Saturday, 22 February 2020

सुखिया भाग:- 4


                             सुखिया भाग:- 4

दूर से सुनाई दे रही ढोल की मधुर आवाज़ उसे बड़ी विचलित कर रही थी, वो ढोल की ध्वनि की दिशा में बार-बार बार देख रहा था। सुखिया को नाचने का बड़ा शौक रहा था जहाँ कहीं भी ढोल की आवाज़ सुनता तो ढोल की थाप पर थिरके बिना नहीं रहता। सुखिया ने बाई से कई दफ़ा कहा कि वो उसे ढोल वाले को दिखा लाये, पर बाई घर के कामों इतनी व्यस्त थी कि उसके लिए घर से निकलना सम्भव नहीं था और सुखिया को अकेले जाने की इजाज़त नहीं थी। मन मारकर सुखिया को घर मे ही रहना पड़ा, पर उसका मन तो ढ़ोल की आवाज़ में ही अटका था।
"ए सुखिया! जा मेरे लिए एक बीड़ी का बंडल और माचिस की डिबिया ले आ।" बापू ने सुखिया को दो रुपये का नोट थमाते हुए कहा।
"और सुन! जल्दी आना, मुझे खेत जाना है। कहीं इधर-उधर मुँह फाड़ते मत रहना। बीड़ी लेते ही सीधे घर आना। समझे?" बापू ने सुखिया को समझाते हुए कहा।
सुखिया को तो जैसे मुँह मांगी मुराद मिल गई हो। वो तो बस किसी बहाने से घर से बाहर निकलना ही चाहता था। वो घर से निकला और सेठ की दुकान की तरफ चल पड़ा। वो जैसे-जैसे आगे बढ़ रहा था वैसे ही ढ़ोल की आवाज़ भी उसके सामने ही चली आ रही थी। अब तो सुखिया और भी व्याकुल हो रहा था। वो ध्वनि की दिशा में जाना तो चाहता था पर बापू की दी हुई सख्त हिदायद उसके मस्तिष्क में थी। वो रास्ते के बीच रुक गया। कुछ देर सोच विचार करने के बाद दौड़ा-दौड़ा ढ़ोल की ध्वनि की और मुड़ गया।
वो कच्चे रास्ते से होता हुआ एक संकरी गली की और बढ़ गया। कुछ ही देर में वो गाँव के गुवाड़ (गाँव के बीच खाली जगह, जहाँ सार्वजनिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है) पहुँच गया। ढ़ोल वाले के इर्दगिर्द बच्चों का जमघट   था। एक तरफ पेड़ के नीचे बने चबूतरे पर गाँव के बुज़ुर्ग और महिलाएं ढ़ोल की थाप का नज़ारा उठा रहे थे। उन्ही के बीच एक मंगता (भिखारी) सभी दर्शकों से अपना कटोरा बढ़ा कर भीख मांग रहा था। ढ़ोल वाले ने कुछ पल के लिए ढोल बजाना बन्द कर दिया और चबूतरे पर बैठकर सुस्ताने लगा। मंगते ने अपना काम जारी रखा। वो एक के बाद दूसरे के सामने कटोरा बढ़ाता और पैसों की माँग करता। धीरे-धीरे वो बढ़ता हुआ सुखिया के पास आ गया।
"ऊपर वाले के नाम पर कुछ देदे बच्चे!"
भिखारी की बात सुनकर पूरा गुवाड़ हंसी के ठहाकों से गूँज उठा। सुखिया को पता था कि वो सब लोग उस पर ही हंस रहे हैं, पर उसने संयम बनाये रखा।
"अरे! तुम इससे भीख मांग रहे हो? इसका तो बाप खेतों में काम करता है, और इसकी माँ लोगों के घर सफ़ाई करती है। ये  तुझे क्या देगा?" एक बच्चे ने सुखिया की मज़ाक उड़ाते हुए कहा।
"और ऊपर से नीच जात है, सो अलग।" एक तरफ खड़े युवक ने भी अपना ज्ञान पेलना शुरू कर दिया।
"अरे सुखिया! तू तो बड़ा आदमी बन गया रे। तुझसे तो भीख भी माँगने लगे हैं।" एक बुज़ुर्ग व्यक्ति भी इस दौड़ में शामिल हो गया।
"अरे भाई तू आगे बढ़! यहाँ तुझे क्या मिलने वाला है, ये तो ख़ुद माँग तांग कर गुज़ारा करते हैं।" उसने भिखारी को सलाह दी।
अब सुखिया का सब्र टूट चुका था और वैसे भी सुखिया कितनी देर चुप रहने वाला था।
"ओ ताऊ! एक बात बता। मैं तो कुछ देने के लायक नहीं हूँ, मेरी माँ लोगों के घर में सफाई करती है, बापू खेत में मजदूरी करता है, पर तु तो अच्छे खासे घर का है, फिर इस भिखारी का कटोरा खाली क्यों है? तुमने दिया नही क्या कुछ?" सुखिया की बात सुनकर एक बारगी तो सन्नाटा छा गया।
