Wednesday, 8 April 2020

नवाब का झूठ, रफ़ुगर की सिरदर्दी


मुझे ठीक से तो याद नहीं है, पर उस समय शायद मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ता था। उन दिनों टीवी देखने का अपना ही एक मज़ा था। टीवी के नाम पर घर वाले मुश्किल से मुश्किल काम भी बोल देते तो उसे भी हम बड़ी आसानी से कर दिया करते थे।
उन दिनों रामायण, नुक्क्ड़, जंगल बुक और विक्रम बैताल जैसे पारिवारिक धारावाहिक दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ करते थे। सबके साथ टीवी देखने का आनन्द ही कुछ और था। देखते ही देखते घर मिनी सिनेमाघर में तब्दील हो जाया करता था और वो भी हाउसफुल।
ख़ैर! मैं इन बातों का ज़िक्र आज क्यों कर रहा हूँ ये एक महत्वपूर्ण सवाल है। आइये थोड़ा बीते समय की सैर कर आतें हैं।
उन्ही दिनों दोपहर में एक धारावाहिक प्रसारित होता था जिसका नाम और कलाकार को अब मुझे याद नहीं है पर कहानी कुछ प्रकार थी, कि एक गप्पी नवाब अक्सर महफिलों में अपने बहादुरी के झूठे किस्से,जो सुनने में असंभव लगते थे, सुनाकर शेख़ी बघारने का आदि था, और उसके लिए उसने वाकायदा अपने किस्सों को रफ़ू करने के लिए रफ़ुगर नियुक्त कर रखा था। रफ़ुगर का काम था कि वो नवाब के झूठे किस्सों को सच का जामा पहनाऐ, ताकि सुनने वालों को वो वास्तविक और सच्चे लगे।
नवाब ने एक दिन शेख़ी बघारते हुए कहा कि एक दिन उसने शेर के सिर पर गोली चलायी लेकिन गोली हाथ से निकली। सुनने वालों को भले ही आश्चर्य हुआ हो पर नवाब के चेहरे पर इस झूठ की शिकन तक नही थी। उसे पता था कि रफ़ुगर सब सम्भाल लेगा।
रफ़ुगर ने बात को तुरंत सम्भाल लिया और बोला कि जब नवाब ने शेर पर गोली चलायी तब शेर सिर खुजला रहा था, इसलिए गोली हाथ में लग गई। रफ़ुगर ने इस झूठे किस्से को चुटकियों में सच साबित कर दिया। श्रोताओं ने तालियों से नवाब का मान बढ़ाया।
आज इतने सालों बाद मुझे इस धारावाहिक का स्मरण हो आना स्वभाविक है। आज भी स्थिति वही है नवाब अपने किस्से सुनाते हैं और रफ़ुगर तरह-तरह के लॉजिक लगाकर, अधिकाधिक जानकारी जुटाकर रफ़ू करने में जुट जातें है और झूठे किस्सों को यथार्थ में बदल देते हैं। श्रोता सत्य होने के भ्रम में तालियों से नवाब का मान बढ़ातें है।
नवाब कर्तव्यपरायण है, उसका कर्तव्य है डींगें हाँकना, उसे यथार्थरूप देना रफ़ुगर की सिरदर्दी है।।
सुनील पंवार की क़लम से.....

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