अघोषित विश्वयुद्ध या सामुहिक आत्महत्या।।
आज पूरी दुनिया एक अघोषित विश्वयुद्ध को झेल रही है, जिसमें न कोई हथियार है और ना ही कोई सैनिक! ज्ञातव्य है कि एक अनजान वायरस 'कोरोना वायरस' ने पूरी दुनियां को घुटनों के बल कर दिया है,जिसका अब तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। कोई भी देश इसके कहर से अछूता नहीं रह गया है। चीन के वुहान शहर से शुरू हुई इस महामारी ने सम्पूर्ण विश्व में तीव्र गति से अपने पाँव पसार लिए है।
ये मनुष्य, प्रकृति या विज्ञान, किसी की भी गलती से हुआ हो लेकिन इसने सर्वाधिक मनुष्य को ही अपना ग्रास बनाया है।
इस विश्व स्तरीय आपदा ने न केवल अर्थव्यवस्थाओं बल्कि मजबूत सरकारों की भी चूलें हिलाकर रख दी है।
भारत मे भी इसका व्यापक असर पड़ा है, अब तक करीब आठ सौ से ज्यादा संक्रमित मामले सामने आ चुकें है,जिसके चलते सरकार को इक्कीस दिन के सम्पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लेना पड़ा। सोशल डिस्टेंस एक वैकल्पिक उपचार है,पर भारत का आम नागरिक सोशल डिस्टेंस को नहीं जानता।
अन्य देशों की अपेक्षा भारत की स्थिति भिन्न है। यहाँ की लगभग अस्सी करोड़ आबादी का जीवन दैनिक मजदूरी व दिहाड़ी पर निर्भर करता है। सम्पूर्ण लॉकडाउन का पालन करना इनके लिए सामूहिक आत्महत्या करने जैसा है। भारत इस भयंकर स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं है और ना ही इससे निपटने की कोई पूर्व तैयारी ही है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता से एक दिन के 'जनता कर्फ़्यू' व थाली और ताली बजाने की अपील की, तथा उसके लिए उन्होंने चार दिन का पर्याप्त समय भी दिया। पर पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लेते समय ना तो कोई समय दिया गया तथा ना ही प्रवासी मजदूरों व कामगारों के रहने,खाने से संबंधित कोई चर्चा ही हुई। नतीज़तन
इक्कीस दिन की लम्बी अवधि से मजदूर वर्ग व असंगठित कामगारों में अफरा तफरी का माहौल बन गया और देखते ही देखते लाखों की तादाद में लोगों का हुज़ूम सड़कों पर उमड़ पड़ा।
पुलिस, प्रशासन तथा सरकार ने बार बार कहा कि जनता लॉकडाउन का पालन नहीं कर रही है तथा वे इस बीमारी को गंभीरता से नही ले रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सरकार ने स्वंय इसे कितनी गम्भीरता से लिया है। नवम्बर 2019 में इस महामारी के लक्षण दिखने प्रारम्भ हो गए थे और दिसम्बर 2019 में इसका पहला मामला सामने आ चुका था। फरवरी माह तक आते-आते इसने दुनियां के अन्य हिस्सों में भी अपने पाँव जमाने शुरू कर दिए। 12 फरवरी 2020 को राहुल गांधी द्वारा किए गए एक ट्वीट ने सरकार को पहले ही चेता दिया था कि ये महामारी भारत के लिए न केवल एक चुनौती होगी बल्कि विनाशकारी साबित होगी। सरकार को पूर्व तैयारी की आवश्यकता है और इसे गम्भीरता से लेना चाहिए। पर इस बात पर कोई गौर नहीं फ़रमाया गया। इसके बाद भी विदेशों से आने वाले प्रवासियों की जाँच प्रकिया में घोर लापरवाही हुई है इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल अभी भी समय है कि सभी सरकारों को केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर, कार्य करने व मानव जीवन को बचाने और इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है।■■■
