Saturday, 22 February 2020

डायरी 2001

                                    डायरी 2001

दिन के ग्यारह बजने वाले थे । मै बार-बार घड़ी देख रहा था । अचानक डोर बेल बजा। दरवाजा खोला तो सामने हरी था । जो हर महीने पुराने अखबार और किताबें लेने आता है । मैं उसे स्टडी रूम  की तरफ़ ले गया और किताबें निकाल कर देने लगा । मुझे बचपन  से किताबें पढ़ने का बहुत शौक रहा है । किताबें ही आपकी सबसे अच्छी दोस्त होती है जब आप निहायत तन्हा होते हैं । ये आपका विरोध नही करतीं पर आपको सही रास्ता जरूर दिखा देती है । " ये डायरी आपके काम की है ?" हरी के हाथ में एक रेड कवर डायरी थी । "ये तो वर्ष 2001 की है।" मैंने हरी के हाथ से डायरी ले ली । "ये बहुत काम की है। कहाँ से मिली ?"  "यहीं किताबों के बीच । ये तो बहुत साल पुरानी है वकील साहब । कुछ खास लिखा है क्या इसमें ? " "नहीँ कुछ खास नही । ये मेरे स्कूल टाइम की डायरी है। मुझे तब से ही लिखने का शौक रहा है । तुम किताबें  पैक कर लो, मैं ड्राइंग रूम में तुम्हारा इंतजार कर रहा हूँ ।" मैं हरी को स्टडी रूम में छोड़ कर ड्राइंग रूम में आ गया । मैं आराम कुर्सी पे बैठ कर  रेड कवर डायरी को पढ़ने लगा । डायरी के पन्नों के साथ-साथ वक्त भी पलटता गया और अतीत ने मुझे अपनी आगोश में ले लिया । बीता हुआ एक-एक पल आँखों के सामने तैर रहा था । 
बात 2001 की है, जब मैं जूनियर क्लास में पढ़ता था। मेरी उम्र महज़ सोलह वर्ष रही होगी । उम्र का ऐसा दौर , जिसमें  बचपन रुखसत हो  चुका था और लड़कपन नये सपने,. नयी चाहत, और जुनून के साथ जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने को बेताब था । इस दौर में अक्सर लडखड़ाने का डर सताता रहता है। मैंने एक किताब में पढ़ा था लड़कपन बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह होता है। कभी भी एक्सीडेंट हो सकता है । शायद ये सही भी है । हर युवा की तरह मेरे अन्दर भी उम्र के लिहाज़ से मानसिक और शारीरिक बदलाव साफ नज़र आने लगे थे । मन हसरतों से भरा पड़ा था।  ********************
सेंट जेवियर स्कूल । शहर के सबसे बड़े स्कूल के वार्षिक समारोह में रूप मुझे भी अपने साथ ले गया । यहीं देखा था मैंने उसे पहली बार। गोरा रंग, सुनहरे बाल, बिलौरी आँखें । बिल्कुल कहानियों की परी जैसी। और उसकी नृत्यकला तो कमाल की थी । एक पल के लिये भी कोई उससे नज़र हटा ले । ये सम्भव ना था । मैं तो उसे एक-टक देखे ही जा रहा था । ये पहली बार था, जब मैंने किसी के प्रति आकर्षण महसूस किया था। जिया नामक था उसका । यहीं से शुरु हुआ एक अनकही , भूलीबिसरी, एक तरफी प्रेम कहानी का दौर । प्रेम कहानी कहें या आकर्षण ? ये मैं आजतक नहीं समझ पाया । उसी दिन से मेरे अन्दर एक अजीब सा बदलाव था । शायद मैं उसे पसंद करने लगा था । शायद क्या ? सचमुच पसंद करने लगा था । मेरे पास उसका पूरा शेडयूल था । कोचिंग क्लास ,डाँस क्लास ,स्कूल टाइम । सब । मैं हर रोज बड़ी हिम्मत के साथ उसे देखने उसके रास्ते में खड़ा होता पर उसके सामने जानें की हिम्मत कभी जुटा ही नहीं पाया । उसे तो कभी अहसास ही नहीं हुआ की कोई उसकी एक झलक पाने की चाह में हर रोज उसके राह में बेताब खड़ा रहता है ।
