Saturday, 22 February 2020

वो रात

                                  वो रात

आज फिर मैं समय से पहले ही पहुंच गया। हर बार ऐसा ही हुआ है मेरे साथ। हो भी क्यों ना! आखिर महीने में एक बार ही तो मिल पाता हूँ उससे। उसकी गहरी नीली आँखें,हज़ारों सवालों का समंदर समाए हुए थीं। जबसे मेरी ज़िंदगी मे आई मुझे लगा जैसे मैं उसके बिना बहुत अधूरा था, शायद उसके आने से कुछ मकसद मिला हो ज़िन्दगी को।
अभी भी तीस मिनट बाकी थे, सो मैंने गाड़ी में ही बैठकर उसका इंतजार करना मुनासिब समझा।
काले बादलों ने आसमान को घेरना शुरू कर दिया था, हवाएं भी तेज़ हो गई थी, ऐसा लग रहा था जैसे आज फिर तूफ़ान आने वाला था। मैंने गाड़ी अन्दर से लॉक कर ली और सीट की पुश्त पर अपना सिर टिका दिया।
मेरा एक एक पल बरस के समान गुज़र रहा था, मैं बस बेताब था की कब उसका मासूम खूबसूरत चेहरा मेरी आँखों के सामने आये। आज मुझे उसके साथ बाहर जाना है, पूरे दिन एक साथ रहना है, मैं सोचकर ही उत्साहित हो रहा था। मैं आसमान में मंडराते घने बादलों की ओर देख रहा था जो हवाओं के साथ बहते ही जा रहे थे। बहते हुए समय की धार में मैं भी ना जाने कब बीते समय के भँवर में खो गया पता ही नहीं चला।
 सात साल बीत चुके थे उस भयानक रात को। मैं ऑफिस से घर के लिए देरी से चला था। बरसात ने मेरी रफ़्तार धींमी कर दी, मुझे पहले ही बहुत देर हो चुकी थी इसलिए ट्रैफिक से बचने के लिए मैंने शॉर्टकट ले लिया, ये रास्ता सुनसान जरूर था पर ट्रैफिक की परेशानी बिल्कुल नहीं थी। आसमान में चमकती बिजली जैसे धरती से आलिंगन को बेसब्र थी। सुनसान रास्ता और अंधेरी रात ने माहौल डरावना बना दिया था, मैं धीरे धीरे आगे बढ़ रहा था कि अचानक एक कुत्तों का झुंड बीच रास्ते आ गया। मैंने गाड़ी रोक दी। कुत्तों का झुण्ड एक बक्से के लिए लड़ रहा था जिसे वो घसीटते हुए सड़क पर ले आये थे और जो मेरे सामने सड़क के बीचों बीच पड़ा था जिसे मैं साफ साफ देख पा रहा था।
मैंने कई बार हॉर्न दिया पर वो हटने को तैयार नहीं थे। मैं गाड़ी से उतरा और कुतों को तेज आवाज़ में दुत्कारते हुए उनकी ओर बढ़ा, मुझे अपनी ओर बढ़ते हुए देख वो इधर उधर भागने लगे। मैंने बीच रास्ते पड़े बक्से को सड़क के एक तरफ अपने पैर से खिसका दिया। रास्ता साफ देख मैं अपनी गाड़ी की ओर बढ़ा ही था कि अचानक एक आवाज़ ने मेरे बढ़ते कदमो को रोक दिया। मैं ठिठक गया और मुड़ कर पीछे देखने लगा। "बच्चे के रोने की आवाज़?... यहाँ....?" मैं मन ही मन बुदबुदाया। मैं फिर गाड़ी की ओर बढ़ने लगा, बच्चे के रोने की आवाज़ और भी तेज़ हो गई। मैंने सड़क के एक तरफ पड़े बक्से  की ओर देखा जिसे अभी अभी मैंने अपनें पैरों से धकेला था। मैं सहमें हुए कदमों से बक्से की ओर बढ़ने लगा, मैंने बक्से को उठाया और उसे गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी में ले आया। मैंने जैसे ही बक्से को खोला मेरी आँखें मारे विश्मय के फट पड़ी। "हे... ईश्वर!...ये क्या?" मैंने इतना भयानक मंजर कभी नही देखा। एक जीवित बच्चा, जिसे देखने मात्र से ही पता चल रहा था कि उसका जन्म चंद ही घण्टों पहले हुआ था। "ये क्या?... कोई इतना बेरहम कैसे हो सकता है?"
