इन्तहा
बादलों की गड़गडाहट ने उसकी तन्द्रा भंग कर दी, जैसे वो नींद से जाग गई हो। उसे लगा जैसे दरवाजे पर किसी ने आहट दी है। वो उठी और खिड़की से बाहर झांकने लगी। आज फिर मौसम ने अपना रुख बदल लिया था, काली घटाओं ने दिन को रात में तब्दील कर दिया। कौंधती हुई बिजली और बहती हुई तेज़ हवाओं ने आने वाले तूफ़ान का संकेत दे दिया था। रेडियो पर मधुर गीत की धुन बज रही थी। पूरा घर तरह तरह के व्यंजनों की खुशबू से महक रहा था। आज सुबह से ही वो चैन से नही बैठी। सारे दिन अपने काम में व्यस्त रही पर ध्यान सिर्फ दरवाजे पर था उसका। वो श्रृंगार से सजी किसी अप्सरा से कम नहीं दिख रही थीं, वो बार बार आईने के सामने अपने माथे की बिंदिया को ठीक करती तो कभी साड़ी के पल्लू को। दो साल बीत गए उसे देखे हुए। वो कभी उसे मन भर देख भी नहीं पाई थी। पहले तो हर रोज बात होती थी पर अब तो कभी कभार ही उससे फोन पर बात हो पाती है। शादी के कुछ ही महीनों बाद सुनील, वाणी को छोड़कर विदेश चला गया था। वो अपने कामों में इतना व्यस्त रहा कि आज तक लौटकर नहीं आया। वाणी हर रोज विरह की आग में झुलसती रही। न जाने कैसे कैसे विचारों ने उसके मन मस्तिष्क में घर कर लिया था। "क्या वो मुझे पसन्द नही करते?....क्या मैं अब सुंदर नहीं रही? .........कहीं उन्होंने किसी और से तो........? नहीं..... नहीं...वो ऐसा नहीं कर सकते.... व्यस्त होंगे...शायद समय नहीं मिलता होगा...।" सोचकर अपने मन को दिलासा देती रहती। एक सप्ताह पहले ही सुनील का फोन आया था। दो साल बाद वो घर लौटकर आ रहा था। वाणी ने दो साल तो जैसे-तैसे गुजार दिए, पर बीता सप्ताह कैसे गुजरा, उसका मन ही जानता है। अकेलापन हर रोज उसे डसता,नोचता, खसोटता रहता।
वो बार बार घड़ी की और देख रही थी। शाम के चार बजे चुके थे। ऐसा लग रहा था जैसे समय ठहर गया हो। वैसे भी इंतज़ार में घड़ी हमेशा धीरे ही चलती है। हवाएं और तेज़ हो गई थीं। सुबह से अब तक एक पल के लिए भी उसकी नज़र दरवाजे से नहीं हटी थी। गीतों की मधुर धुनों के बीच रेडियो पर बार बार मौसम खराब होने और भयंकर तूफान आने की चेतावनी प्रसारित की जा रही थी। एक एक पल बरस के समान गुजर रहा था उसका। उसके आने भर की खबर ने ही उसके मन में प्रेम की कंपोले अंकुरित कर दी थी। उसकी जागती आँखे न जाने कितने स्वप्न सजो रहीं थी। पिछले सप्ताह से ही पूरे घर को उसकी पसन्द का सजाने में लगी थीं वो। घर की हर चीज उसके हिसाब से सजी थी। मौसम की वजह से रेडियो का सिग्नल लड़खड़ाने लगा था। साढ़े चार बजने को थे और सुनील का न कोई फोन न कोई ख़बर। "इतनी देर क्यों लगा दी..........? और कितना इंतज़ार करूँ.........? सब ठीक तो है ना....?" उसके मन में एक पल में न जाने कितने विचार कौंध रहे थे। बाहर भी तूफ़ान, अन्दर भी तूफ़ान । उसका मन बहुत घबरा रहा था। वो भारी मन से बाल्कनी में आ गई। चारों ओर अंधेरा पसरा पड़ा था, दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। ये उसके सब्र की इंतहा थी।
"ट्रिंग........ ट्रिंग....... ट्रिंग........ ट्रिंग" फोन की रिंग बज उठी। फोन की रिंग सुनकर वाणी का चेहरा खिल उठा।
वाणी ने दौड़कर फोन उठाया। "हेलो.....हेलो" खराब सिग्नल की वजह से आवाज़ साफ सुनाई नही दे रही थी उसे।
"हेलो....."
"हैलो..... वाणी मैं सुनील बोल रहा हूँ....."
