Saturday, 22 February 2020

सुखिया भाग 2


                                            सुखिया भाग 2


वो बड़े ही भारी मन से पाँव उठा रहा था। उसका मन ही नही कर रहा था जाने का। पर बाई उसे जबर्दस्ती ले जा रही थी। धूप काफ़ी चढ़ आई थी। सुखिया के माथे पर पसीने की बूंदें गर्मी की वजह से कम; परेशानी की वजह से ज्यादा थीं। आज बाई सुखिया का दाखिला गांव की पाठशाला में करवाने जा रही थी। और ये सुखिया के लिए बड़े ही सकंट की घड़ी थी।
"बाई। तुम बापू को समझाती क्यों नहीं? मैं पढ़कर क्या करूँगा?"
"तू अनपढ़ रह के भी क्या करेगा?" बाई ने सवाल का जवाब सवाल से ही दिया।
"मैं खेत में बापू की मदद करूँगा। तुम्हारे काम में भी मदद करूँगा। बाई...अगर मैं पाठशाला में जाऊँगा तो तुम्हारे साथ पानी लेने कौन जाएगा? बापू की रोटी देने खेत कौन जाएगा? तुम अकेली हो जाओगी बाई।" सुखिया बातें बनाने में तो माहिर था, पर आज उसकी दाल गल्ति नज़र नही आ रही थी।
"तू मेरी फिक्र ना कर। मेरा क्या है मैं तो पराया धन हूँ। बापू मेरा ब्याह कर देगा, तो मैं तो चली जाऊँगी।"
"तुम कहाँ चली जाओगी बाई?" सुखिया ने बड़े आश्चर्य से पूछा।
"अपने घर...और कहाँ?" बाई ने उत्तर दिया।
"तो क्या बापू का घर तुम्हारा नहीं है? और ये पराया धन क्या होता है?"
"बेटी पराई होती है। वो ब्याह के बाद दूसरे घर चली जाती है।"
"बापू मेरा ब्याह कर देगा तो क्या मैं भी चला जाऊंगा?" सुखिया के मासूम सवाल में बड़ा आश्चर्य था।
"हाहाहा। बावळे। छोरे थोड़े ही जाते हैं पराए घर। बेटियां होती है पराई।" बाई ने सुखिया को समझाने का पूरा प्रयत्न किया, पर सुखिया इतनी जल्दी कहाँ संतुष्ट होने वाला था।
"मैं तुम्हे नही जाने दूँगा बाई।"
"अरे! ये तो दुनियां की रीत है बावळे। तू इसे कैसे बदलेगा?" बाई मन ही मन उसके मन की बेचैनी महसूस कर रही थी।
"चल। अब चुप हो जा। पाठशाला आ गई। और हाँ, ज्यादा बोलना मत। कहीं ऐसा ना हो कि वहाँ भी सवाल जवाब शुरू कर दे।  ना ही शरारत करना, नहीं तो कान खींच लूंगी तेरे।" बाई ने अपने हिसाब से सुखिया को पूरी तरह समझा दिया था, पर सुखिया इस पर कितना अमल करेगा ये तो वो ही जानता था। वे दोनों पाठशाला पहुँच गए। "राम राम गुरुजी।" बाई ने मास्टर जी का अभिवादन किया। "मैं मदनां की छोरी... और ये मेरा भाई सुखिया है। बापू ने बोला है इसका दाखिला पाठशाला में करवाने का।" बाई ने मास्टर जी को बताया।
"पाठशाला में दाखिला तो हो जाएगा बाई पर......." मास्टर जी बीच में ही अपनी बात पर अटक गए।
"पर...क्या गुरुजी?" बाई ने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
"बाई तुम्हे तो पता है इस स्कूल में तुम्हारी जात का कोई नहीं पढ़ता....इसलिए; सुखिया को अपना पानी और टाट (बैठने के लिए बिछाने की दरी) घर से ही लानी होगी।" मास्टर जी ने बाई से झिझकते हुए कहा।
"कोई बात नहीं गुरुजी। मैं खुद इसके लिए टाट और पानी ला दिया करूंगी.... बस सुखिया पढ़-लिख ले।" बाई ने मास्टर जी को आश्वस्त किया। सुखिया उन दोनों की बातें बड़ी ध्यान से सुन रहा था। आखिर सुखिया था चुप रहता भी तो कब तक।
"गुरुजी....आप तो बहुत पढ़े हो....एक बात बताइए। बाई कह रही है कि वो परायाधन है। मैं नहीं हूँ... बापू जब बाई का ब्याह कर देंगे तो वो अपने घर चली जायेगी। ऐसा क्यों?"
"बेटी पराई होती है, बेटा नहीं। क्योंकि ये दुनियां की रीत है। इसे बदला नहीं जा सकता।" मास्टर जी ने सुखिया के सवाल का जवाब दिया, पर मास्टर जी को क्या पता था कि अब उनपर सवालों की बारिश होने वाली है।
"गुरुजी। मैं यहाँ इस पाठशाला में पानी क्यों नहीं पी सकता?......और घर से टाट क्यों लाऊं?.....यहाँ तो बहुत सारी टाट है।"
"सुखिया। तू नहीं समझेगा। बाई को पता है, तू नीच जात है। अगर तू यहाँ का पानी पीयेगा और इन बच्चों के साथ बैठेगा  तो बाकी के बच्चे अपनें घर पर मेरी शिकायत कर देंगे। मास्टरजी सुखिया को समझाने में जुटे थे, पर सुखिया मास्टर जी को समझाने का मन बना चुका था।
"तो मैं कब बैठ पाऊँगा इनके साथ गुरुजी?"
"शायद.... कभी नहीं। क्योंकि ये दुनियां की रीत है।"
"रीत बदली नहीं जा सकती क्या गुरु जी?"
"सदियों से चली आने वाली रीत कभी नहीं बदलती सुखिया।"
"पढ़ लिखकर भी नहीं?"
"शायद..... नहीं।" गुरुजी के शब्दों में बेबसी झलक रही थी। सुखिया ने एक नज़र बाई की तरफ देखा, फिर घर की और भाग खड़ा हुआ।
"सुखिया........सुखिया....... कहाँ जा रहा है?.......रुक।"  बाई उसे आवाज़ लगती रही। सुखिया थोड़ा रुका और पीछे मुड़कर बोला। "घर आ जाओ बाई। अगर पढ़लिख कर भी रीत ही नहीं बदली जा सकती तो फिर गुरुजी की तरह पढ़ने का क्या फ़ायदा? मैं ऐसे ही ठीक हूँ।" और फिर तेज़ कदमों से दौड़ने लगा। बाई भी सुखिया को पकड़ने तेज़ी से दौड़ी, पर सुखिया कहाँ हाथ आने वाला था। वो अपने कदमों से उड़ती हुई धूल में जल्द ही बाई की आँखों से औझल हो गया।◆◆◆◆◆
सुनील पंवार एडवोकेट