Saturday, 22 February 2020

चौकीदार


                     लघुकथा।                 चौकीदार।              सुनील पंवार


रात की ड्यूटी पूरी करने के बाद जब वो घर पहुंचा, तो नौ साल की बिटिया ने एक खूबसूरत मुस्कान के साथ उसका स्वागत किया। वो मुस्कुरा दिया और रानो की गाल पर बड़े प्यार से अपनी उंगलियों से चुटकी भी काट ली। श्रीमती जी उनके लिये चाय बनाने रसोईघर की ओर कूच कर चुकीं थी।
"कहाँ थे पूरी रात..पापा?"
"मैं अपने काम पर था रानो!" उसने रानो को उठाया और गौद में बैठा लिया।
"पर...! आप तो दिन में जाते हो ना कामपर?" उसने फिर सवाल का तीर छोड़ दिया।
"हाँ..! पर.. अब मैं रात को भी काम पर ही रहूँगा लाडो!"
"रात को क्यूँ?"
"अरे लाडो! आजकल बच्चों को उठाने वाला गिरोह शहर में काफ़ी सक्रिय हो गया है, तो...! मालकिन ने अपने बच्चों की सुरक्षा के लिए मुझे रात को भी नोकरी पर रख लिया, इसलिए अब रात को भी जाना पड़ेगा।" वो रानो के सिर को बड़े प्यार से सहला रहा था।
"आप उनके बच्चों की रक्षा क्यों करते हो पापा? क्या वो खुद नहीं कर सकते?"
"पैसों के लिए करता हूँ... रानो! वो बड़े लोग है! पैसे देकर चौकीदार रख लेतें हैं, हम जैसे चौकीदार है ना! उनकी सुरक्षा के लिए।" वो उसके हर मासूम सवाल का जवाब बड़ी गम्भीरता से दे रहा था।
"वो तो चौकीदार रख लेंगे पापा पर हमारा क्या? क्या वो बच्चे चुराने वाले उन्हीं के बच्चे चुरायेंगे, हमें नही? आप उनकी रक्षा करते रहोगे तो हमें किसके सहारे  छोड़ोगे पापा? कोई मुझे उठा ले गया तो...? मेरी रक्षा कौन करेगा? मैं भी तो बच्ची हूँ! मेरे लिए चौकीदार रखोगे या भगवान भरोसे ही रहना पड़ेगा?" उसके सवाल ने चौकीदार को निःशब्द कर दिया, उसके पास रानो के सवाल का कोई जवाब नही था। उसने रानो को कसकर अपने सीने से चिपका लिया। अब रानो अपने आप को पूरी तरह से महफ़ूज महसूस कर रही थी।।
सुनील पंवार की क़लम से....

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