Saturday, 22 February 2020

भीगी मुस्कान

                                                       भीगी मुस्कान


वो उससे पिछले आठ महीने से बात कर रहा था। फेसबुक, व्हाट्सअप, इंस्टाग्राम सब पर उसे फॉलो कर रहा था। वो अपने दिल की बात कई बार बोल चुका था, पर वो कहाँ सुनने वाली थी। वाणी से 16 साल छोटा था वो! यही कारण था कि उसे हर बार झिड़कियां ही मिली थी।
वो भी इतना ढीठ था, कहाँ हार मानने वाला था। हर दिन, हर पल नए-नए अंदाज से अपनी बात कहने का कोई मौका नहीं चूकता।
पति की मौत के बाद वाणी इंदौर से दिल्ली शिफ़्ट हो गई और स्पॉकन इंग्लिश का इंस्टिट्यूट शुरू कर लिया।
सुनील भी उससे एक स्टूडेंट के रूप में ही मिला था जो  धीरे-धीरे उसके बहुत करीब हो चुका था। 
वो जब भी फ़र्राटेदार अंग्रेज़ी बोलती तो वो बस उसे एकटक निहारते ही रहता।  वो साँवला सा लड़का जो दलित परिवार में जन्मा था और जिसका अँग्रेजी से दूर-दूर तक कोई नाता नहीं था, वाणी को दिल से दिल दे चुका था।
वाणी ने उसे बहुत समझाया पर वो मानने को तैयार ही नही था। वो तो सिर्फ उम्र को एक संख्या मानता था और उसके आसपास रहने का बहाना ढूंढता रहता। 
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कुछ दिनों से उसका बर्ताव वाणी को खल रहा था। वो कुछ उखड़ा-उखड़ा रहने लगा! ना उसका पढ़ाई में ध्यान था और ना ही ख़ुद पर। शायद वाणी का किसी से बात करना भी उसे गवारा नहीं था। वाणी ने उसे समझाने का हर सम्भव प्रयत्न किया पर उसने वाणी की एक भी नहीं सुनी।
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उस शाम घने कोहरे ने वक़्त रहते ही अपने पाँव पसारना शुरू कर दिया था। तेज़ हवाओं ने ठिठुरन बढ़ा दी थी।
वो बिल्कुल शांत! चुपचाप उसके सामने पलकें झुकाए बैठा था। पूरे कमरे में मौत जैसा सन्नाटा पसरा था। वाणी उसे अपलक देख रही थी,पर दोनों में से कोई भी बात की शुरुआत नही करना चाहता था। आखिरकार वाणी ने ही चुप्पी तोड़ी।
"क्या चाहते हो तुम? कितनी बार समझाया है तुम्हे! तुम जो सोच रहे हो वैसा नहीं हो सकता! सोलह साल बड़ी हूँ तुमसे! तुम मेरी बेटी के हमउम्र हो! क्यों सताते हो मुझे?... क्यों?" वो अपना चेहरा दोनों हथेलियों से छिपाकर फ़फ़क पड़ी।
"जानते हो, क्यों दूर रहती हूँ तुमसे? क्योंकि मैं भी तुम्हे चाहती हूँ, पर तुम्हारी पूरी लाइफ है तुम्हारे सामने! मैं तुम्हे बर्बाद होता नहीं देख सकती। पन्द्रह साल से मैंने अपने आप को जहाँ रोक रखा था, तुम वहीं ले आये मुझे! क्या सुनना चाहते हो तुम मुझेसे..? यही के मैं तुमसे प्यार करती हूँ या नहीं?...तो सुनो! आई लव यू! हाँ मैं तुम्हे चाहती हूँ, तुम जो भी हो जैसे भी हो! हाँ, मुझे भी प्यार है तुमसे। अब दफ़ा हो जाओ मेरे घर से और मेरी ज़िन्दगी से! फिर कभी लौटकर मत आना। सुना तुमने?

चले जाओ...चले जाओ! प्लीज़!" उसकी आँखों से बहते आँसू उसकी गाल से ढलते हुए गर्दन तक आते-आते विलुप्त होते जा रहे थे। वो फ़फ़क-फ़फ़क कर रो रही थी।
वो अपनी जगह से उठा और वाणी के पास सोफे पर बैठ गया। वाणी ने धीरे से उसके काँधे पर सिर रख दिया और फिर सुबकने लगी।
ऐसा पहली बार था जब वाणी रो रही थी और वो भीगी पलकों से मन्द-मन्द मुस्कुरा रहा था।।■■■

सुनील पंवार की क़लम से...

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