Saturday, 22 February 2020

चुनावी मुद्दा

लघुकथा                                                       सुनील पंवार
                                    चुनावी मुद्दा

आज सुबह से ही दलित बस्ती में बड़ी गहमागहमी थी। सैंकड़ो युवा कार्यकर्ताओं ने बस्ती के बीचों बीच भव्य पंडाल लगा दिया था। पेयजल व बैठने की भी उचित व्यवस्था कर दी गई थी, और उसमें एक भव्य मंच की सजाया जा चुका था। बस्ती में युवा कार्यकर्ताओं ने घर घर जाकर सभा में उपस्थिति का निमंत्रण देने का कार्य भी पूर्ण निष्ठा व ईमानदारी से किया था, और करे भी क्यों न! स्थानीय निकायों के चुनाव जो थे!
सौ से डेढ़ सौ महिलाएं ही सभा में शामिल हो पायी थीं, इसके अलावा कुछ वृद्ध व्यक्ति भी मौजूद थे, पर युवाओं की उपस्थित तो ना के बराबर ही थी। सारी तैयारियां हो चुकी थीं। सभा आरम्भ होने से पूर्व ही निर्धारित समय पर दलित बस्ती की संकड़ी गलियों का सीना चीरते हुए चमचमाती गाड़ियों का काफ़िला लक्ष्य की ओर बढ़ता चला आ रहा था।
टूटी फूटी सड़के, बिना प्लस्तर के पक्की ईंटों के मकान, ओवर फ्लो नालियों से बहकर जमा हुए पानी से आती दुर्गंध, मकानों की छतों तक चढ़ी सीलन, अर्धनग्न घूमते बच्चे, दुर्गंध मारती नुक्कड़ पर कच्चे मीट की दुकानें, लोहे की चद्दरों से बने घर के दरवाज़े, सड़क की एक तरफ़ देशी शराब की दुकान, और उसके बाहर लगा बेवड़ों का जमावड़ा! स्थिति को और भी भयावह बना रहा था। काफ़िला अपने गन्तव्य तक पहुंच चुका था। अधेड़ आयु के नेताजी गाड़ी से उतरे और सबका अभिवादन करते हुए मंच की और बढ़ गये।
नेताजी ने अपनी सरसरी नज़र सभा में उपस्थित श्रोताओं पर दौड़ाई। कुपोषण और गरीबी के कारण काले पड़ चुके चेहरे और धँसी हुई आँखों में आज बहुत उम्मीदें थी। नेताजी ने एक बार पुनः सबका अभिवादन किया और अपना वक्तव्य प्रारम्भ किया।
"भाइयो और बहनों... जैसा कि आप सब जानतें है कि इसबार नगर निकाय के चुनाव में मैं मेयर पद का उम्मीदवार हूँ..। और मैं आपकी हर समस्या से अवगत भी हूँ। मैं आपकी सभी समस्याओं का समाधान करने का प्रयत्न करूँगा.. और मैं जानता हूँ कि आपकी बस्ती की सबसे बड़ी समस्या क्या है। नशा! नशा ही आपकी समस्या है। यहाँ मौजूद मेरी माताओं और बहनों ने मुझे इस बारे में पहले ही अवगत करा दिया था की बस्ती के शतप्रतिशत युवा नशे की चपेट में आ चुकें हैं। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि आपकी बस्ती को पूर्णतया नशा मुक्त करके ही दम लूँगा।
मेरा चुनावी मुद्दा ही नशा मुक्त शहर बनाना है। बस आपका सहयोग, आशीर्वाद और प्रेम की आवश्यकता है। धन्यवाद।" नेताजी के भाषण समापन होते ही तालियों की गड़गड़ाहट ने पूरा वातावरण ही हिला डाला। नेताजी अभिवादन करते हुए अपने काफ़िले की और बढ़ गए।
"यहाँ तो चुनाव जीतने के सारे अवसर उपलब्ध हैं,
गरीबी, भुखमरी, अशिक्षा और नशा।" नेताजी अपनी बगल में बैठे अपने सहायक से बतिया रहे थे।
"मैं कुछ समझा नहीं सर।" उसने आश्चर्य व्यक्त किया।
"मेरा कहने का मतलब ये है कि यहाँ चुनाव जीतना बहुत आसान है और यहाँ सभी अवसर मौजूद हैं।
तुम कल से ही महिलाओं और बच्चों के लिए भोजन, वस्त्र और चिकित्सा की व्यवस्था करो, और पुरुषों के लिए शराब की। फिर देखना हम कैसे चुटकियों में चुनाव जीतते हैं।" नेताजी अपने सहायक की और मुस्कुराते हुए बोल रहे थे।
दोनों की नज़रे आपस में मिली और फ़िर दोनों ने भेड़िये जैसी मुस्कान के साथ अपने दांत निपोर दिये।।■■◆
सुनील पंवार की क़लम से...

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