व्यंग्य
मिट्टी डाल भी दो यार...
कल शाम एक लॉन्ग ड्राइव से लौटते समय मैं एक चाय की दुकान पर रुक गया। दुकान में ज्यादा भीड़ भाड़ नही थी। कुछ दूरी पर सामने की बैंच पर बैठे दो युवा नेता अपनी बहस में मसरूफ़ थे। मैं उनको बिल्कुल साफ सुन पा रहा था, मुझे उन दोनों की बहस इतनी मज़ेदार लग रही थी कि अगर समय पर चाय मिल गई होती तो अनंत आनंद की अनुभूति हो गई होती।
"क्या... बे हरिया! तू ये फेसबुक पर क्या अंटशंट लिखता रहता है?... क्या हमेशा दलित सम्मान..दलित, सम्मान का रट्टा लगाये रखता है? कितनी बार समझाया है तुझे... समझ नहीं आता क्या?" पंडित जी अपने भगवे पटके को गले में दुरुस्त करते हुए अनवरत प्रश्नों के बाण छोड़े ही जा रहे थे।
"अरे!..तुम लोग हम पर पाँच हजार साल से अत्याचार करते आ रहे हो.. हमसे भेदभाव करते हो..छुआछूत करते हो.. नीच समझते हो! हमें सम्मान से जीने का अधिकार ना है क्या?..अब भी बोलें नहीं क्या..?" हरिया ने भी बड़ी शान से अपने गले में पिरोये नीले पटके को दुसरुस्त किया। दोनों के हावभाव और तेवर से साफ झलक रहा था कि दोनों वर्गसंघर्ष के महानायक बनने की होड़ में अग्रिम पंक्ति में खड़े थे।
"देख हरिया!...क्या हमने तुमसे भेदभाव किया? तुम्हारे साथ खाना नहीं खाया, चाय नहीं पी या तुम्हे अपने घर में नहीं घुसने दिया..? तुम्हे अपने भाई की तरह मानते हैं.. और तुम हो के..! माना के हमारे पूर्वजों ने गलत व्यवहार किया है तुम्हारे साथ पर...इसमें हमारा क्या दोष? पुरानी बातों को कब तक लिये बैठे रहोगे..? अब मिट्टी भी डालो! गड़े मुर्दे उखाड़कर अपने सम्बन्ध क्यों बिगाड़ रहे हो?" पंडित जी लगभग भावुक होने की कगार पर ही थे कि तभी छोटू चाय ले आया। टेबल पर रखी चाय ने दोनों का ध्यान भंग करने में बड़ी सफलता प्राप्त कर ली थी। दोनों ने चाय से भरे कप उठाये और होठों से चिपका लिये।
"हम्म...!" हरिया ने चाय की घूँट भरी और पंडित जी से मुख़ातिब हुआ। " यार बात तो तुम ठीक कहते हो, हम बचपन के साथी है..पुरानी बातों को लेकर हम क्यों अपने सम्बन्ध खराब करें! तुम सही कहते हो पंडित.. मिट्टी डालो यार पुरानी बात पर। चल चाय पी।" अब दोनों के चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी। मेरे मन को भी बड़ा सकून मिला, मैं मन ही मन इस बात से खुश था कि देर सवेर दोनों युवाओं ने बरसों से चले आ रहे इस वर्गसंघर्ष को विराम देने की राह निकाल ही ली। उन दोनों के साथ मैं भी चाय का मज़ा ले रहा था कि हरिया के फोन की रिंग ने रंग में भंग डाल दिया। "हेल्लो...! हाँ निसार भाई बोलो...! अभी पंडित जी के साथ चाय पी रहा हूँ...तुम काम बोलो...! दावत..? ईद की दावत..कब..? आज रात को...? हाँ..ठीक है भाई.. पहुँच जाऊँगा! ओके।"
फोन डिस्कनेक्ट करने के बाद हरिया ने ज्योंही पंडित जी की और देखा..पंडित जी की त्यौरियाँ चढ़ी हुई थी। वो कुछ समझ पाता उससे पहले ही पंडित बोल पड़ा।
"क्या रे हरिया...! तू इन मुगलों की औलादों के साथ क्यों रहता है बे? इनके घर की दावत भी खाता है तू..! क्या तुझे नही पता इन्होंने हमारे साथ क्या किया था? हमारी बहन बेटियों की आबरू लूट ली, हमें ग़ुलाम बनाके रखा, हमारे मन्दिर तोड़ डाले,.. हमारा धर्म बदलवा दिया! और तू है कि इन हरामखोरों से दोस्ती रखता है! मेरा बस चले तो मैं इन सब हरामियों को पाकिस्तान भेज दूँ! मेरा तो एक ही मक़सद है इन मुगलों की औलादों से अपने पर हुए अत्याचारों का बदला लेना! अरे!...तू कुछ बोलता क्यों नहीं...? मुझे इस तरह क्यों घूर रहा है? ऐसे क्यों देख रहा है मुझे...?" पंडित थमा तो लगा जैसे मूसलाधार बारिश थम गई हो।
"मैं ये देख रहा हूँ पंडित...! बड़ी कमाल के आदमी हो यार तुम तो...! हमसे तो बीती बातों पर मिट्टी डलवा दी..... और ख़ुद.....?" इससे पहले कि
हरिया अपनी बात पूरी कर पाता मैं ज़ोर का ठहाका लगाकर हंस पड़ा।।
सुनील पंवार की क़लम से...
मिट्टी डाल भी दो यार...
