरे शांत होती जा रही थीं। मीरा का ध्यान उसी महिला पर केंद्रित था पर उसे इस बात की ख़बर कहाँ थी कि कोई उसको न केवल घूर घूर देख रही थी, बल्कि न जाने उसके बारे में क्या क्या राय भी कायम कर रही थी। अपने ही आप मे मग्न उस महिला ने अपनी बर्थ का पर्दा लगाया और बत्ती गुल कर दी।
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सुबह के पाँच बज रहे थे। "चाय...! गर्म चाय..!" की  आवाज़ ने  मीरा की नींद में ख़लल डाल दी थी। वो उठकर बैठ गई।
"चाय..!" एक तेज़ आवाज़ ने चाय वाले की रफ़्तार में बाधा डाल दी थी, वो ठिठक गया और आवाज़ की दिशा में मुड़ गया। उसकी आवाज़ में बिल्कुल भी भद्रता नही थी। इतनी जोर से आवाज़ सुनकर कर मीरा ने अपनी नज़र बगल वाली बर्थ की ओर दौड़ाई। मीरा को बड़ा अजीब लग रहा था, भला इतनी ऊँची आवाज़ में भी कोई बोलता है क्या!
राँची पहुंचने में अभी तीन घण्टे का सफ़र शेष था। सूर्य ने अपने आने की दस्तक दे दी थी। बच्चे भी तब तक जाग चुके थे और वो मीरा के पास ही आकर बैठ गए। मीरा ने सबके लिए चाय ले ली और चुस्कियों के साथ खिड़की से बाहर के नज़ारे का आनंद लेना शुरू कर दिया। बीच बीच में वो उस महिला की बर्थ की ओर अपनी निगाहें छोड़ती रहती। छंटती भौर ने मौसम की रंगत ही बदल दी थी। मीरा बच्चों के साथ बातों में मसरूफ़ हो गई।
वो अपनी बातों में इतनी मशरूफ़ थी कि उसे पता ही नही चला कि कब अचानक बातों-बातों में उसके मुँह से किसी बात को लेकर एक शब्द निकल गया, "शायद..!"
"शा..... यद!" एक अजनबी आवाज़ ने मीरा का ध्यान इस क़दर आकर्षित किया कि वो पीछे मुड़कर देखे बिना ख़ुद को रोक नहीं पायी। देखा तो पर्दे से झाँकती हुई साँवली सी सूरत.. और उस पर बिखरी मुस्कान ने मीरा के मन को सुकूँन सा पहुंचाया। उसकी जुबान से निकले उस एक शब्द में इतनी रूमानियत थी कि वो मीरा के हृदय छू गई। वही फूहड़ सी दिखने वाली महिला मीरा को निहारे जा रही थी। उसने पर्दा हटाया और मीरा के सामने वाली बर्थ पर बैठ गई। व्यवस्थित ढंग से पहनी साड़ी, सलीके से बने हुए बाल और भाषा में इतनी नम्रता लिए उसने मीरा को चौंका ही डाला। वो कल रात से बिल्कुल विपरीत नज़र आ रही थीं। मीरा ने भी उसका स्वागत एक मीठी सी मुस्कान से किया। दोनों में बातचीत शुरू हुई और देखते ही देखते वो बातों में मशरूफ़ हो गईं।
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ट्रेन की रफ़्तार धीमी पड़ने लगी थी और  तेज धूप भी  चढ़ आई थी। राँची स्टेशन पहुँचने में अभी दस मिनिट शेष थे। उस महिला ने अपनी बेग से एक नीले कवर की पतली सी किताब निकाली और उसे मीरा की ओर बढ़ा दी।
"ये क्या है?" मीरा ने उत्सुकता से पूछा।
"कहानी संग्रह है। लघुकथाएँ! शायद आपको पढ़कर अच्छा लगे।" उसने मुस्कान बिखेरते हुए उत्तर दिया।
"इसका लेखक कौन है?" मीरा ने फिर सवाल किया।
