Monday, 27 April 2020

क़ानून को रौंदती रुद्र भीड़ का खामियाज़ा भुगत रही देश की अवाम।।

       आलेख                                             सुनील पंवार


ख़ाकसार ने अपना करियर पत्रकारिता से प्रारंभ किया और यही कारण है कि वो राजनैतिक और सामाजिक दोनों विषयों पर अपनी राय बेबाकी से रखता है, वो अलग बात है कि समय-समय पर उसकी आवाज़ को दबाने के भरकस प्रयास किए जाते रहें हैं; पर इतिहास टकराने वालों का लिखा जाता है तलवे चाटने वालों का नही। जीवन के उतारचढ़ाव में रुचियां और व्यवसाय बदलतें रहतें है। ख़ाकसार ने भी भले ही अपना व्यवसाय बदल लिया हो पर उसके अवचेतन में बैठा एक पत्रकार सुषुप्त अवस्था में तो हो सकता है पर मृत कतई नहीं। जब भी पत्रकारिता की बात आती है वो जीवित अवस्था में सक्रिय हो जाता है। लोकतंत्र के चार प्रमुख स्तम्भ माने गए हैं जिनमें प्रेस एक मजबूत स्तम्भ है, इसे जनता की आवाज़ कहा गया है, लेकिन गतवर्षों से पत्रकारिता एक व्यवसाय मात्र बनकर रह गया है। इस मजबूत स्तम्भ को अब दीमक लग चुकी है और ये पूर्णतः ध्वस्त हो चुका है। पत्रकारिता के गिरते स्तर को देखते हुए ऐसा प्रतीत होता है जैसे इसने अवाम का विश्वास खो दिया हैं। सोशल मीडिया पर तो पत्रकार और मीडिया को 'दलाल' और 'भांड' जैसे अशोभनीय शब्दों से सम्बोधित किया जाने लगा है। कोरोना कालखंड में भी मीडिया ने जनता की आवाज़ बनने की बजाय अराजकता फैलाने का काम अधिक किया। इस भयानक महामारी को फैलाने का जिम्मेदार एक विशेष समुदाय को ठहराये जाने का प्रयास किया जाने लगा। जिसकी वजह से न केवल भारत बल्कि पूरी दुनियां में भारत की छवि धूमिल हुई है। तथ्यहीन और झूठी खबरों को न केवल बार-बार प्रसारित किया गया बल्कि उन्हें सच साबित करने का भरकस प्रयास किया गया। इन खबरों की वजह से सरकार और उसकी कार्यप्रणाली पर भी निरंतर प्रश्न उठने लगे।  25 अप्रैल को 'द इकोनॉमिस्ट' ने अपने कवर स्टोरी में एक विशेष समुदाय को बलि का बकरा जाने की इन खबरों के लिए भारत सरकार और सत्ताधारी पार्टी को जिम्मेदार ठहराया जो विश्वगुरु की राह पर अग्रसर भारत के लिए शुभ संकेत नही है।
हाल ही में एक टीवी पत्रकार ने एक राजनैतिक पार्टी की अध्यक्षा के बारे में टिप्पणी करते हुए पालघर (महाराष्ट्र) में भीड़ द्वारा संतो की हत्या को लेकर कुछ सवाल किए गए थे, पत्रकार का व्यवहार किसी भी रूप में पत्रकार जैसा नही था, न भाषा और न ही हावभाव से ही। उससे पहले एक विपक्ष के नेता से प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कोरोना से लड़ने के विषय में सवाल-जवाब किये गये थे। पालघर की घटना एक मॉब लिंचिंग थी जो झूठी अफवाह की वजह से हुई थी, जिसे मीडिया के साथ मिलकर, एक पार्टी विशेष के अनुयायियों ने साम्प्रदायिक जामा पहनाने में कोई कसर नही छोड़ी। सौ से ज्यादा आरोपियों की तुरन्त गिरफ्तारी कर ली गई, गिरफ्तार हुए अधिकांश आरोपी भी एक ही पार्टी से संबंध रखते हैं और इनमें से एक भी आरोपी अन्य समुदाय से नही पाया गया।  इस घटना के ठीक दो या तीन दिन बाद उत्तरप्रदेश के एटा में एक परिवार के पाँच सदस्यों की नृशंस हत्या के साथ-साथकर गोरखपुर में भी एक संत की पुलिसकर्मियों द्वारा पीट-पीटकर हत्या कर दी गई। पालघर की घटना पर शोर मचाने वाले लोग अचानक से चिड़िचुप हो गए।  संतो की हत्या पर बवाल मचाने वाले वही लोग है जिन्होंने अन्य समुदायों की मॉब लिंचिंग के समय खूब आनन्द उठाये थे। तब बस एक ही नीति का अनुसरण किया जा रहा था कि, "तुम्हारे मरे तो हम खुश और हमारे मरे तो आप खुश।" जब देश लोकतंत्र से भीड़तंत्र में तब्दील हो रहा था तब किसी ने आवाज़ नही उठाई, यही कारण है कि हम आज इस स्थिति पर पहुँच चुकें है कि ना हमें पुलिस पर भरोसा है ना न्यायालयों पर। हमें अब सड़क पर ही न्याय चाहिए। हमने जो फसल बोयी थी उसके फल अब तैयार हो चुकें है। रुद्र भीड़ देश के कानून को रौंद रही थी राजस्थान, गुजरात, झारखंड उत्तरप्रदेश के दादरी और बुलन्दशहर की घटनाएं इसका पुख़्ता प्रमाण है कि व्यक्ति कितना संवेदनहीन और क्रूर हो चुका है। आखिर इस गुस्से, इस नफ़रत की वजह क्या है? इसका मूल धार्मिक कट्टरता, और दिन रात चीख-चीख कर परोसी जाने वाली विभेदकारी नीतियों में निहित है जिसका खामियाज़ा हमें लाशों के रूप में उठाना पड़ रहा है। हिंसा किसी भी रूप में स्वीकार्य नहीं होनी चाहिए और कानून से कोई भी ऊपर नही होना चाहिए।
अब सवाल ये है कि क्या यही सवाल सत्तापक्ष से नही किये जाने चाहिए? क्या एक जिम्मेदार नागरिक की तरह सरकार और प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल नहीं उठाए जाने चाहिए? धार्मिक मसलों के अलावा भी बहुत गम्भीर मसले है जिनसे हमारा ध्यान हटाया जा रहा है या जा चुका है।
 क्या किसी ने पूछा कि नोटबन्दी के दौरान साढ़े तेरह हज़ार करोड़ रुपयों के साथ पकड़े गए महेश शाह का क्या हुआ? पुलवामा की जाँच अब तक क्यों नहीं हो पायी? पुलवामा हमले के बाद एक रिलीफ़ फंड का गठन किया गया था जिसमे देशभर से दान लिया गया था, कितने शहीद परिवारों को वो राशि आवंटित की गई और कितनी? क्या नमस्ते ट्रम्प में एकत्रित जनसमूह की स्वास्थ्य जाँच की गई? गुजरात, मध्यप्रदेश और आगरा में कोरोना ने तबाही मचा रखी है इस पर कोई सवाल क्यों नहीं? रक्षा विभाग से रॉफेल रक्षा सौदे के दस्तावेज कहाँ व कैसे गायब हो गए?  पीएम केयर्स फण्ड की पारदर्शिता के बारे में सवाल क्यों नहीं किया जा रहा? सत्तापक्ष से सवाल करने में इतनी झिझक क्यों?