कल शाम एक लॉन्ग ड्राइव से लौटते समय मैं एक चाय की दुकान पर रुक गया। दुकान में ज्यादा भीड़ भाड़ नही थी। कुछ दूरी पर सामने की बैंच पर बैठे दो युवा नेता अपनी बहस में मसरूफ़ थे। मैं उनको बिल्कुल साफ सुन पा रहा था, मुझे उन दोनों की बहस इतनी मज़ेदार लग रही थी कि अगर समय पर चाय मिल गई होती तो अनंत आनंद की अनुभूति हो गई होती।
"क्या... बे हरिया! तू ये फेसबुक पर क्या अंटशंट लिखता रहता है?... क्या हमेशा दलित सम्मान..दलित, सम्मान का रट्टा लगाये रखता है? कितनी बार समझाया है तुझे... समझ नहीं आता क्या?" पंडित जी अपने भगवे पटके को गले में दुरुस्त करते हुए अनवरत प्रश्नों के बाण छोड़े ही जा रहे थे।
"अरे!..तुम लोग हम पर पाँच हजार साल से अत्याचार करते आ रहे हो.. हमसे भेदभाव करते हो..छुआछूत करते हो.. नीच समझते हो! हमें सम्मान से जीने का अधिकार ना है क्या?..अब भी बोलें नहीं क्या..?" हरिया ने भी बड़ी शान से अपने गले में पिरोये नीले पटके को दुसरुस्त किया। दोनों के हावभाव और तेवर से साफ झलक रहा था कि दोनों वर्गसंघर्ष के महानायक बनने की होड़ में अग्रिम पंक्ति में खड़े थे।
"देख हरिया!...क्या हमने तुमसे भेदभाव किया? तुम्हारे साथ खाना नहीं खाया, चाय नहीं पी या तुम्हे अपने घर में नहीं घुसने दिया..? तुम्हे अपने भाई की तरह मानते हैं.. और तुम हो के..! माना के हमारे पूर्वजों ने गलत व्यवहार किया है तुम्हारे साथ पर...इसमें हमारा क्या दोष? पुरानी बातों को कब तक लिये बैठे रहोगे..? अब मिट्टी भी डालो! गड़े मुर्दे उखाड़कर अपने सम्बन्ध क्यों बिगाड़ रहे हो?" पंडित जी लगभग भावुक होने की कगार पर ही थे कि तभी छोटू चाय ले आया। टेबल पर रखी चाय ने दोनों का ध्यान भंग करने में बड़ी सफलता प्राप्त कर ली थी। दोनों ने चाय से भरे कप उठाये और होठों से चिपका लिये।
"हम्म...!" हरिया ने चाय की घूँट भरी और पंडित जी से मुख़ातिब हुआ। " यार बात तो तुम ठीक कहते हो, हम बचपन के साथी है..पुरानी बातों को लेकर हम क्यों अपने सम्बन्ध खराब करें! तुम सही कहते हो पंडित.. मिट्टी डालो यार पुरानी बात पर। चल चाय पी।" अब दोनों के चेहरे पर एक मुस्कान तैर रही थी। मेरे मन को भी बड़ा सकून मिला, मैं मन ही मन इस बात से खुश था कि देर सवेर दोनों युवाओं ने बरसों से चले आ रहे इस वर्गसंघर्ष को विराम देने की राह निकाल ही ली। उन दोनों के साथ मैं भी चाय का मज़ा ले रहा था कि हरिया के फोन की रिंग ने रंग में भंग डाल दिया। "हेल्लो...! हाँ निसार भाई बोलो...! अभी पंडित जी के साथ चाय पी रहा हूँ...तुम काम बोलो...! दावत..? ईद की दावत..कब..? आज रात को...? हाँ..ठीक है भाई.. पहुँच जाऊँगा! ओके।"
फोन डिस्कनेक्ट करने के बाद हरिया ने ज्योंही पंडित जी की और देखा..पंडित जी की त्यौरियाँ चढ़ी हुई थी। वो कुछ समझ पाता उससे पहले ही पंडित बोल पड़ा।
"क्या रे हरिया...! तू इन मुगलों की औलादों के साथ क्यों रहता है बे? इनके घर की दावत भी खाता है तू..! क्या तुझे नही पता इन्होंने हमारे साथ क्या किया था? हमारी बहन बेटियों की आबरू लूट ली, हमें ग़ुलाम बनाके रखा, हमारे मन्दिर तोड़ डाले,.. हमारा धर्म बदलवा दिया! और तू है कि इन हरामखोरों से दोस्ती रखता है! मेरा बस चले तो मैं इन सब हरामियों को पाकिस्तान भेज दूँ! मेरा तो एक ही मक़सद है इन मुगलों की औलादों से अपने पर हुए अत्याचारों का बदला लेना! अरे!...तू कुछ बोलता क्यों नहीं...? मुझे इस तरह क्यों घूर रहा है? ऐसे क्यों देख रहा है मुझे...?" पंडित थमा तो लगा जैसे मूसलाधार बारिश थम गई हो।
"मैं ये देख रहा हूँ पंडित...! बड़ी कमाल के आदमी हो यार तुम तो...! हमसे तो बीती बातों पर मिट्टी डलवा दी..... और ख़ुद.....?" इससे पहले कि
हरिया अपनी बात पूरी कर पाता मैं ज़ोर का ठहाका लगाकर हंस पड़ा।।
सुनील पंवार की क़लम से...
यही तो होता आया है ओर होता रहेगा,
ReplyDeleteजब तक हम अपने हक के लिए नहीं लड़ेंगे।
वाह..! ये ही तो सब समझ का फेर है खुद गलती करे
ReplyDeleteतो उम्मीद रखते है उसे सब भूल जायें, मिट्टी डाले परन्तु
खुद दूसरे की गलती ज़िंदगी भर पकड़ कर बैठे रहते हैं!