"हम्म! इसका लेखक आपके सामने विराजमान है।" उसने लम्बी साँस छोड़ी। "इसमें मेरे फोन नम्बर भी है, अगर कभी स्मरण हो आये तो कॉल कर लीजिएगा।"
उसने अपना समान उठाया और दरवाज़े की तरफ चल पड़ी। मीरा ने उससे विदा लेने के बाद उस किताब को पलट कर देखा। "डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र!" जीवन परिचय पढ़ा तो मीरा दंग रह गई। जिसे वो देहाती, असभ्य और अनपढ़ समझ रही थी वो जानीमानी लेखिका और उच्च शिक्षा प्राप्त एक विदुषी थी। जो एक उच्च पद पर कार्यरत थी। मीरा ने किताब अपनी बेग में रखी और घर की तरफ चल पड़ी।।
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तीन साल बीत गए पर मीरा उस किताब को नहीं पढ़ पायी। आख़िर महिलाओं को इतनी फ़ुर्सत ही कहाँ कि चैन से बैठकर कहानियां पढ़ सके। वो जब भी अलमारी की सफाई करती, तो वो नीले कवर में लिपटी उसके सामने आ ही जाती। आज भी वो अचानक मीरा के सामने आ गई थी। मीरा भी आज फुर्सत से उसे पढ़ने का मन बना चुकी थी। एक के बाद एक कहानी वो पढ़ती गई, न समय का पता चला और न ख़ुद का। सरल भाषा में  लिखी छोटी- छोटी कहानियों ने उसे बहुत प्रभावित किया। शाम के चार बजे चुक थे। मीरा डॉ0 मिथिलेश कुमारी से बात करने के लिए किताब में छपे फोन नम्बर को डायल करने लगी।
"ट्रिन.. ट्रिन" की आवाज़ ने उसे सुनिश्चि कर दिया कि सम्पर्क सध चुका है।
"हेलो..." सामने से किसी पुरुष की आवाज़ उभरी।
"हेलो...कौन?" मीरा ने पूछा।
जी। मैं आयुष्मान नीलाभ बोल रहा हूँ, आपको किससे बात करनी है?"
"मैं अहमदाबाद से मीरा जगनानी बोल रही हूँ। मुझे
डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र से बात करनी है।"
"आई एम सॉरी मेम! शायद आपको पता नहीं कि वो अब इस दुनियां में नहीं है। उन्हें गुज़रे तीन साल हो चुके हैं।" उसने बताया।
मीरा को ये सुनकर बहुत शौक़ लगा। अपने आप को संभाल कर मीरा ने फिर से बोलना शुरू किया।
"मेरी मुलाक़ात उनसे एक ट्रेन में हुई थी, उन्होंने मुझे अपनी पुस्तक भेंट की थी। मुझे माफ़ करना, मुझे पता नहीं था कि...!" वो बीच में ही रुक गई।
"कोई बात नही।" उसने कहा और फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।
मीरा ने भारी मन से फोन रखा और उस किताब को अपनी गौद में रखकर बच्चे की तरह सहलाने लगी। काश! उसने वो किताब समय रहते पढ़ ली होती तो शायद एक बार उनसे बात हो गई होती। ख़ैर! 'छँटता कोहरा' शीर्षक तो अच्छा था, पर उस दिन वाली ट्रेन की यादों का छाया कोहरा तो आज छँटने का नाम ही नही ले रहा था।
(ये कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। जैसा कि मुझे श्रीमती मीरा जगनानी अहमदाबाद ने बताया। स्व0 डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र को समर्पित।)
        सुनील पंवार