"हाँ.... बोलिये....कहाँ हैं आप?"
" आई एम सॉरी! वाणी।.......मेरी फ़्लाइट मौसम खराब होने की वजह से रद्द हो गई है। दूसरी फ़्लाइट मौसम ठीक होने तक नही है। मौसम का क्या भरोसा कब तक ठीक हो।..... तब तक मेरी छुट्टियां पूरी हो जाएगी.........हेलो...... आवाज़ आ रही है?।"
"हाँ..... मैं सुन रही हूँ...... हेलो।"
"आई एम सॉरी! शायद इस बार भी तुमसे मिलना नही होगा........ सॉरी!............" फोन डिसक्नेक्ट हो गया।
"हेलो............हेलो......... ....हेलो......." वाणी चीखती रही पर सामने से कोई प्रत्युत्तर नहीं मिला। वो निःशब्द फोन को कान से लगाये खड़ी रही। एक पल को लगा जैसे वो जड़ हो गई हो, वक़्त थम गया हो और हृदय ने धड़कना बन्द कर दिया हो। वो सुन्न, निढ़ाल, बूत बनी खड़ी रही। उसकी आँखे भर आई । आँखों से बहते आँसू गालों पर लुढ़कने लगे। अचानक तूफ़ान ने पूरी ताकत से प्रहार किया सभी खिड़कियां और दरवाजे खुल गए और बरसात के बादल फट पड़े।
ऐसा लग रहा था जैसे आसमान का सीना फट गया हो■■■■■■■
वो बार बार घड़ी की और देख रही थी। शाम के चार बजे चुके थे। ऐसा लग रहा था जैसे समय ठहर गया हो। वैसे भी इंतज़ार में घड़ी हमेशा धीरे ही चलती है। हवाएं और तेज़ हो गई थीं। सुबह से अब तक एक पल के लिए भी उसकी नज़र दरवाजे से नहीं हटी थी। गीतों की मधुर धुनों के बीच रेडियो पर बार बार मौसम खराब होने और भयंकर तूफान आने की चेतावनी प्रसारित की जा रही थी। एक एक पल बरस के समान गुजर रहा था उसका। उसके आने भर की खबर ने ही उसके मन में प्रेम की कंपोले अंकुरित कर दी थी। उसकी जागती आँखे न जाने कितने स्वप्न सजो रहीं थी। पिछले सप्ताह से ही पूरे घर को उसकी पसन्द का सजाने में लगी थीं वो। घर की हर चीज उसके हिसाब से सजी थी। मौसम की वजह से रेडियो का सिग्नल लड़खड़ाने लगा था। साढ़े चार बजने को थे और सुनील का न कोई फोन न कोई ख़बर। "इतनी देर क्यों लगा दी..........? और कितना इंतज़ार करूँ.........? सब ठीक तो है ना....?" उसके मन में एक पल में न जाने कितने विचार कौंध रहे थे। बाहर भी तूफ़ान, अन्दर भी तूफ़ान । उसका मन बहुत घबरा रहा था। वो भारी मन से बाल्कनी में आ गई। चारों ओर अंधेरा पसरा पड़ा था, दूर तक कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा था। ये उसके सब्र की इंतहा थी।
"ट्रिंग........ ट्रिंग....... ट्रिंग........ ट्रिंग" फोन की रिंग बज उठी। फोन की रिंग सुनकर वाणी का चेहरा खिल उठा।
वाणी ने दौड़कर फोन उठाया। "हेलो.....हेलो" खराब सिग्नल की वजह से आवाज़ साफ सुनाई नही दे रही थी उसे।
"हेलो....."
"हैलो..... वाणी मैं सुनील बोल रहा हूँ....."
"हाँ.... बोलिये....कहाँ हैं आप?"
" आई एम सॉरी! वाणी।.......मेरी फ़्लाइट मौसम खराब होने की वजह से रद्द हो गई है। दूसरी फ़्लाइट मौसम ठीक होने तक नही है। मौसम का क्या भरोसा कब तक ठीक हो।..... तब तक मेरी छुट्टियां पूरी हो जाएगी.........हेलो...... आवाज़ आ रही है?।"
"हाँ..... मैं सुन रही हूँ...... हेलो।"
"आई एम सॉरी! शायद इस बार भी तुमसे मिलना नही होगा........ सॉरी!............" फोन डिसक्नेक्ट हो गया।
"हेलो............हेलो.........
ऐसा लग रहा था जैसे आसमान का सीना फट गया हो■■■■■■■
सुनील पंवार रावतसर।