रूप हमेशा कहता था की मैं जाके जिया को सब कुछ  बोल दूँ। या फिर उसके पीछे अपना वक्त बर्बाद ना करूँ । पर ये मेरे लिये सम्भव नहीँ था । मुझे अंजाम का डर था । मुझे पता था उसका जवाब क्या होगा। उसकी ना सुनने की हिम्मत नहीँ थी मुझमें । वो मुझसे श्रेष्ठ थी। हर तरह से श्रेष्ठ । वो शहर के सबसे अच्छे स्कूल में पढ़ती थी जबकि  मैं गवर्नमेंट स्कूल में । वो ऑफिसर की बेटी थी तो  मैं किसान का बेटा । वो सीनियर थी मैं जूनियर । वो आत्मविश्वासी थी, मैं संकोची । वो आत्मविश्वास से लबरेज़ थी । मेरी स्थित हर तरफ़ से उसके विपरीत थी । मुझमें ऐसी कोई खाशियत नहीँ थी जो किसी को प्रभावित करने की क्षमता रखती हो । वो मुझे पसंद करती भी तो इसकी कोई वजह नहीं थी । दो साल गुजर गये इसी कशमश में ।  वक्त बढ़ता गया और मेरा तनाव भी ।      *******************
एक सप्ताह बीत गया था जिया को देखे हुए । ना कॉलेज जाती ,ना कोचिंग । मैं हर रोज़ की तरह रास्ते में उसका इंतजार करता , पर उसकी कोई खबर नहीं थी । मेरा मन बहुत खराब रहता । मन में अजीबोगरीब ख़याल आते रहते । यकीन मानीये ये ऐसा वक्त  था जब मैं दर्द , सम्वेदना , प्रेम और तनाव हर मंजर से गुजर रहा था ।***********
उस दिन सीने को चीर देने वाली सर्द हवायें चल रही थी । दरख्तों के पत्तों ने शोर मचाना शुरू कर दिया था। ऐसा लग रहा था जैसे चीख-चीख कर मुझसे कुछ कहने की कोशिश कर रहें हो । रुप एकटक मुझे देख रहा था । उसकी आँखों में  बहुत उदासी थी। वो मुझसे कुछ कहना चाह रहा था पर शायद उसकी हिम्मत नहीं हो रही थी । "क्या हुआ?'' मैंने बड़ी उत्सुकता से पूछा। वो सिर्फ मुझे देखे जा रहा था । शांत । उदास । उसके मुँह से एक बोल तक नहीं फूटा । बस देख रहा था मुझे। '' क्या हुआ ? कुछ तो बोल यार ।" वो कुछ नहीं बोला । अपनी जेकेट से एक लिफाफा निकाल कर मेरी और बढा दिया । वो किसी की शादी का कार्ड था जो हमारे प्रिंसिपल सर के लिए भेजा था । " ये क्या है ? ये तो प्रिंसिपल सर का है, मुझे क्यों दे रहा है ?" "इसे पढ़ लो ।" वो सिर्फ इतना ही बोला । मेरी आँखे कार्ड पर ही ठहर कर रह गयी थी । वो जिया की शादी का कार्ड था । मैं स्तब्ध खड़ा रहा । ऐसा लगा जैसे ढेरों मलबे के नीचे दब गया हूँ और कहीं से कोई आवाज़ नहीं सुन रहा है । हवायें और तेज हो गई थी । मैं अपलक कार्ड पर लिखे जिया के नाम को देख रहा था । सिर्फ नाम । "हो गया । वकील साब ।" हरी की आवाज़ ने मेरे अतीत की यादों के क्रम को तोड़ दिया। "सब हो गया सर । अब मैं चलता हूँ ।" हरी के जाने के बाद मैंने दरवाजा बंद किया और फिर डायरी खोल ली। पर डायरी के आगे के सारे पन्ने बिल्कुल खाली थे। शायद यहीं सब ख़त्म हो गया था । अगर कुछ बचा था तो सिर्फ डायरी । और इस तरह मेरे दिल में जज्बात , और डायरी में अल्फाज। दोनों हमेशा के लिए दफन हो कर रह गये ।