एक कप चाय और तुम!


           एक कप चाय और तुम!

सर्द दिसम्बर और क्रिसमस की पूर्व संध्या पर मैं उसका बेसब्री से इंतजार कर रहा था। घर में इतनी खामोशी पसरी थी कि घड़ी के काँटे की आवाज़ भी मेरे अवचेतन मन में हथौड़े की तरह चोट कर रही थी। मैं बार-बार दरवाज़े की तरफ अपनी नज़रें दौड़ा रहा था। मेरा गौद में रखी मैगज़ीन के पन्नों को बार-बार पलटलना भी पढ़ने का महज़ एक बहाना ही था। साढ़े पांच बज चुके थे, दिन की रोशनी अब अंधेरे में तब्दील हो रही थी और उसकी गैरमौजूदगी की फिक्र का गुबार भी मेरे मन में उठने लगा था।
"कहाँ रह गई! इतनी देर क्यों लग गई! अब तक तो आ जाना चाहिए था उसको।" मैं अपने आप से प्रश्न पर प्रश्न कर रहा था, पर अफ़सोस कि मेरे पास कोई माकूल जवाब नहीं था उसकी गैरमौजूदगी का। मैं उठा और बालकनी में आ खड़ा हुआ,पर यहाँ से भी उसके आने का कोई भी संकेत मुझे दिखाई नहीं दिया। मैं फिर कमरे में आया  और सोफ़े पर बैठ गया।
पिछले एक साल से मैं इस दिन का इंतजार कर रहा था कि वो मेरे साथ एक कप चाय शेयर करे, पर जब कभी भी मैंने उसे ऑफर किया उसने झट से नकार दिया। मैं लगभग एक साल पहले वाणी से अपने ऑफिस में मिला था और तब से ही मैं उसे पसन्द करने लगा था, पर वो थी कि मेरे दिल के हालातों से वाक़िफ़ होकर भी अनजान बनी रहती। मैं उसे कई दफ़ा कॉफ़ी, लंच और डिन्नर ऑफ़र कर चुका था,पर क्या मज़ाल जो उसने एक बार भी रेस्पॉन्स दिया हो। तीन दिन से लगातार उसके पीछे पड़े रहने के बाद उसने क्रिसमस ईव पर इस शर्त पर कि मैं उसे अपने हाथ से बनी चाय ही पिलाऊं; मेरे घर पर ही मिलना तय किया। मुझे यकीन नही था कि वो ऑफ़र एक्सेप्ट करेगी। दीवार पर टँगी घड़ी मेरा मुँह चिढ़ाती हुई धीरे-धीरे रेंग रही थी। मैं व्याकुल हो रहा था, आख़िर कोई सब्र करे भी तो कितना!
"कहीं उसने मुझसे मज़ाक तो नहीं किया था?..नहीं.. नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है। उसने कहा था वो आयेगी। तो फिर..... इतनी देर कहाँ हो गई?" मेरा बैचैन मन अपने ही सवाल जवाब के गणित में उलझ गया था।
मैंने फोन का रिसीवर कान से लगाया और ऑफिस का नम्बर डायल करने लगा।
"हेलो सर! मैं निधि बोल रही हूँ।" सामने से एक आवाज़ उभरी।
"हाँ! निधि, वाणी है क्या ऑफिस में?"
"नही सर! वो तो लंच के तुरन्त बाद निकल गई। कोई जरूरी मैसेज है क्या?"
"नही! बस यूँही। थैंक यू।" मैंने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। मेरा मन बेचैन हो रहा था कि तभी
अचानक डोरबेल बज उठी। मैं लपक कर दरवाज़े की ओर बढ़ा, मुझे लगा जैसे तनिक भी देर करना वाज़िब नही था।  होंठो पर मुस्कान बिखेरे वाणी दरवाज़े खड़ी थी। वो नीली साड़ी में खूब जँच रही थी। बड़े सलीके से बँधे लम्बे घने बाल, भूरी चपल आँखे, गोरा रंग और चेहरे पर लहराती लट तो उसकी खूबसूरती पर चार चाँद लगा रही थी। मैं उसे देखकर फ्रीज़ हो गया, बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में। उसे देखकर मेरे बेचैन दिल ने कुछ सुकून महसूस किया।
"अन्दर आने का नहीं कहोगे?" उसकी सिक्कों जैसी खनकदार आवाज़ ने मेरी तन्द्रा भंग कर दी।
"ओह! सॉरी। अन्दर आओ।" मैंने दरबान की तरह उसका स्वागत किया।
उसने ज्योंही घर मे क़दम रखा, हवा के एक झोंके ने उसका स्वागत कुछ यूँ किया कि खिड़की पर लगी विंड चाइम्स को हल्के से हिला दिया और उसके मधुर संगीत ने पूरे घर में बिखरी ख़ामोशी का क़त्ल कर दिया। अब घर की रौनक ही कुछ और थी। वो मेरे बगल में ही सोफ़े पर बैठ गई।
"यकीन नहीं हो रहा तुम यहाँ हो।" मैंने बात की शुरुआत करते हुए कहा।
"क्यों?"
"जब तुमने आने में इतनी देर कर दी तो मैंने सोचा शायद तुमने मुझसे मज़ाक किया होगा।"
