Saturday, 22 February 2020

बंद कॉटेज

(कहानी)

*बंद कॉटेज, और ताला नया*
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कहानीकार: सुनील पंवार

अभी एक सप्ताह ही हुआ था मुझे यहाँ शिफ्ट हुए। रोजमर्रा की भागदौड़, दहाड़ें मारती मशीनों की चीखें और वाहनों का शोर सुनना तो जैसे बीती बातें ही रह गई थीं। मुझे बहुत सारी कहानियों पर काम  करना था और शहर की भागदौड़ भरी ज़िन्दगी से मेरा मोहभंग हो चुका था। शहर में रहकर शायद मैं लेखन का काम पूरी निष्ठा और ईमानदारी से नहीं कर पा रहा था। बचपन के दोस्त शशांक ने शहर से बीस मील दूर अपने फार्म में छोटे छोटे कॉटेज बनाए हुए थे जिनके बीच कम से कम सौ मीटर की दूरी थी। हरे-भरे पेड़, चारों ओर शान्त वातावरण और प्राकृतिक सौन्दर्य की झलक तो देखते  ही बनती थी। एकाकी जीवन जीने के लिए शायद इससे बेहतर कोई जगह नहीं थी। एक सप्ताह में ही मुझे शारिरिक और मानसिक सुकून महसूस होने लगा था। इस कॉटेज में मेरे साथ मेरे दोस्त और सेवक मोहनदादा भी थे। मैं अपने काम में पूरी लगन से व्यस्त था कि मेरा फोन बज उठा........

"हेलो... हाँ शशांक..बोलो।"
"कैसे हो सन्नी? कैसी लगी जगह?" सामने से शशांक ने मेरा हालचाल पूछा।
"अरे ! बहुत बढ़िया! बहुत अच्छी जगह है यार.. तुमने तो बहुत अच्छी व्यवस्था कर रखी है यहाँ,मन करता है सारी उम्र यहीं बस जाऊँ।"
"अरे क्यों नही.. जब तक तुम्हारा दिल करे रह लो।"
"अच्छा ये बताओ अंकल कैसे हैं?" मैंने पूछा
"पापा तो मम्मी की मौत के बाद नेपाल सैटल हो गए..यही कोई तीन साल से... अच्छा ठीक है सन्नी मैं तुमसे बाद में बात करता हूँ, अगर कोई दिक्कत हो तो कॉल करना! ओके !" फोन डिस्कनेक्ट हो गया।

मैं फिर से अपने काम में व्यस्त हो गया। उसी शाम मैं मोहनदादा के साथ प्रकृति का आनंद उठाने पूरे फार्म का चक्कर लगाने निकल पड़ा। यहाँ की हर एक चीज ने मुझे प्रभावित किया लेकिन.....! एक कॉटेज जो लगभग सिरे पर था, मुझे बहुत ही अजीब सा लगा। ऐसा लग रहा था जैसे बरसों से उसमें किसी मनुष्य ने पाँव तक ना रखा हो। ये कॉटेज इस पूरे फार्म की खूबसूरती को धूमिल सा कर रहा था। मैं उस कॉटेज की ओर बढ़ने लगा तो मोहनदादा भी मेरे पीछे- पीछे चल पड़े। चारों ओर से सूखे पत्तों ने उस कॉटेज को लगभग ढक रखा था। हमने उसके चारों ओर एक चक्कर लगाया, पर कोई हलचल नहीं हुई। यहाँ से मेरा कॉटेज सबसे ज्यादा दूरी पर जरूर था पर साफ दिखाई दे रहा था। ये कॉटेज देखने में बड़ा भयानक और भुतहा लग रहा था। एक अजीब बात और थी, देखने में ऐसा लग रहा था जैसे इस कॉटेज को सालों से किसी ने रहने के लिए इस्तेमाल नहीं किया था पर उसका ताला बिल्कुल भी जर्जर नहीं था। ऐसा लग रहा था जैसे उस ताले को समय समय पर खोला गया हो।