मैंने उस मासूम को उठाया और गाड़ी में ले आया। मैंने सीट पर लगे तौलिए से उसे अच्छी तरह लपेट लिया और हीटर भी ऑन कर दिया ताकि उसे ठंड से राहत मिल सके। मुझे कुछ भी सूझ नही रहा था ऐसा लग रहा था जैसे मैं मस्तिष्कविहीन हूँ। मैंने डैशबोर्ड पर रखा फोन उठाया और पुलिस को फोन लगा दिया। मैंने पुलिस को सूचना देने के बाद गाड़ी अस्पताल की ओर दौड़ा दी। उस मासूम की किलकारियां मुझे बहुत इरिटेट कर रही थीं। कुछ ही दूर पहुचने पर हीटर की गर्मी से उसे कुछ राहत मिली और वो शान्त हो गया। मुझे न जाने क्यों उसकी परवाह हो रही थी, उसका शान्त होना मुझे और भी परेशानी में डाल गया। मैंने उसे देखा सांसे चल रही थीं तो कुछ सुकून मिला। अस्पताल तो जैसे मीलों दूर हो गया था। मौसम भी दुश्मन बना हुआ था उस मासूम का। रेंगते रेंगते आखिरकार हम अस्पताल पहुंच ही गए। मैं उसे उठाये इमरजेंसी वार्ड की ओर दौड़ा। सबसे सुकून वाली बात ये थी कि अस्पताल के स्टॉफ ने खूब मदद की, जिससे उस मासूम का उपचार शुरू हो सका। कुछ ही देर में पुलिस भी आ पहुंची। तीन पुलिस कांस्टेबल के साथ एक लम्बा चौड़ा, बड़ी बड़ी मूछों वाला इंस्पेक्टर मेरे सामने प्रकट हुआ, देखने में वो किसी दैत्य से कम नहीं था। मैं उसे देखकर थोड़ा सहम गया। "तुमने ही कॉल किया था?" उसने गुटका चबाते हुए सवाल किया।
"जी" मैं बस इतना ही कह पाया। उसने मुझे बैठने का इशारा किया। मैं बैठ गया तो उसने फिर मुझे बोलने का इशारा किया। मैं उसके इशारे को समझ गया और सारी घटना उसे बता दी। वो शांत दैत्य की तरह मेरी बात को सुन रहा था, मेरी बात पूरी होने पर उसने चुप्पी तोड़ी।
"तो तुम क्या चाहते हो?"
"मैं कुछ समझा नहीं सर!"
"देखो बेटा... ऐसा है.. तुम सच बोल रहे हो हम कैसे मान लें? हो सकता है ये कुकर्म तुम्हारा ही हो।"
"ये आप क्या बोल रहे हैं सर? आप... मुझपर...."
