Friday, 24 April 2020

ख़ैर! कोई कमी है तो बताओ।।


       
       
लॉक डाउन ने मानवीय जीवन को नीरस बना दिया है, टीवी ,मोबाइल और न्यूज़पेपर ही वक़्त गुजारने का एक मात्र सहारा रह गया है, लेकिन ऐसा भी नही है कि इस अवधि के दौरान कुछ नया नही हो रहा, बहुत कुछ सीखने को भी मिल रहा है। हाल ही में मैं अपना खाली समय व्यतीत करने के लिए यूट्यूब पर वीडियो देख रहा था कि यकायक मेरे सामने एक वीडियो आ गया जिसे मैंने बड़ी रुचि लेकर देखा। ये वीडियो एक मशहूर कॉमेडी शो का था  ये वीडियो इसलिए भी महत्वपूर्ण था कि इसमें वर्तमान राजनैतिक स्थिति पर भी तंज कसा गया था।
जब कभी भी अफरा-तफरी का माहौल बनता है, मुझे इस कॉमेडी शो का ये एपिसोड याद आ ही जाता है, जिसमें बॉलीवुड के स्टार रणदीप हुड्डा ने एक चुटकुला ठेठ हरयाणवी भाषा में सुनाया था। हरयाणवी भाषा लिखना तो मेरे लिए आसान नहीं है पर मैं आपको हिंदी में अनुवाद करके जरूर बताऊँगा। मामला कुछ इस तरह था कि एक बार एक बन्दर को शेर के स्थान पर जंगल का राजा नियुक्त किया गया। कुछ ही दिनों बाद उसी जंगल में एक हाथी के बच्चे को शिकारी ने कैद कर लिया। सारे जानवर मिलकर  बन्दर राजा के पास अपनी समस्या लेकर गए और शिकारियों से रक्षा करने की गुहार लगाई। बन्दर राजा ने उनकी समस्या सुनकर एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाना शुरू कर दिया और मदद का पूरा आश्वासन दिया।
शिकारियों के हमले निरन्तर जारी रहे,और समस्या जस की तस बनी रही।
जब भी जानवर बन्दर राजा के पास अपनी ये समस्या लेकर जाते वो एक पेड़ से दूसरे पेड़ पर छलाँग लगाने लगता। जब बार-बार बन्दर राजा के पास जाने के बाद भी इस समस्या का हल नही हुआ तो पेड़ पर उछलकूद करते बन्दर राजा से एक बुज़ुर्ग हाथी ने खीझकर पूछा।
"आपको हमारी समस्या से बार बार अवगत कराने पर भी हमारी समस्या जस की तस है, आपने इसका कोई समाधान अब तक क्यों नहीं किया?"
इस पर बन्दर बोला ने बड़ा ही सरल और तार्किक जवाब दिया। "देखो भाई! तुम्हारा काम हो या ना हो, मेरी भागदौड़ में कोई कमी है तो बताओ?"
देश आज महामारी के भयंकर दौर से गुजर रहा है और पूरा देश इस स्थिति से निपटने में अपना सहयोग दे रहा है। लोग अपना काम काज छोड़कर घरों में क़ैद है। ये सर्वविदित है कि देश में संसाधनों का अभाव है, पुलिस, सफाईकर्मी और डॉक्टरों के पास भी आवश्यक वस्तुओं का नितांत अभाव है, गरीब मजदूर लाचार है और सरकार पूर्ति करने में नाकाम रही है। सरकारें मूल समस्याओं पर ध्यान देने की बजाय अजीबोगरीब फरमान जारी किए जा रहे हैं। हर कोई अपना श्रेय लेने के चक्कर मे दिख रहें है पर नतीजा अभी तक संतोषजनक नहीं है। समस्याएं जस की तस बनी है।
ख़ैर! नतीज़े कुछ भी हों, क्या फ़र्क पड़ता है! भागदौड़ में कोई कमी है तो बताओ?
सुनील पंवार की क़लम से....✍️✍️