Monday, 27 April 2020

क़ानून को रौंदती रुद्र भीड़ का खामियाज़ा भुगत रही देश की अवाम।।

       आलेख                                             सुनील पंवार


ख़ाकसार ने अपना करियर पत्रकारिता से प्रारंभ किया और यही कारण है कि वो राजनैतिक और सामाजिक दोनों विषयों पर अपनी राय बेबाकी से रखता है, वो अलग बात है कि समय-समय पर उसकी आवाज़ को दबाने के भरकस प्रयास किए जाते रहें हैं; पर इतिहास टकराने वालों का लिखा जाता है तलवे चाटने वालों का नही। जीवन के उतारचढ़ाव में रुचियां और व्यवसाय बदलतें रहतें है। ख़ाकसार ने भी भले ही अपना व्यवसाय बदल लिया हो पर उसके अवचेतन में बैठा एक पत्रकार सुषुप्त अवस्था में तो हो सकता है पर मृत कतई नहीं। जब भी पत्रकारिता की बात आती है वो जीवित अवस्था में सक्रिय हो जाता है। लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तम्भ माने गए हैं जिनमें प्रेस एक मजबूत स्तम्भ है, इसे जनता की आवाज़ कहा गया है, लेकिन गतवर्षों से पत्रकारिता एक व्यवसाय मात्र बनकर रह गया है। इस मजबूत स्तम्भ को अब दीमक लग चुकी है और ये पूर्णतः ध्वस्त हो चुका है। पत्रकारिता के गिरते स्तर को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे इसने अवाम का विश्वास खो दिया हैं। सोशल मीडिया पर तो पत्रकार और मीडिया को 'दलाल' और 'भांड' जैसे अशोभनीय शब्दों से सम्बोधित किया जाने लगा है। कोरोना कालखंड में भी मीडिया ने जनता की आवाज़ बनने की बजाय अराजकता फैलाने का काम अधिक किया। इस भयानक महामारी को फैलाने का जिम्मेदार एक विशेष समुदाय को ठहराये जाने का प्रयास किया जाने लगा। जिसकी वजह से न केवल भारत बल्कि पूरी दुनियां में भारत की छवि धूमिल हुई है। तथ्यहीन और झूठी खबरों को न केवल बार-बार प्रसारित किया गया बल्कि उन्हें सच साबित करने का भरकस प्रयास किया गया। इन खबरों की वजह से सरकार और उसकी कार्यप्रणाली पर भी निरंतर प्रश्न उठने लगे।  25 अप्रैल को 'द इकोनॉमिस्ट' ने अपने कवर स्टोरी में एक विशेष समुदाय को बलि का बकरा जाने की इन खबरों के लिए भारत सरकार और सत्ताधारी पार्टी को जिम्मेदार ठहराया जो विश्वगुरु की राह पर अग्रसर भारत के लिए शुभ संकेत नही है।
हाल ही में एक टीवी पत्रकार ने एक राजनैतिक पार्टी की अध्यक्षा के बारे में टिप्पणी करते हुए पालघर (महाराष्ट्र) में भीड़ द्वारा संतो की हत्या को लेकर कुछ सवाल किए गए थे, पत्रकार का व्यवहार किसी भी रूप में पत्रकार जैसा नही था, न भाषा और न ही हावभाव से ही। उससे पहले एक विपक्ष के नेता से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कोरोना से लड़ने के विषय में सवाल-जवाब किये गये थे। पालघर की घटना एक मॉब लिंचिंग थी जो झूठी अफवाह की वजह से हुई थी, जिसे मीडिया के साथ मिलकर, एक पार्टी विशेष के अनुयायियों ने साम्प्रदायिक जामा पहनाने में कोई कसर नही छोड़ी। सौ से ज्यादा आरोपियों की तुरन्त गिरफ्तारी कर ली गई, गिरफ्तार हुए अधिकांश आरोपी भी एक ही पार्टी से संबंध रखते हैं और इनमें से एक भी आरोपी अन्य समुदाय से नही पाया गया।  