"देने के लिए कलेजा चाहिए ताऊ! जो तेरे पास नहीं है" अब सुखिया की इस बात पर तो पूरा गुवाड़ ठहाकों से गूंजना ही था।
सुखिया आगे बढ़ा और चबूतरे पर विराजमान ढोली के पास गया।
"एक घण्टे ढ़ोल बजाने के कितने पैसे लोगे?
"पाँच रुपया!"
"दो रुपये में बजाओगे?"
ढोली कुछ सोचता रहा और फिर दो रुपये में राजी हो गया। उसने ढोली की तरफ दो रुपये का नोट बढ़ा दिया जिसे ढोली ने सहर्ष स्वीकार कर लिया।
सुखिया ने मंगते को अपनी और आने का इशारा किया और धीरे से बोला।
"सारे पैसे उठा लेना,सिर्फ़ दो रुपये मुझे दे देना।" इससे पहले की भिखारी कुछ समझ पाता ढोली ने ढ़ोल को थाप देना शुरू कर दिया।
सुखिया ने ज्योहीं पर ढ़ोल पर थिरकना शुरू किया पूरा वातावरण हंसी और मौज भरी आवाज़ों से गूँज उठा। सुखिया पूरी लगन और आनन्द में डूबा नृत्य का लुत्फ़ उठा रहा था। देखते ही देखते लोगों का हुज़ूम गुवाड़ में उमड़ पड़ा और पाँच, दस और बीस पैसों के सिक्कों की बौछार होने लगी। मंगता नृत्य देखने में कम बल्कि पैसे इक्कट्ठे करने में अधिक व्यस्त था। चारों और हास्य और मस्ती बिखर गई थी। जो अब तक सुखिया का उपहास कर रहे थे वही अब उसका हौसला बढ़ा रहे थे।
"वाह सुखिया वाह! क्या बात है! तुम गाँव की शान हो।" भीड़ में से आ रही आवाज़े सुखिया का मनोबल बढ़ाने के लिए पर्याप्त थीं। अब सुखिया को समय की कोई परवाह नहीं थी, वो तो बस मस्ती में मस्त था। उधर जब बहुत देर होने के बाद भी सुखिया घर नही पहुँचा तो बाई उसे ढूढने निकल पड़ी। बाई को भी पता था कि सुखिया कहाँ मिल सकता है। वो ढ़ोल की आवाज़ की तरफ निकल पड़ी।
बाई गुवाड़ में उमड़ा लोगों का हुज़ूम देखते ही समझ गई कि सुखिया ने अपना करतब दिखाना शुरू कर दिया है।
वो भीड़ को चीरती हुई मस्ती में मस्त सुखिया के पास पहुंच गई और ढोली को रुकने का इशारा किया।
ढोल की थाप एकाएक रुक गयी, जो सुखिया को ना-गवार गुजरी।
"ढोल बजाना क्यों बन्द किया?" उसने जोर की आवाज़ में पूछा।
ढोली ने बाई की ओर इशारा किया तो सुखिया ने पलट कर पीछे देखा।
बाई को देखकर सुखिया की सिटीपीटी गुम हो गई।
मंगता अभी भी सिक्के चुनने में व्यस्त था।
"तुझे कहा था ना यहाँ नही आने का! फिर क्यों आया?" बाई का लहज़ा बड़ा सख्त था। सुखिया से अब कोई जवाब देना ना बन रहा था। वो सकपका गया। भीड़ भी अब छंटने लगी थी। "तुझे बापू की बीड़ी लाने के लिए भेजा था और तू यहाँ नाचने में लगा है। बापू अब तुझे पीट-पीट कर मार देगा। कहाँ है बापू की बीड़ी और बाकी के बचे पैसे?" बाई का पारा चढ़ गया।
"बीड़ी तो ली ही नहीं! वो पैसे तो ढोली को दे दिए।" सुखिया ने बड़ी मासूमियत से जवाब दिया।
"क्या? अब बीड़ी कहाँ से लायेगा?"
"इस मंगते से लेने है दो रुपये बाई।" सुखिया ने मंगते की इशारा करते हुए देखा तो दंग रह गया। मंगता गायब था। वो सारे पैसे लेकर रफूचक्कर हो गया। सुखिया ने इधर उधर देखा पर उसका कोई नामोनिशान तक नहीं था।
सुखिया ने अपने माथे पर जोर से हाथ मारा और ज़मीन पर बैठ गया।
"अब क्या हुआ?"बाई ने गुस्से और उत्सुकता के मिश्रित लहज़े में पूछा।
"कुछ नहीं बाई। लगता है बापू की बीड़ी के लिये एक घण्टा और नाचना पड़ेगा।"
अब ढोली ही उसका आखरी सहारा था।■■■◆◆◆

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