पिछले दो तीन दिन से देख रहा हूँ कि सोशल मीडिया पर दो अलग-अलग विचारधाराओं के लोग, दो अलग-अलग व्यक्तियों के निज़ी जीवन पर प्रहार करते हुए एक ही विषय से सम्बंधित पोस्ट कर रहें हैं। उन बातों में कितनी सच्चाई है ये ना तो पोस्ट करने वाले जानते हैं और ना ही पढ़ने वाले जानना चाहते हैं। पहली पोस्ट जो मैंने देखी वो भाजपा प्रवक्ता श्रीमान संबित पात्रा की पत्नी को लेकर किया गया था जिसमे मज़ाक बनाते हुए लिखा गया कि, " ब्रिटेन में रह रही संबित पात्रा की पत्नी गर्भवती है, और मज़े की बात ये है कि उनसे मिले पात्रा को डेढ़ साल हो चुका है।" दूसरी पोस्ट शाहीनबाग में एक प्रमुख प्रोटेस्टर रहीं सुफ़रा नामक युवती को लेकर किया गया था जो फ़िलहाल जैल में है। इसमें ये दावा किया गया है कि सुफ़रा गर्भवती है और अविवाहित है। इन दोनों ही मामलों में केवल महिलाओं के चरित्र पर ही उँगली उठाई गई है और दोनों ही बातों को विरोधी विचारधारा वाले लोग चटकारे ले-लेकर शेयर कर रहें हैं,पर मुझे ये बात इसलिए अखरती है कि क्या राजनीतिक मतभेदों पर विजय पाने या किसी प्रकार की राजनैतिक रोटियाँ सेंकने के लिए किसी के निजी जीवन में अनावश्यक हस्तक्षेप आवश्यक है? क्या सिर्फ यही मुद्दे शेष रहें हैं हमारे पास?
सांसारिक मर्यादाओं से बाहर किये गए कृत्य समाज कभी स्वीकार नहीं करता और करे भी क्यों? प्रत्येक व्यक्ति का ये दायित्व है कि वो अपने संस्कारो का सरंक्षण करे और अपनी संस्कृति को अक्षुण्ण बनाये रखे। लेकिन सवाल यह है कि दूसरों से संस्कारों के पालन की उम्मीद करने वाले लोग खुद कितने संस्कारी है? दुनियाँ में ऐसे अनगिनत मामले हर रोज आतें है पर हम इनका ज़िक्र तक नही करते। क्यों? क्या हम इनका ज़िक्र महज़ इसलिए कर रहें है कि ये दोनों ही लोग राजनीती से सम्बन्ध रखते हैं? भारतीय अभिनेत्री नीना गुप्ता और मशहूर टीवी होस्ट ऑपेरा विन्फ्रे जैसी सेलिब्रिटी भी अविवाहित माँ बन चुकी हैं। ये हमारी पुरुषप्रधान मानसिकता है कि हम अपने सारे कुकर्मों का दोष केवल नारी पर ही मढ़ देतें है। जो भी लाँछल लगे महिलाओं के सिर लगे। क्या हमने उन पुरुषों का ज़िक्र एक बार भी किया जो इस कुकृत्य में भागीदार रहे? हम स्वछंद है, नियम बनाते हैं, शासन करतें है और अपने दोषों को कमज़ोर पर थोंप देते हैं। यदि एक व्यक्ति का ये कर्तव्य है कि वो अपनी सामाजिक मर्यादा बनाये रखे,तो दूसरे का भी ये दायित्व है कि वो उसकी निजता में बाधा उत्पन्न ना करे।
बहस के मुद्दे वैचारिक और तार्किक होने चाहिए ना कि निजी मसले।
बहरहाल मैं सिर्फ इतना कहना चाहूँगा कि गलत कोई भी हो सकता है, मैं भी और आप भी! ये प्रकृति का सामान्य नियम है कि मनुष्य गलतियों का पुतला है और इंसान का स्वभाव है कि वो अपनी गलतियों से कुछ सीखे और उनका सुधार करे।■■■■■
सुनील पंवार की क़लम से...✍️✍️✍️
जी सर .... ये ही होता आया है पुरूष प्रधान देश में अपनी गलती को हमेशा नारी को चरित्रहीन कह कर छिपाया जाता है...
ReplyDeleteसही फ़रमाया🙏🙏💞
Deleteबात सिर्फ देश तक की नहीं है, पूरी दुनिया में यही हाल है.
Deleteबिलकुल सही कहा सर आपने, हमारे भारत में एक तो नारी को देवी माना जाता ओर ओर दूसरा उसी देवी को बदनाम भी हम लोग ही करते है।
ReplyDeleteजब तक लोग नारी का सम्मान नहीं करेंगे देश की उन्नति भी शून्य ही बनी रहेगी।
Baat to bilkul sahi hai sir ji...or time abhi aisa hi hai ki dusri vichardhara wale ko nicha dikhana hai kaise. Or ek mahila to nicha dikhana to is samaj mai sbse jyda asan hai..bht dhuk ki baat hai pr sach hai .
ReplyDeleteसंयुक्त अरब अमीरात की शहजादी पर भी कुछ लोगों ने गलत टिपण्णी की थी, और तो और सांसद तेजस्वी सूर्या ने तो अरब की सारी महिलाओं पर आपतिजनक टिपण्णी कर दी थी. महिलाओं पर टिपण्णी करने वाले अपनी नीच सोच को दिखाते है की अगर उनके पास ताकत आ जाए तो वो क्या क्या कर सकते है.
ReplyDeleteसही कहा सर
Deleteबहुत बढ़िया
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