इस घटना के ठीक दो या तीन दिन बाद उत्तरप्रदेश के एटा में एक परिवार के पाँच सदस्यों की नृशंस हत्या के साथ-साथकर गोरखपुर में भी एक संत की पुलिसकर्मियों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। पालघर की घटना पर शोर मचाने वाले लोग अचानक से चिड़िचुप हो गए।  संतो की हत्या पर बवाल मचाने वाले वही लोग है जिन्होंने अन्य समुदायों की मॉब लिंचिंग के समय खूब आनन्द उठाये थे। तब बस एक ही नीति का अनुसरण किया जा रहा था कि, "तुम्हारे मरे तो हम खुश और हमारे मरे तो आप खुश।" जब देश लोकतंत्र से भीड़तंत्र में तब्दील हो रहा था तब किसी ने आवाज़ नही उठाई, यही कारण है कि हम आज इस स्थिति पर पहुँच चुकें है कि ना हमें पुलिस पर भरोसा है ना न्यायालयों पर। हमें अब सड़क पर ही न्याय चाहिए। हमने जो फसल बोयी थी उसके फल अब तैयार हो चुकें है। रुद्र भीड़ देश के कानून को रौंद रही थी राजस्थान, गुजरात, झारखंड उत्तरप्रदेश के दादरी और बुलन्दशहर की घटनाएं इसका पुख़्ता प्रमाण है कि व्यक्ति कितना संवेदनहीन और क्रूर हो चुका है। आखिर इस गुस्से, इस नफ़रत की वजह क्या है? इसका मूल धार्मिक कट्टरता, और दिन रात चीख-चीख कर परोसी जाने वाली विभेदकारी नीतियों में निहित है जिसका खामियाज़ा हमें लाशों के रूप में उठाना पड़ रहा है। हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए और कानून से कोई भी ऊपर नही होना चाहिए।
अब सवाल ये है कि क्या यही सवाल सत्तापक्ष से नही किये जाने चाहिए? क्या एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए? धार्मिक मसलों के अलावा भी बहुत गम्भीर मसले है जिनसे हमारा ध्यान हटाया जा रहा है या जा चुका है।
 क्या किसी ने पूछा कि नोटबन्दी के दौरान साढ़े तेरह हज़ार करोड़ रुपयों के साथ पकड़े गए महेश शाह का क्या हुआ? पुलवामा की जाँच अब तक क्यों नहीं हो पायी? पुलवामा हमले के बाद एक रिलीफ़ फंड का गठन किया गया था जिसमे देशभर से दान लिया गया था, कितने शहीद परिवारों को वो राशि आवंटित की गई और कितनी? क्या नमस्ते ट्रम्प में एकत्रित जनसमूह की स्वास्थ्य जाँच की गई? गुजरात, मध्यप्रदेश और आगरा में कोरोना ने तबाही मचा रखी है इस पर कोई सवाल क्यों नहीं? रक्षा विभाग से रॉफेल रक्षा सौदे के दस्तावेज कहाँ व कैसे गायब हो गए?  पीएम केयर्स फण्ड की पारदर्शिता के बारे में सवाल क्यों नहीं किया जा रहा? सत्तापक्ष से सवाल करने में इतनी झिझक क्यों?

