"अब देश में कानून जैसी कोई चीज नहीं रही, न्यायालय बन्द कर देने चाहिये। पैसे के दम पर हमारे आदेशों को रोका जा रहा है।"
.........जस्टिस अरुण मिश्रा
.........जस्टिस अरुण मिश्रा
हाल ही में सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश द्वारा दिया गया वक्तव्य न केवल व्यवस्था बल्कि सरकार की कार्यशैली पर भी सवाल उठाता है। ये बयान भले ही किसी भी संदर्भ में दिया गया हो परन्तु वर्तमान परिप्रेक्ष्य में ये पूर्ण प्रासंगिक है। ये प्रथम बार नहीं है जब न्यायालय द्वारा इस प्रकार की टिप्पणी की गई हो। ज्ञातव्य है कि गत वर्ष सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायधीशों ने भी सामूहिक प्रेस कॉन्फ्रेंस के माध्यम से अपनी बात रखने का प्रयास किया था। इसी क्रम में जस्टिस चंद्रचूड़ ने भी कहा कि "असहमत होना देशद्रोह नहीं है।" हम किसी विचार पर सहमत या असहमत हो सकतें है परन्तु हमें विचारों का सम्मान करना चाहिए। विगत कुछ वर्षों से असहमति की परिभाषा ही बदल चुकी है और उसे राष्ट्रद्रोह के नाम से नवाज़ा जा चुका है। जो आपकी बात से सहमत नहीं है वो देशद्रोही है।
अखण्ड भारत की परिकल्पना करने वालों ने ही भारत को खण्ड-खण्ड कर दिया है। हिन्दू बनाम मुसलमान, दलित बनाम सवर्ण, गरीब बनाम अमीर और राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही! और ऊपर से देश के जिम्मेदार लोगों के भड़काऊ भाषणों ने तो आग में घी का काम किया ही है।
न्याय के संरक्षकों द्वारा की गई ये टिप्पणियां इस ओर इशारा इंगित करती है कि कुछ तो है जो सही नहीं है।
देश आज मुश्किल दौर से गुज़र रहा है जिससे कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहा है। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी में इज़ाफ़ा हुआ है तो वहीं हत्या, बलात्कार, शोषण, जातीय हिंसा जैसे अपराधों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। आज देश के हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं। लोकतंत्र अब भीड़तंत्र में तब्दील होता जा रहा है। लोगों को न्यायालय और कानून में कोई विश्वास नहीं रह गया है वे अब सड़क पर ही न्याय चाहतें हैं। अब कानून किताबों में बंद शब्द मात्र रह गए हैं।
देश की शिक्षण संस्थानों पर बढ़ते हमलों की घटनाएं, शाहीन बाग और जामियाँ में गोलीबारी, तबरेज़ और पहलू ख़ाँ की भीड़ द्वारा हत्या, दुष्कर्म पीड़िता को सरेआम जलाकर हत्या, गार्गी महाविद्यालय में हुई यौन हिंसा, जेएनयू के हॉस्टल में हिंसा जैसी अनगिनत घटनाओं ने पुलिस और सरकार की कमजोर कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है। लगभग इन सभी घटनाओं में पुलिस ने केवल मूकदर्शक की भूमिका निभाई है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। एक बड़े प्रदेश के स्कूली कार्यक्रम में एक नाटक में भूमिका निभाने वाले चौथी कक्षा के छात्रों को केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन्होंने सरकार द्वारा लागू कानून को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया जिसे राष्ट्र के खिलाफ समझा गया और बच्चों के साथ अपराधियों की भाँति बर्ताव किया गया। ऐसे माहौल में न्यायालय का फिक्रमंद होना वाज़िब है।
मौजूदा समय में लगता है जैसे व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता। रोजगार, भुखमरी, भ्रष्टाचार,शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है। टीवी पर चल रही अनवरत निरर्थक बहस ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। सरकार की मौजूदा नीतियों के खिलाफ दुनियां के प्रमुख समाचार पत्रों ने भारत को लेकर आलोचनात्मक संपादकीय लेख प्रकाशित कियें है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठनों ने भी भारत सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की है। ख़बर तो यहाँ तक आयी है कि कई देशों ने अपने नागरिकों को भारत आने को लेकर यात्रा चेतावनियां जारी कर दी है। माहिलाओं की असुरक्षा के मामले में तो भारत कई पायदान लाँघ चुका है जिससे देश की गरिमा का ह्रास हुआ है और हम इस भ्रम में है कि देश का मान बढ़ रहा है, परन्तु इन सभी मामलों में भारतीय मीडिया सरकार के प्रति पूर्णरूप से नतमस्तक है।