इसका सीधा सा जवाब है कि सत्तापक्ष से सवाल करने के लिए गुर्दे की जरूरत होती है जो अब मीडिया के पास नही है। बहरहाल वैचारिक और बुद्धिजीवियों ने टीवी डिबेट और समाचार पत्रों का खुले तौर पर बहिष्कार करना प्रारंभ कर दिया है।
अभी भी समय है कि देश के पत्रकार एक जिम्मेदार नागरिक की तरह जनहित के अहम मुद्दों को उठाएं और निष्पक्ष व बेबाक पत्रकारिता का परिचय दें ताकि इस पेशे की गरिमा को बरकरार रखा जा सके।।■■■

सुनील पंवार की क़लम से....✍️✍️

6 comments:

  1. बिलकुल सही कहा सर आपने, मीडिया अगर अपनी जीमेवारी सही तरीके से निभाएगी तो देश एक बिलकुल सही दिशा में गमन करेगा,
    पर मीडिया तो लोगो को लड़ाने का काम कर रही है। यह बात पूरे देश को खाक करके रख देगी।

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    1. शुक्रिया विकास। प्लीज़ share🙏🙏🙏🌹💞💕

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  2. हाल ही के सालों की राजनीति को में हुए बदलाव को लेकर मुझे देश के अन्दर का अनुभव थोडा कम है, इसलिए आपका लेख पूरी तरह से समझ नहीं आया पर इतना कह सकता हूँ की इस लेख का अर्थ गहरा है.

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  3. जी। आरिफ़ साहेब प्लीज़ इसे share कीजिये।।

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  4. Sir.... आज मीडिया महज़ पैसों की चकाचौंध में लुप्त है उसे अपनी जम्मेदारी से कोई सरोकार नही है.... आपने सही कहा आज सवाल करने के लिए गुर्दे की जरूरत है, जो इनके पास नही है ये सिर्फ़ बेवजह की आग में घी डालने का काम करते है...

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    1. हौसला अफजाई के लिए शुक्रिया🙏🙏🙏

      Please share it🙏🙏💕💞🌹

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