"आप यहाँ क्या कर रहे हैं?" मैनेजर साहब के सवाल ने हमारा ध्यान भंग कर दिया।"बस यूँही...घूमने निकले थे।" मैंने उत्तर दिया।"सर्दी काफ़ी बढ़ रही है.. अब आपको चलना चाहिए।" मैनेजर साहब का लहज़ा बड़ा शांत था। मैं साफ़तौर पर महसूस कर रहा था कि उन्हें हमारा वहाँ होना बिल्कुल अच्छा नहीं लगा था। हम दोनों वहाँ से अपने कॉटेज की ओर बढ़ने लगे। मुझे मैनेजर का बर्ताव बड़ा अजीब लगा। वो हमें पीछे से एकटक देखे जा रहे थे। उस रात मेरा मन काम में बिल्कुल भी नहीं लग रहा था। मैं खिड़की के पास लगी आराम कुर्सी पर बैठ गया। रात के दस बज चुके थे, और सर्दी भी बढ़ गई थी मेरी नज़र उस कॉटेज की तरफ़ ही टिकी हुई थी, हालांकि अंधेरे की वजह से कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था फिर भी नज़रें उसी तरफ़ थीं। अचानक मुझे वहाँ कोई हलचल नज़र आई। मैंने मोहनदादा को बुलाया और खिड़की से कॉटेज की तरफ़ देखने को कहा। "लगता है वहाँ कोई है" मोहनदादा ने मेरी ओर देखते हुए कहा।
"लगता तो है दादा।" कॉटेज की दूरी ज्यादा थी पर फिर भी ये अनुमान लगाया जा सकता था कि कोई उस कॉटेज में था। खिड़की से झाँकती हल्की रोशनी ने किसी की मौजूदगी की चुगली कर ही दी थी। हम दोनों के मन में एक बात तो जरूर थी कि कहीं न कहीं कुछ तो गड़बड़ है।"कौन हो सकता है दादा?"
"देखते हैं, एक बार शान्त रहकर देखते रहो।" हम आधे घंटे तक यूँ ही खिड़की से सटे रहे और नज़रें कॉटेज पर गड़ाये रखीं और ताकते रहे। कुछ ही देर में कॉटेज गहरे अंधेरे में डूब गया। यही सिलसिला हर रोज चलता रहा। रात को दस बजे के बाद से लगभग आधे या पौने घण्टे तक वहाँ रोशनी दिखाई देती और फिर गहरा अंधेरा। हम जब भी कॉटेज से निकलते मैनेजर साहब की नजरें हम पर ही होती थीं। मैंने कई बार सोचा कि इस बारे में शशांक से बात करूँ पर हर बार वो बात को टाल देता। एक रात जब मैं अपनी खिड़की से झाँक रहा था मैंने देखा एक गाड़ी कॉटेज की तरफ धीरे धीरे बढ़ रही थी। मैंने मोहनदादा को अपने पास बुला लिया। हम एक दूसरे की तरफ आश्चर्य से देख रहे थे। गाड़ी कॉटेज के सामने आकर रुक गई और हेडलाइट बुझाते ही गहरे अंधरे में गुम हो गई। 

"दादा! लगता है अब समय आ गया है कि इस रहस्य से पर्दा उठा ही दिया जाये।" मैंने दादा की तरफ देखते हुए कहा। दादा ने अपनी लाठी उठाई, तो मुझे समझते देर नही लगी कि दादा ने अपनी सहमति दे दी है। हम दोनों अंधेरे में कॉटेज की तरफ बढ़ने लगे। कॉटेज के दरवाजे पर ताला नहीं लगा था। मैंने दरवाजे को थोड़ा सा अंदर की तरफ धकेला तो वो खुल गया। रास्ता साफ देख हम दोनों अंदर घुस गए। अंदर का दृश्य तो चौकाने वाला था। अंदर की हालत बाहर से बिल्कुल विपरीत थी। एकदम साफ सुथरा, चकाचक। हम जैसे ही थोड़ा आगे पहुंचे ठिठक कर रुक गए।"निकल जाओ.... निकल जाओ यहाँ से.... क्यों आये हो यहाँ?...निकल जाओ।" हम आवाज़ सुनकर सन्न रह गए। धीरे धीरे आगे बढ़ने लगे। सूट-बूट पहने एक आदमी हमारी ओर पीठ किये कमरे में खड़ा था, उसके साथ दो लोग और भी थे। हम दोनों दीवार के सहारे चिपक कर कमरे के अंदर झाँकने का प्रयास कर रहे थे। कमरे के अंदर का दृश्य देख मारे विस्मय के मेरी आँखें फट गईं।