इसका सीधा सा जवाब है कि सत्तापक्ष से सवाल करने के लिए गुर्दे की जरूरत होती है जो अब मीडिया के पास नही है। बहरहाल वैचारिक और बुद्धिजीवियों ने टीवी डिबेट और समाचार पत्रों का खुले तौर पर बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया है।
अभी भी समय है कि देश के पत्रकार एक जिम्मेदार नागरिक की तरह जनहित के अहम मुद्दों को उठाएं और निष्पक्ष व बेबाक पत्रकारिता का परिचय दें ताकि इस पेशे की गरिमा को बरकरार रखा जा सके।।■■■

सुनील पंवार की क़लम से....✍️✍️

Friday, 24 April 2020

ख़ैर! कोई कमी है तो बताओ।।


       
       
लॉक डाउन ने मानवीय जीवन को नीरस बना दिया है, टीवी ,मोबाइल और न्यूज़पेपर ही वक़्त गुजारने का एक मात्र सहारा रह गया है, लेकिन ऐसा भी नही है कि इस अवधि के दौरान कुछ नया नही हो रहा, बहुत कुछ सीखने को भी मिल रहा है। हाल ही में मैं अपना खाली समय व्यतीत करने के लिए यूट्यूब पर वीडियो देख रहा था कि यकायक मेरे सामने एक वीडियो आ गया जिसे मैंने बड़ी रुचि लेकर देखा। ये वीडियो एक मशहूर कॉमेडी शो का था  ये वीडियो इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि इसमें वर्तमान राजनैतिक स्थिति पर भी तंज कसा गया था।
जब कभी भी अफरा-तफरी का माहौल बनता है, मुझे इस कॉमेडी शो का ये एपिसोड याद आ ही जाता है, जिसमें बॉलीवुड के स्टार रणदीप हुड्डा ने एक चुटकुला ठेठ हरयाणवी भाषा में सुनाया था। हरयाणवी भाषा लिखना तो मेरे लिए आसान नहीं है पर मैं आपको हिंदी में अनुवाद करके जरूर बताऊँगा। मामला कुछ इस तरह था कि एक बार एक बन्दर को शेर के स्थान पर जंगल का राजा नियुक्त किया गया। कुछ ही दिनों बाद उसी जंगल में एक हाथी के बच्चे को शिकारी ने कैद कर लिया। सारे जानवर मिलकर  बन्दर राजा के पास अपनी समस्या लेकर गए और शिकारियों से रक्षा करने की गुहार लगाई। बन्दर राजा ने उनकी समस्या सुनकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाना शुरू कर दिया और मदद का पूरा आश्वासन दिया।
शिकारियों के हमले निरन्तर जारी रहे,और समस्या जस की तस बनी रही।
जब भी जानवर बन्दर राजा के पास अपनी ये समस्या लेकर जाते वो एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाने लगता। जब बार-बार बन्दर राजा के पास जाने के बाद भी इस समस्या का हल नही हुआ तो पेड़ पर उछलकूद करते बन्दर राजा से एक बुज़ुर्ग हाथी ने खीझकर पूछा।
"आपको हमारी समस्या से बार बार अवगत कराने पर भी हमारी समस्या जस की तस है, आपने इसका कोई समाधान अब तक क्यों नहीं किया?"
इस पर बन्दर बोला ने बड़ा ही सरल और तार्किक जवाब दिया। "देखो भाई! तुम्हारा काम हो या ना हो, मेरी भागदौड़ में कोई कमी है तो बताओ?"
देश आज महामारी के भयंकर दौर से गुजर रहा है और पूरा देश इस स्थिति से निपटने में अपना सहयोग दे रहा है। लोग अपना काम काज छोड़कर घरों में क़ैद है। ये सर्वविदित है कि देश में संसाधनों का अभाव है, पुलिस, सफाईकर्मी और डॉक्टरों के पास भी आवश्यक वस्तुओं का नितांत अभाव है, गरीब मजदूर लाचार है और सरकार पूर्ति करने में नाकाम रही है। सरकारें मूल समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय अजीबोगरीब फरमान जारी किए जा रहे हैं। हर कोई अपना श्रेय लेने के चक्कर मे दिख रहें है पर नतीजा अभी तक संतोषजनक नहीं है। समस्याएं जस की तस बनी है।
ख़ैर! नतीज़े कुछ भी हों, क्या फ़र्क पड़ता है! भागदौड़ में कोई कमी है तो बताओ?
सुनील पंवार की क़लम से....✍️✍️

