Saturday, 22 February 2020

एक खनकती आवाज़

                                            एक खनकती आवाज़
 
आधी रात के शांत वातावरण में बजी फोन की एक रिंग ने मुझे ऐसे झकझोर दिया जैसे बम फट गया हो। इतनी रात को फोन आना,और मेरे अनवरत जारी अध्ययन में ख़लल डाल देना मुझे परेशान कर गया। रात के बारह बज रहे थे। नोरंग जल्दी ही सो गया था,पर उसके सिरहाने रखा मोबाइल फोन निरन्तर बज रहा था,और बार-बार उसे जगाने का प्रयास कर रहा था, पर वो था कि आज कुम्भकर्ण बना चैन से सो रहा था। फोन के अथक प्रयासों के बाद भी जब वो नही जागा तो मैंने उसका फोन उठाया और रिसीव कर लिया।
"हेलो... हेलो!" सामने से कोई आवाज़ नही आयी। फोन कट गया। इससे पहले कि मैं फोन रखता वो फिर बजने लगा।
"हेलो....हेलो!" फिर से कोई प्रत्युत्तर नही। मैंने कई दफा हेलो-हेलो करने के बाद फोन काट दिया और फिर उसे नोरंग के सिरहाने रख दिया। मैं फोन रखकर ज्योहीं पलटा एक बार फिर फोन चीख पड़ा।
"हेलो!" अबकी बार मेरा लहज़ा सख़्त था।
"हेलो! भैरोंसिंह जी बोल रह्या हो?" एक खनकदार आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।
"नही।" मैंने उसका जवाब दिया।
"तो फेर आप कुण बोल रहया हो?" उसकी आवाज़ बहुत ही मधुर थी।
"मैं सुनील पंवार बोल रहा हूँ राजस्थान से! लगता है आपका रोंग नम्बर लग गया है।"
"रामराम सा! मैं भी राजस्थान स बोल रही हूं, जोधपुर स।" वो थोड़ा रुकी और फिर बोलना शुरू हो गई।
"म्हे भैरोसिंह जी न कॉल लगायौ पर थारौ नम्बर लाग ग्यो। कोई बात कोनी सा। रोंग नम्बर कुछ कोनी हौवे जी, जब जिससे बात होणी होती है तब-तब होकर रैवेह है। और सुणाओ काँय हाल है थारै गाँव का?" वो अपनी मिश्री जैसी मीठी आवाज़ में मुझसे ऐसे बात कर रही थी जैसे मुझे बहुत पहले से जानती हो। उसके लहज़े में जरा सा भी अजनबीपन नहीं था।
"आपकी आवाज नही आ रही थी। मैं हेलो-हेलो बोल रहा था।" मैंने कहा।
"हाँ! जणा ही मैं सोचूं कोई बोल क्यूँ नहीं रहयो! शायद नेटवर्क म ही दिक्कत है, बार-बार फोन कट रहयो जी। थे हनुमानगढ़ स हो और म्हे जोधपुर स! थे हिन्दी मांय क्यूँ बोल रह्या हो ? राजस्थानी हो तो राजस्थानी मांय बात करो।" उसने अपनी बात जारी रखी।
"मुझे मारवाड़ी भाषा नही आती।" मैंने फिर उत्तर दिया।
"कोई बात नहीं सा! आप हिन्दी बोलो। अच्छा बताओ हनुमानगढ़ मांय मौसम रा कायं मिज़ाज़ है? बारिश पानी कियाँ है?"
"बहुत बढ़िया है जी।"
"म्हारे यहाँ भी बहुत बढ़िया है जी सब कुछ। और सुणाओ, घर मे सब ठीक ठाक है? खेतीबाड़ी सब बढ़िया?"
"जी सब बढ़िया है।" आमतौर पर मैं ना तो किसी का फोन रिसीव करता हूँ और ना ही अजनबियों से बात करता हूँ, पर आज मैं उसकी हर बात का जवाब दिए जा रहा था। मैंने एक बार भी उसकी बात काटने की कोशिश नहीं की, उसकी मधुर वाणी मेरे कानों को सुकून पहुंचा रही थी। घर, परिवार, शहर, गाँव और भाषा सब विषयो पर बात होती गई,और समय का तो पता ही नही चला। ऐसा पहली बार था जब किसी अनजान से इतनी बातें की थी मैंने,और वो भी इतनी आत्मीयता से। मुझे उसकी भाषा इतनी मिट्ठी लग रही थी कि मेरे मन में एक-बार भी फोन डिस्कनेक्ट करने ख़्याल तक नहीं आया। यही कमाल है राजस्थानी भाषा का! ये इतनी आदर, सत्कार, प्रेम, संयम और भावों से लबरेज़ मधुर एवं सुरीली भाषा है कि मन करता है इसे सुनते ही जायें।
"थे कायं काम करो हो?" उसने बड़ी विनम्रता से मुझसे सवाल किया।
"जी! मैं पढ़ता हूँ, और अभी भी पढ़ ही रहा था जब आपका फोन आया।" मैंने भी सरलता से जवाब दिया।
"अरे! ईति रात भी पढ़ रह्या हो? म्हारे को माफ़ करना! म्हे थारै को डिस्टर्ब किया। थे पढ़ो और खूब तरक्की करो। चलो अब सो ज्याओ! सुबह पढ़ लीज्यो। थारै स बात करके घणी खुशी हुई। अब फोन रखतें हैं। थारै को घणे मान स्यूँ, घणी-घणी राम राम।" फोन डिस्कनेक्ट हो गया। मैंने घड़ी की और देखा तो दंग रह गया! रात का एक बज रहा था। उस अजनबी महिला से बात करते हुए पूरा एक घण्टा हो चुका था। मैंने अपनी किताब बन्द की और बिस्तर की और लपक पड़ा, पर वो मधुर आवाज कहाँ मेरा पीछा छोड़ने वाली थी। इतने बरस गुज़र जाने के बाद भी मेरे कानों में वो आवाज़ आज भी गूंजती रहती है।
मेरा यकीन कीजिये उसके जैसी आवाज़ उस दिन से पहले और उसके बाद मैंने आज तक नहीं सुनी। उसके बाद कभी उससे बात नहीं हो सकी। कई दफा उस नम्बर पर कॉल करने का प्रयास किया,पर वो नम्बर अस्तित्व में नही था।
समय के साथ-साथ उसका नम्बर भी खो गया। वो कौन थी, क्या करती थी! मुझे ना उसका नाम पता है और ना काम। मैं आज भी किसी अनजान नम्बर से आये फोन को इस उम्मीद के साथ रिसीव कर लेता हूँ कि शायद वही खनकदार कर्णप्रिय आवाज़ एक बार फिर से सुनाई दे दे।।
सुनील पंवार
(ये वर्ष 2007 में एक रात की वास्तविक घटना है।।)
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