वो हल्की सी मुस्कुरा दी। मैं उसके सामने काफ़ी नर्वस था। क्या बात करूँ! कैसे करूँ! बस इसी उधेड़बुन में उलझा रहा। मेरे साथ वही हो रहा था कि तन्हाई में तो हाल-ए-दिल सुना दें, पर मुलाकात में तो बात भी मुक्कमल ना हो।
"मैं चाय बनाकर लाता हूँ।" मैं उठा और रसोई की ओर बढ़ गया।
वाणी भी अपनी जगह से उठी और कमरे में लगी किताबों को देखने लगी। वो घर में सजी हर चीज को बड़ी बारीकी से देख रही थी। उसने मेरी लिखी शायरी की डायरी उठाई, जो मैंने उसके लिए ही लिखी थीं के पन्ने पलेटने लगी, पर वो मेरी तरह पढ़ने का बहाना नही कर रही थी। शायद उसमें लिखे हर लफ्ज़ को वो महसूस कर रही थी।
"लीजिये! चाय बनकर तैयार है।" मैंने चाय टेबल पर रखते हुए वाणी का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास किया।
उसने डायरी टेबल पर रख दी और आकर मेरी बगल वाले सोफ़े पर बैठ गई। उसने चाय का कप उठाया और बात शुरू की।
"क्रिसमस की सब तैयारियां हो गई?"
"मुझे क्या तैयारी करनी है! हर साल की तरह ये भी गुज़र जाएगा।"
"अरे वाह! तुमने तो बहुत अच्छी चाय बनाई है। मुझे अफ़सोस है कि मैं तुम्हारा ऑफर पहले एक्सेप्ट नहीं कर पायी।" वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई और फिर कप अपने होठों से लगा लिया।
मैंने उसका शुक्रिया अदा किया और मुस्कुरा दिया। वाणी ने अपने पर्स से एक छोटा सा गिफ़्ट निकाला और मेरी तरफ बढ़ा दिया। "तुम्हारा क्रिसमस गिफ़्ट।"
"अरे! इसकी क्या जरूरत थी? क्या है इसमें?" मैंने उत्सुकता से पूछा।
"ख़ुद ही देख लो।" उसका सीधा सा जवाब सुनकर मैं गिफ़्ट से रैपर हटाने लगा। अचानक इतना प्यारा उपहार देख मैं खिल उठा। "अरे वाह! पियरी कार्डिन का पैन! ये तो बहुत खूबसूरत है!" मेरी बाँछें खिल उठी। "मुझे लगता है तुम्हारे लिए इससे बेहतर कोई गिफ़्ट नही हो सकता। अब जी भर के लिखना मेरी तारीफ़ में शे'र-ओ-शायरी।" उसने शरारत भरे लहज़े में कहा और मुस्कुरा दी। आज उसकी आँखों में बहुत शरारत थी।
"चलो तुम्हे यकीन तो हुआ कि मैं शायरी तुम्हारी ही तारीफ़ में करता हूँ।" मैं भी मुस्कुरा दिया।
चाय की चुस्कियों के साथ समय ने धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ना शुरू कर दिया और हमारी बातों ने भी।
"वाणी! इस दिन के इंतजार में मैंने एक अरसे का सफ़र तय किया है। मैंने हर पल, हर वक़्त तुम्हें महसूस किया है।" मेरे मन में भरी हसरतों ने अब अंगड़ाइयाँ लेना शुरू कर दिया था,और वो दिल के पिंजरे को तोड़कर ज़ुबा से बाहर आने को फड़फड़ा रही थीं। वाणी बस सिर्फ मुस्करा रही थी बिल्कुल मन्द-मन्द। शायद वो आज सब कुछ मेरी जुबान से ही कहलवाना चाहती थी।
बातों का सिलसिला कुछ यूँ चला की थमने का नाम ही नही ले रहा था। दीवार पर टँगी घड़ी, जो कुछ देर पहले मेरा मुँह चिड़ा रही थी अब अपनी ही भागमभाग में उलझ चुकी थी।
"इस क्रिसमस को यादगार बनाने के लिए तुम्हारा बहुत शुक्रिया वाणी।"
"अरे! मैंने ऐसा कुछ भी तो नही किया जो तुम्हारा क्रिसमस यादगार बन गया! पर मैं दुआ करूँगी कि आज रात सैंटा क्लॉज़ आऐं और तुम्हारी सारी विश पूरी कर दे। वैसे तुम्हारे पास तो सब कुछ है सन्नी। तुम क्या विश माँगोंगे? क्या विश है तुम्हारी? तुम्हें क्या चाहिये?"
"मेरी विश! और मुझे क्या चाहिये?" मैंने उसकी आँखों में देखा और फिर बोलना शुरू किया।
"ह्म्म्म....! मेरी विश! अगर सेंटा मेरे पास आये तो उनसे सिर्फ एक विश माँगूँगा। सिर्फ एक।"
"वो क्या?" उसने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
मैं अपनी जगह से थोड़ा सा खिसक कर वाणी के नज़दीक गया और उसकी चपल भूरी मन्द मन्द मुस्कुराती आँखों में झाँककर धीरे से कहा।
"एक कप चाय और तुम!" मेरी बात सुनकर वो मुस्कुरा दी और अपनी दोनों पलकों को 'हाँ' के इशारे में झपका दिया,
जिसका सीधा सा मतलब था "आमीन!"
सुनील पंवार