Wednesday, 8 April 2020

नवाब का झूठ, रफ़ुगर की सिरदर्दी


मुझे ठीक से तो याद नहीं है, पर उस समय शायद मैं दूसरी या तीसरी कक्षा में पढ़ता था। उन दिनों टीवी देखने का अपना ही एक मज़ा था। टीवी के नाम पर घर वाले मुश्किल से मुश्किल काम भी बोल देते तो उसे भी हम बड़ी आसानी से कर दिया करते थे।
उन दिनों रामायण, नुक्क्ड़, जंगल बुक और विक्रम बैताल जैसे पारिवारिक धारावाहिक दूरदर्शन पर प्रसारित हुआ करते थे। सबके साथ टीवी देखने का आनन्द ही कुछ और था। देखते ही देखते घर मिनी सिनेमाघर में तब्दील हो जाया करता था और वो भी हाउसफुल।
ख़ैर! मैं इन बातों का ज़िक्र आज क्यों कर रहा हूँ ये एक महत्वपूर्ण सवाल है। आइये थोड़ा बीते समय की सैर कर आतें हैं।
उन्ही दिनों दोपहर में एक धारावाहिक प्रसारित होता था जिसका नाम और कलाकार को अब मुझे याद नहीं है पर कहानी कुछ प्रकार थी, कि एक गप्पी नवाब अक्सर महफिलों में अपने बहादुरी के झूठे किस्से,जो सुनने में असंभव लगते थे, सुनाकर शेख़ी बघारने का आदि था, और उसके लिए उसने वाकायदा अपने किस्सों को रफ़ू करने के लिए रफ़ुगर नियुक्त कर रखा था। रफ़ुगर का काम था कि वो नवाब के झूठे किस्सों को सच का जामा पहनाऐ, ताकि सुनने वालों को वो वास्तविक और सच्चे लगे।
नवाब ने एक दिन शेख़ी बघारते हुए कहा कि एक दिन उसने शेर के सिर पर गोली चलायी लेकिन गोली हाथ से निकली। सुनने वालों को भले ही आश्चर्य हुआ हो पर नवाब के चेहरे पर इस झूठ की शिकन तक नही थी। उसे पता था कि रफ़ुगर सब सम्भाल लेगा।
रफ़ुगर ने बात को तुरंत सम्भाल लिया और बोला कि जब नवाब ने शेर पर गोली चलायी तब शेर सिर खुजला रहा था, इसलिए गोली हाथ में लग गई। रफ़ुगर ने इस झूठे किस्से को चुटकियों में सच साबित कर दिया। श्रोताओं ने तालियों से नवाब का मान बढ़ाया।
आज इतने सालों बाद मुझे इस धारावाहिक का स्मरण हो आना स्वभाविक है। आज भी स्थिति वही है नवाब अपने किस्से सुनाते हैं और रफ़ुगर तरह-तरह के लॉजिक लगाकर, अधिकाधिक जानकारी जुटाकर रफ़ू करने में जुट जातें है और झूठे किस्सों को यथार्थ में बदल देते हैं। श्रोता सत्य होने के भ्रम में तालियों से नवाब का मान बढ़ातें है।
नवाब कर्तव्यपरायण है, उसका कर्तव्य है डींगें हाँकना, उसे यथार्थरूप देना रफ़ुगर की सिरदर्दी है।।
सुनील पंवार की क़लम से.....

