Saturday, 22 February 2020

सुखिया भाग 3

                                   सुखिया भाग 3

चौराहे के बीचों बीच रखे ठीकरे को सुखिया बड़े गौर से देख रहा था। लड्डू, बिंदिया और सिंदूर के साथ-साथ पाँच, दस और पच्चीस पैसे के सिक्के भी रखे थे उसमें। इसे स्थानीय भाषा मे टूणा (टोना)  या ठीकरी निकलना कहतें है। प्रायः देवी देवताओं को प्रसन्न करने और गृह दोष दूर के लिए कुछ सामग्री भेंट स्वरूप ठीकरे में रख कर उन्हें देवताओं को अर्पित किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जो भी सबसे पहले टोना के ऊपर से गुजरेगा, सारी बलाएं उसी पर होगी। लड्डुओं को देख कर सुखिया का मन ललचाने लगा था। उसने अपने नन्हे साथियों को लड्डू उठा लाने को कहा, लेकिन कोई भी लड्डू उठा लाने की हिम्मत नही कर पाया। सब को डर था कि कहीं कोई बला उन पर न आ जाये। सुखिया अपने लक्ष्य पर नज़र गड़ाये बैठा था, की सेठजी की आवाज़ ने उसका ध्यान भंग कर दिया।
"माफ कीजिए मास्टरजी। बालक है, अज्ञानी है,जो आप पर मिट्टी फेंक दी।" हाथ जोड़े सेठजी मास्टर जी से क्षमा याचना कर रहे थे। सेठजी के बेटे ने राह गुजरते  मास्टर जी पर मिट्टी जो फेंक दी थी।
"कोई बात नहीं सेठजी।" मास्टरजी कपड़ों से धूल झाड़ते हुए बोले।।
"मैं अभी इसके कान खींचता हूँ।" सेठजी गुस्से में अपने बेटे की ओर लपके।
"अरे! कोई बात नहीं सेठजी। बच्चा है। बच्चे तो भगवान का रूप होता है, भला भगवान को क्या सज़ा दी जा सकती है। छोड़ दीजिए।" मास्टरजी ने विनम्रता से कहा।
सुखिया उन दोनों की बातें बड़े ध्यान से सुन रहा था। दो लोग आपस में बात करे और सुखिया चुप रह जाये, भला ये कैसे संभव हो सकता था। सुखिया मास्टरजी के नज़दीक गया और बोल पड़ा। "गुरुजी सिर्फ सेठजी का बेटा ही भगवान का रूप है या.... हम भी है? सुखिया ने अपनी और अपने साथियों की ओर इंगित करते हुए बोला।
"बिल्कुल। सभी बच्चे भगवान का रूप होते हैं, चाहे कोई भी हो। तुम भी हो सुखिया।" मास्टरजी ने सुखिया को संतुष्ट करने की कोशिश की।
"तो फिर सेठजी को समझाइए गुरुजी। ये तो हमें देखते ही भगा देतें है।" सुखिया ने सेठजी की ओर इशारा करते हुए कहा।
"ए सुखिया। फालतू बात मत कर। चल...भाग यहाँ से।" सेठजी झल्लाये।
"ये लो... देख लो गुरुजी।" सुखिया ने सेठजी की ओर पुनः इशारा किया।
मास्टरजी सुखिया की बात पर बिना मुस्कुराये नहीं रह सके।
"तू पाठशाला क्यों नहीं आता सुखिया? क्यों सारा दिन आवारा घूमता रहता है?" मास्टरजी ने सुखिया से पूछा।
"कल से जरूर आऊँगा गुरुजी।" सुखिया ने आज फिर मास्टरजी को गोली दे दी।
मास्टरजी मुस्कुराते हुए पाठशाला की ओर चल पड़े। सुखिया ने भी निर्भीकता से ठीकरे की ओर कदम बढ़ाने शुरू कर दिये।
"कहाँ जा रहा है सुखिया?" सुखिया के साथी ने पूछा।
"लड्डू उठाने, और कहाँ।" सुखिया ने निडरता से जवाब दिया।
"कोई बला आ गई तो?
"अभी सुना नहीं क्या? गुरुजी ने क्या कहा था? हम भगवान है, हम पर बलाओं का क्या असर?" सुखिया ने ठीकरे से लड्डू उठाये ही थे कि बाई उसे ढूंढते हुए वहाँ आ गई। बाई को देख सुखिया बाई के सामने ही आ गया।
"अरे कहाँ था तू? कब से ढूंढ रही हूं तुझे। चल बापू की रोटी देने खेत चलें।"
"मैं तुम्हारे लिए लड्डू लेने गया था बाई।" सुखिया ने लड्डू बाई की ओर बढ़ा दिया।
"कहाँ से लाया है?"
"बाद में बताऊंगा पहले लड्डू खाओ।" सुखिया ने लड्डू बाई को दिया और अपने साथियों में भी बांट दिया।
"लड्डू बहुत अच्छे हैं सुखिया। कहाँ से लाया?" बाई ने सुखिया से फिर पूछ लिया।
"वो ठीकरा देख रही हो बाई?...उसी में से उठाया है।"
सुखिया ने चौराहे में रखे ठीकरे की ओर इशारा कर दिया।
"हाय! कर्मजले! तूने मुझे टूणे वाला लड्डू खिला दिया?" बाई ने लड्डू को ज़मीन पर पटक दिया।
ज्योंही बाई ने गुस्से से लड्डू पटका, सुखिया खतरनाक स्थित को भांप चुका था और भागने के लिए पूरी तैयारी कर चुका था। बाई ने ज़मीन से छड़ी उठाई और सुखिया की ओर लपकी।
"ठहर जा तू। मैं बताती हूँ तुझे। अगर कोई बला आ गई तो?"
"कोई बला नहीं आयेगी बाई। तुम्हारे लिए तो सुखिया ही सबसे बड़ी बला है।"
सुखिया ने अपनी रफ़्तार बढ़ा दी। अब सुखिया को पकड़ना कहाँ मुमकिन था।।■■■■■

सुनील पंवार

No comments:

Post a Comment