Wednesday, 19 February 2020

मैं शांत हूँ ठहरे पानी सा..

             मैं शांत हूँ ठहरे पानी सा..

मैं चुप हूँ, मैं चुप हूँ।
मैं चुप हूँ बेजुबानी सा।
है दिल में  समुंदर दबा हुआ,
मैं शांत हूँ ठहरे पानी सा।।

जो तू सुनती नहीं, मैं कहता वही।
तुझे फिक्र नहीं, मेरा ज़िक्र नहीं।।
करूँ किस्सा ए महोब्बत बयाँ कैसे?
मेरा ईश्क़ अधूरी कहानी सा।
है दिल में  समुंदर दबा हुआ,
मैं शांत हूँ ठहरे पानी सा।।

पल पल, पल पल, हर पल,
छाई है कैसी ये उलझन?
तुझे इकरार नही,
मेरा इज़हार वही।
मैं थाम लूँ कैसे दामन को?
तेरा अक्स हवा की रवानी सा।
है दिल में  समुंदर दबा हुआ,
मैं शांत हूँ ठहरे पानी सा।।

है दिल में हसरतें जवां जवां।
है फ़िज़ा में बिखरा धुंआ धुंआ
लफ्ज़ मेरे बेबस है तो क्या?
मैं पढ़ता हूँ तेरा कलमा दुआ।
मैं काफ़िर नहीं ख़ुदा की कसम,
तेरा नाम लबों पे रब्बानी सा।।
है दिल में  समुंदर दबा हुआ,
मैं शांत हूँ ठहरे पानी सा।।

मैं चुप हूँ, मैं चुप हूँ,
मैं चुप हूँ बेजुबानी सा।
है दिल में  समुंदर दबा हुआ,
मैं शांत हूँ ठहरे पानी सा।।

सुनील पंवार (स्वतंत्र युवा लेखक)
रावतसर
जिला:-हनुमानगढ़(राजस्थान)