बहरहाल निष्कर्ष ये है कि सर्वशक्तिमान, पूर्णस्वतंत्र न्यायपालिका भी हाशिये पर धकेल दी गई है और न्याय सदन से आने वाले बयानों ने न्यायपालिका की बेबसी को उजागर कर दिया है।
आम आदमी सदियों से मौन है और झूठ का प्रपंच पूरे शोर से रचा जा रहा है।
बहरहाल छुपन-छुपाई का खेल जारी है। मीडिया असल मुद्दों को छुपा रही है, सरकार आँकड़े छुपा रही है।
कहीं दीवार चुन कर गरीबी छिपाई जा रही है तो कहीं नदियों की दुर्गंध छिपाई जा रही है, पर सत्य को कब तक छुपाया जा सकेगा! गड़े मुर्दे जब कभी भी उखड़ेंगे, सड़ी-गली व्यवस्थाओं की दुर्गंध दूर तलक़ पसर जायेगी।।
अखण्ड भारत की परिकल्पना करने वालों ने ही भारत को खण्ड-खण्ड कर दिया है। हिन्दू बनाम मुसलमान, दलित बनाम सवर्ण, गरीब बनाम अमीर और राष्ट्रवादी बनाम देशद्रोही! और ऊपर से देश के जिम्मेदार लोगों के भड़काऊ भाषणों ने तो आग में घी का काम किया ही है।
न्याय के संरक्षकों द्वारा की गई ये टिप्पणियां इस ओर इशारा इंगित करती है कि कुछ तो है जो सही नहीं है।
देश आज मुश्किल दौर से गुज़र रहा है जिससे कोई भी वर्ग अछूता नहीं रहा है। भ्रष्टाचार, महंगाई, बेरोजगारी में इज़ाफ़ा हुआ है तो वहीं हत्या, बलात्कार, शोषण, जातीय हिंसा जैसे अपराधों में अप्रत्याशित वृद्धि हुई है। आज देश के हालात बद से बद्तर होते जा रहे हैं। लोकतंत्र अब भीड़तंत्र में तब्दील होता जा रहा है। लोगों को न्यायालय और कानून में कोई विश्वास नहीं रह गया है वे अब सड़क पर ही न्याय चाहतें हैं। अब कानून किताबों में बंद शब्द मात्र रह गए हैं।
देश की शिक्षण संस्थानों पर बढ़ते हमलों की घटनाएं, शाहीन बाग और जामियाँ में गोलीबारी, तबरेज़ और पहलू ख़ाँ की भीड़ द्वारा हत्या, दुष्कर्म पीड़िता को सरेआम जलाकर हत्या, गार्गी महाविद्यालय में हुई यौन हिंसा, जेएनयू के हॉस्टल में हिंसा जैसी अनगिनत घटनाओं ने पुलिस और सरकार की कमजोर कार्यप्रणाली की पोल खोलकर रख दी है। लगभग इन सभी घटनाओं में पुलिस ने केवल मूकदर्शक की भूमिका निभाई है, जो लोकतंत्र के लिए शुभ संकेत नहीं है। एक बड़े प्रदेश के स्कूली कार्यक्रम में एक नाटक में भूमिका निभाने वाले चौथी कक्षा के छात्रों को केवल इसलिए गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उन्होंने सरकार द्वारा लागू कानून को नाटकीय रूप में प्रस्तुत किया जिसे राष्ट्र के खिलाफ समझा गया और बच्चों के साथ अपराधियों की भाँति बर्ताव किया गया। ऐसे माहौल में न्यायालय का फिक्रमंद होना वाज़िब है।
मौजूदा समय में लगता है जैसे व्यक्ति की मूलभूत आवश्यकताओं पर कोई चर्चा नहीं करना चाहता। रोजगार, भुखमरी, भ्रष्टाचार,शिक्षा, स्वास्थ्य और सुरक्षा कोई मुद्दा ही नहीं रह गया है। टीवी पर चल रही अनवरत निरर्थक बहस ने भ्रम की स्थिति पैदा कर दी है। सरकार की मौजूदा नीतियों के खिलाफ दुनियां के प्रमुख समाचार पत्रों ने भारत को लेकर आलोचनात्मक संपादकीय लेख प्रकाशित कियें है। संयुक्त राष्ट्र के मानवाधिकार संगठनों ने भी भारत सरकार के रवैये की कड़ी आलोचना की है। ख़बर तो यहाँ तक आयी है कि कई देशों ने अपने नागरिकों को भारत आने को लेकर यात्रा चेतावनियां जारी कर दी है। माहिलाओं की असुरक्षा के मामले में तो भारत कई पायदान लाँघ चुका है जिससे देश की गरिमा का ह्रास हुआ है और हम इस भ्रम में है कि देश का मान बढ़ रहा है, परन्तु इन सभी मामलों में भारतीय मीडिया सरकार के प्रति पूर्णरूप से नतमस्तक है।
बहरहाल निष्कर्ष ये है कि सर्वशक्तिमान, पूर्णस्वतंत्र न्यायपालिका भी हाशिये पर धकेल दी गई है और न्याय सदन से आने वाले बयानों ने न्यायपालिका की बेबसी को उजागर कर दिया है।
आम आदमी सदियों से मौन है और झूठ का प्रपंच पूरे शोर से रचा जा रहा है।
बहरहाल छुपन-छुपाई का खेल जारी है। मीडिया असल मुद्दों को छुपा रही है, सरकार आँकड़े छुपा रही है।
कहीं दीवार चुन कर गरीबी छिपाई जा रही है तो कहीं नदियों की दुर्गंध छिपाई जा रही है, पर सत्य को कब तक छुपाया जा सकेगा! गड़े मुर्दे जब कभी भी उखड़ेंगे, सड़ी-गली व्यवस्थाओं की दुर्गंध दूर तलक़ पसर जायेगी।।
सुनील पंवार (स्वतन्त्र युवा लेखक)
रावतसर (राजस्थान)
रावतसर (राजस्थान)