"ये क्या? ...इतना बड़ा झूठ.. मुझसे?" मैं मन ही मन बुदबुदाया। ये दृश्य मेरे सीने को चीर देने वाला था। एक वृद्ध व्यक्ति, जिसे जंजीरों से जकड़ा हुआ था,जिसकी दाढ़ी बढ़ी हुई थी, और वो किसी पिंजर से कम नहीं था। उसकी धंसी हुई आंखें हज़ारों सवाल कर रही थीं।"क्यों आये हो यहाँ?..निकल जाओ!" वृद्ध की आवाज़ में क्रोध झलक रहा था।  मैं निडरता से कमरे के दरवाज़े तक पहुंच ही गया और सूटबूट वाले व्यक्ति के पीछे खड़ा हो गया। वो मेरी ओर पलटा, स्तब्ध ,शान्त! ऐसा लग रहा था जैसे काटने पर खून ना हो। मैं उसकी आँखों में एकटक देखता रहा,  कुछ देर की चुप्पी के बाद शशांक सहसा ही बोल पड़ा। "सोसायटी में रहता हूँ... ! साथ नहीं रख सकता...! बहुत कोशिश की है संभालने की... पर! आखिर सारा बंदोबस्त तो कर ही रखा है यहाँ! और खुद भी संभालने आता हूँ ना हर महीने..! कौन संभाले? बिजनेस संभालूं या इन्हें?" वो बोलता गया और मैं चुपचाप सिर्फ़ उसकी आँखों में देखता रहा। इतनी ठंडी रात में अब सब शांत था, इतना शांत कि सांसों की आवाज़ भी साफ सुनाई दे रही थी। मैं पीछे मुड़ा और धीरे धीरे थके कदमों से दरवाज़े की ओर बढ़ने लगा। वो मुझे जाते हुए देखता रहा। पूरे वातावरण में खामोशी छाई हुई थी सिर्फ नम्बर डायल करते हुए फोन के की-ट्यून की आवाज़ सुनाई दे रही थी जो शशांक कर रहा था। फोन कनेक्ट हो चुका था, सामने से एक आवाज़ सुनाई दी। "हेलो....... एम्बुलेंस।"

*लेखक/कहानीकार परिचय*
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*नाम :-* सुनील पंवार
*पिता:-* स्व. श्री मदन लाल पंवार
*माता:-* श्रीमती कमला देवी
*शिक्षा:-*
स्नातक (बीए), विधि स्नातक (एलएल. बी.), शिक्षा में स्नातक (बी. एड.)
*व्यवसाय:-*
वर्तमान समय में अध्यापक पद पर हनुमानगढ़ जिले में कार्यरत।
*जन्म स्थान:-* रावतसर श्री गंगानगर जिले में 1986 (वर्तमान हनुमानगढ़ जिले में) राजस्थान।
*ईमेल:-* sunil.rawatsar@gmail.com
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*(प्रस्तुति: डाटला एक्सप्रेस/साप्ताहिक/गाज़ियाबाद (उ०प्र०) 24 से 30 जुलाई 2019/प्रत्येक बुधवार/संपादक: राजेश्वर राय 'दयानिधि'/email: rajeshwar.azm@gmail.com/datlaexpress@gmail.com/दूरभाष: 8800201131/व्हाट्सप: 9540276160*

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