Sunday, 5 April 2020

हाशिए पर न्यायपालिका


"अब देश में कानून जैसी कोई चीज नहीं रही, न्यायालय बन्द कर देने चाहिये। पैसे के दम पर हमारे आदेशों को रोका जा रहा है।"
                                      .........जस्टिस अरुण मिश्रा
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा दिया गया वक्तव्य न केवल व्यवस्था बल्कि सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठाता है। ये बयान भले ही किसी भी संदर्भ में दिया गया हो परन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ये पूर्ण प्रासंगिक है। ये प्रथम बार नहीं है जब न्यायालय द्वारा इस प्रकार की टिप्पणी की गई हो। ज्ञातव्य है कि गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायधीशों ने भी सामूहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से अपनी बात रखने का प्रयास किया था। इसी क्रम में जस्टिस चंद्रचूड़ ने भी कहा कि "असहमत होना देशद्रोह नहीं है।" हम किसी विचार पर सहमत या असहमत हो सकतें है परन्तु हमें विचारों का सम्मान करना चाहिए। विगत कुछ वर्षों से असहमति की परिभाषा ही बदल चुकी है और उसे राष्ट्रद्रोह के नाम से नवाज़ा जा चुका है। जो आपकी बात से सहमत नहीं है वो देशद्रोही है।
अखण्ड भारत की परिकल्पना करने वालों ने ही भारत को खण्ड-खण्ड कर दिया है। हिन्दू बनाम मुसलमान, दलित बनाम सवर्ण, गरीब बनाम अमीर और राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही! और ऊपर से देश के जिम्मेदार लोगों के भड़काऊ भाषणों ने तो आग में घी का काम किया ही है।
न्याय के संरक्षकों द्वारा की गई ये टिप्पणियां इस ओर इशारा इंगित करती है कि कुछ तो है जो सही नहीं है।
देश आज मुश्किल दौर से गुज़र रहा है जिससे कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहा है। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी में इज़ाफ़ा हुआ है तो वहीं हत्या, बलात्कार, शोषण, जातीय हिंसा जैसे अपराधों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। आज देश के हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं। लोकतंत्र अब भीड़तंत्र में तब्दील होता जा रहा है। लोगों को न्यायालय और कानून में कोई विश्वास नहीं रह गया है वे अब सड़क पर ही न्याय चाहतें हैं। अब कानून किताबों में बंद शब्द मात्र रह गए हैं।
देश की शिक्षण संस्थानों पर बढ़ते हमलों की घटनाएं, शाहीन बाग और जामियाँ में गोलीबारी, तबरेज़ और पहलू ख़ाँ की भीड़ द्वारा हत्या, दुष्कर्म पीड़िता को सरेआम जलाकर हत्या, गार्गी महाविद्यालय में हुई यौन हिंसा, जेएनयू के हॉस्टल में हिंसा जैसी अनगिनत घटनाओं ने पुलिस और सरकार की कमजोर कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है। लगभग इन सभी घटनाओं में पुलिस ने केवल मूकदर्शक की भूमिका निभाई है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। एक बड़े प्रदेश के स्कूली कार्यक्रम में एक नाटक में भूमिका निभाने वाले चौथी कक्षा के छात्रों को केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन्होंने सरकार द्वारा लागू कानून को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया जिसे राष्ट्र के खिलाफ समझा गया और बच्चों के साथ अपराधियों की भाँति बर्ताव किया गया। ऐसे माहौल में न्यायालय का फिक्रमंद होना वाज़िब है।
मौजूदा समय में लगता है जैसे व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता। रोजगार, भुखमरी, भ्रष्टाचार,शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है। टीवी पर चल रही अनवरत निरर्थक बहस ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। सरकार की मौजूदा नीतियों के खिलाफ दुनियां के प्रमुख समाचार पत्रों ने भारत को लेकर आलोचनात्मक संपादकीय लेख प्रकाशित कियें है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठनों ने भी भारत सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की है। ख़बर तो यहाँ तक आयी है कि कई देशों ने अपने नागरिकों को भारत आने को लेकर यात्रा चेतावनियां जारी कर दी है। माहिलाओं की असुरक्षा के मामले में तो भारत कई पायदान लाँघ चुका है जिससे देश की गरिमा का ह्रास हुआ है और हम इस भ्रम में है कि देश का मान बढ़ रहा है, परन्तु इन सभी मामलों में भारतीय मीडिया सरकार के प्रति पूर्णरूप से नतमस्तक है।
बहरहाल निष्कर्ष ये है कि सर्वशक्तिमान, पूर्णस्वतंत्र न्यायपालिका भी हाशिये पर धकेल दी गई है और न्याय सदन से आने वाले बयानों ने न्यायपालिका की बेबसी को उजागर कर दिया है।
आम आदमी सदियों से मौन है और झूठ का प्रपंच पूरे शोर से रचा जा रहा है।
बहरहाल छुपन-छुपाई का खेल जारी है। मीडिया असल मुद्दों को छुपा रही है, सरकार आँकड़े छुपा रही है।
कहीं दीवार चुन कर गरीबी छिपाई जा रही है तो कहीं नदियों की दुर्गंध छिपाई जा रही है, पर सत्य को कब तक छुपाया जा सकेगा! गड़े मुर्दे जब कभी भी उखड़ेंगे, सड़ी-गली व्यवस्थाओं की दुर्गंध दूर तलक़ पसर जायेगी।।
सुनील पंवार (स्वतन्त्र युवा लेखक)
रावतसर (राजस्थान)