आज पूरी दुनिया एक अघोषित विश्वयुद्ध को झेल रही है, जिसमें न कोई हथियार है और ना ही कोई सैनिक! ज्ञातव्य है कि एक अनजान वायरस 'कोरोना वायरस' ने पूरी दुनियां को घुटनों के बल कर दिया है,जिसका अब तक कोई उपचार उपलब्ध नहीं है। कोई भी देश इसके कहर से अछूता नहीं रह गया है। चीन के वुहान शहर से शुरू हुई इस महामारी ने सम्पूर्ण विश्व में तीव्र गति से अपने पाँव पसार लिए है।
ये मनुष्य, प्रकृति या विज्ञान, किसी की भी गलती से हुआ हो लेकिन इसने सर्वाधिक मनुष्य को ही अपना ग्रास बनाया है।
इस विश्व स्तरीय आपदा ने न केवल अर्थव्यवस्थाओं बल्कि मजबूत सरकारों की भी चूलें हिलाकर रख दी है।
भारत मे भी इसका व्यापक असर पड़ा है, अब तक करीब आठ सौ से ज्यादा संक्रमित मामले सामने आ चुकें है,जिसके चलते सरकार को इक्कीस दिन के सम्पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लेना पड़ा। सोशल डिस्टेंस एक वैकल्पिक उपचार है,पर भारत का आम नागरिक सोशल डिस्टेंस को नहीं जानता।
अन्य देशों की अपेक्षा भारत की स्थिति भिन्न है। यहाँ की लगभग अस्सी करोड़ आबादी का जीवन दैनिक मजदूरी व दिहाड़ी पर निर्भर करता है। सम्पूर्ण लॉकडाउन का पालन करना इनके लिए सामूहिक आत्महत्या करने जैसा है। भारत इस भयंकर स्थिति से निपटने में सक्षम नहीं है और ना ही इससे निपटने की कोई पूर्व तैयारी ही है। माननीय प्रधानमंत्री जी ने जनता से एक दिन के 'जनता कर्फ़्यू' व थाली और ताली बजाने की अपील की, तथा उसके लिए उन्होंने चार दिन का पर्याप्त समय भी दिया। पर पूर्ण लॉकडाउन का निर्णय लेते समय ना तो कोई समय दिया गया तथा ना ही प्रवासी मजदूरों व कामगारों के रहने,खाने से संबंधित कोई चर्चा ही हुई। नतीज़तन
इक्कीस दिन की लम्बी अवधि से मजदूर वर्ग व असंगठित कामगारों में अफरा तफरी का माहौल बन गया और देखते ही देखते लाखों की तादाद में लोगों का हुज़ूम सड़कों पर उमड़ पड़ा।
पुलिस, प्रशासन तथा सरकार ने बार बार कहा कि जनता लॉकडाउन का पालन नहीं कर रही है तथा वे इस बीमारी को गंभीरता से नही ले रहे हैं।
अब सवाल यह उठता है कि सरकार ने स्वंय इसे कितनी गम्भीरता से लिया है। नवम्बर 2019 में इस महामारी के लक्षण दिखने प्रारम्भ हो गए थे और दिसम्बर 2019 में इसका पहला मामला सामने आ चुका था। फरवरी माह तक आते-आते इसने दुनियां के अन्य हिस्सों में भी अपने पाँव जमाने शुरू कर दिए। 12 फरवरी 2020 को राहुल गांधी द्वारा किए गए एक ट्वीट ने सरकार को पहले ही चेता दिया था कि ये महामारी भारत के लिए न केवल एक चुनौती होगी बल्कि विनाशकारी साबित होगी। सरकार को पूर्व तैयारी की आवश्यकता है और इसे गम्भीरता से लेना चाहिए। पर इस बात पर कोई गौर नहीं फ़रमाया गया। इसके बाद भी विदेशों से आने वाले प्रवासियों की जाँच प्रकिया में घोर लापरवाही हुई है इससे भी इंकार नहीं किया जा सकता। बहरहाल अभी भी समय है कि सभी सरकारों को केंद्र सरकार के साथ समन्वय स्थापित कर, कार्य करने व मानव जीवन को बचाने और इस भयावह स्थिति से निपटने के लिए एकजुट होकर कार्य करने की आवश्यकता है।■■■