Saturday, 4 April 2020

अघोषित विश्वयुद्ध या सामुहिक आत्महत्या।।

                                       अघोषित विश्वयुद्ध या सामुहिक आत्महत्या।।

आज पूरी दुनिया एक अघोषित विश्वयुद्ध को झेल रही है, जिसमें न कोई हथियार है और ना ही कोई सैनिक! ज्ञातव्य है कि एक अनजान वायरस 'कोरोना वायरस' ने पूरी दुनियां को घुटनों के बल कर दिया है,जिसका अब तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। कोई भी देश इसके कहर से अछूता नहीं रह गया है। चीन के वुहान शहर से शुरू हुई इस महामारी ने सम्पूर्ण विश्व में तीव्र गति से अपने पाँव पसार लिए है।
ये मनुष्य, प्रकृति या विज्ञान, किसी की भी गलती से हुआ हो लेकिन इसने सर्वाधिक मनुष्य को ही अपना ग्रास बनाया है।
इस विश्व स्तरीय आपदा ने न केवल अर्थव्यवस्थाओं बल्कि मजबूत सरकारों की भी चूलें हिलाकर रख दी है।
भारत मे भी इसका व्यापक असर पड़ा है, अब तक करीब आठ सौ से ज्यादा संक्रमित मामले सामने आ चुकें है,जिसके चलते सरकार को इक्कीस दिन के सम्पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लेना पड़ा। सोशल डिस्टेंस एक वैकल्पिक उपचार है,पर भारत का आम नागरिक सोशल डिस्टेंस को नहीं जानता।
अन्य देशों की अपेक्षा भारत की स्थिति भिन्न है। यहाँ की लगभग अस्सी करोड़ आबादी का जीवन दैनिक मजदूरी व दिहाड़ी पर निर्भर करता है। सम्पूर्ण लॉकडाउन का पालन करना इनके लिए सामूहिक आत्महत्या करने जैसा है। भारत इस भयंकर स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं है और ना ही इससे निपटने की कोई पूर्व तैयारी ही है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता से एक दिन के 'जनता कर्फ़्यू' व थाली और ताली बजाने की अपील की, तथा उसके लिए उन्होंने चार दिन का पर्याप्त समय भी दिया। पर पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लेते समय ना तो कोई समय दिया गया तथा ना ही प्रवासी मजदूरों व कामगारों के रहने,खाने से संबंधित कोई चर्चा ही हुई। नतीज़तन
इक्कीस दिन की लम्बी अवधि से मजदूर वर्ग व असंगठित कामगारों में अफरा तफरी का माहौल बन गया और देखते ही देखते लाखों की तादाद में लोगों का हुज़ूम सड़कों पर उमड़ पड़ा।
पुलिस, प्रशासन तथा सरकार ने बार बार कहा कि जनता लॉकडाउन का पालन नहीं कर रही है तथा वे इस बीमारी को गंभीरता से नही ले रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सरकार ने स्वंय इसे कितनी गम्भीरता से लिया है। नवम्बर 2019 में इस महामारी के लक्षण दिखने प्रारम्भ हो गए थे और दिसम्बर 2019 में इसका पहला मामला सामने आ चुका था। फरवरी माह तक आते-आते इसने दुनियां के अन्य हिस्सों में भी अपने पाँव जमाने शुरू कर दिए। 12 फरवरी 2020 को राहुल गांधी द्वारा किए गए एक ट्वीट ने सरकार को पहले ही चेता दिया था कि ये महामारी भारत के लिए न केवल एक चुनौती होगी बल्कि विनाशकारी साबित होगी। सरकार को पूर्व तैयारी की आवश्यकता है और इसे गम्भीरता से लेना चाहिए। पर इस बात पर कोई गौर नहीं फ़रमाया गया। इसके बाद भी विदेशों से आने वाले प्रवासियों की जाँच प्रकिया में घोर लापरवाही हुई है इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल अभी भी समय है कि सभी सरकारों को केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर, कार्य करने व मानव जीवन को बचाने और इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है।■■■