उसने मुझे बीच में ही चुप रहने का इशारा किया, मैं सहम गया।
"कौन विश्वास करेगा? तुम्हारे जैसे लौंडों से रोज का काम पड़ता है हमें।"
"सर आप चाहें तो मेरा डीएनए सेंपल ले सकतें है। मैं शादीशुदा हूँ...मेरे बच्चे भी हैं सर।"
"ये सब लम्बी प्रक्रिया है बेटे। ज्यादा हीरोगिरी नहीं चलेगी। इसके जन्मदाताओं ने जब इसको मरने के लिए डाल दिया तो तू किस नाते इसे यहाँ लाया? हम सब समझते है.. पहले एन्जॉय करते हो फिर अपना पाप पुलिस के मत्थे मार देते हो।" वो मुझपर इल्ज़ाम पर इल्ज़ाम लगाये जा रहा था और मैं सिर्फ सुन रहा था, मुझे अपनी गलती पर बहुत पछतावा हो रहा था। मैं उस पुलिसवाले  से डरा हुआ था। मुझे लगा जैसे मैं बेवजह फंस गया हूँ। मैं कुछ बोल पाता उससे पहले ही अधेड़ उम्र की नर्स एक फ़ाइल लेकर मेरी ओर बढ़ी।
"यहाँ साइन कर दीजिए सर।" उसका लहज़ा बड़ा नम्र था। "किसलिए?" मैंने आश्चर्य से पूछा।
"सर! बच्ची की हालत बहुत नाज़ुक है, इसलिए अंडरटेकिंग फॉर्म भरना होगा।"
"क्या वो बच्ची है?" मैंने पूछ लिया।
"जी।"
"लेकिन.... मैं.." मैंने अपनी बात बीच में ही रोक दी, वो दैत्य मेरी तरफ घूर घूर कर देख रहा था। मैं उसका इशारा साफ़तौर पर समझ गया और फ़ाइल में साइन करने लगा। "शुक्रिया सर!" उसने फ़ाइल ली और आगे बढ़ गई। "अब तुम अपना नाम पता बताओ और फिर चाहो तो घर जा सकते हो।" उस दैत्य समान आदमी का मैं गुलाम सा बन गया था, वो जो भी मुझे आदेश दे रहा था मैं उस काम को किये जा रहा था। अपनी औपचारिकता मात्र पूरी करने के बाद वो अपने साथियों के साथ अस्पताल से निकल गया। मैं निढ़ाल सा वहीं बैठा रहा, रात बहुत हो चुकी थी, बरसात भी मंद पड़ चुकी थी। मैं अपनी जगह से उठा और बाहर जाने के लिए चलने ही वाला था कि एक आवाज़ ने मुझे रोक दिया।
"सर.....!" मैंने पीछे मुड़कर देखा, अधेड़ उम्र की वही नर्स मेरे सामने थी। मुझे लगा जैसे वो मुझसे कोई सवाल करेगी उससे पहले ही मैं बोल पड़ा।
"मैंने कुछ नहीं किया,... मेरा यकीन करो।"
"जानती हूँ।" वो बड़े ही विनम्र लहज़े में मुझसे बात कर रही थी। उसने फिर बोलना शुरू किया।
"जानती हूँ सर आपने कुछ नहीं किया। पर आपने बहुत कुछ किया है।"
"जी... मैं कुछ समझा नहीं!"
उसने हल्की सी मुस्कान बिखेरी और बोली।
"आपने कुछ गलत नही किया सर! ईश्वर पर भरोसा रखिये,  किसी दूसरे का पाप आपका पुण्य बन गया है। घर जाइए सर!...शुभरात्रि।" वो मुड़ी और वार्ड की तरफ बढ़ गई।
रात के दो बज चुके थे, मैं घबराया हुआ सा घर मे घुसा। सब गहरी नींद में सो रहे थे तो मैं भी चुपचाप बिस्तर में घुस गया।
"बहुत देर कर दी!.. तीन घण्टे लग गए घर पहुंचने में!"  वाणी बिना आँखे खोले ही मुझसे बात कर रही थी। "हाँ...देर हो गई.. अस्पताल में।" अस्पताल का नाम लेते ही उसने आँखे खोली और बोली "क्या हुआ?...अस्पताल क्यो?"
मैंने उसे जो भी घटित हुआ वो सब बताया। इसके बदले उसने सिर्फ एक ही बात कही। "बहुत बुरा हुआ।" उसने गहरी सांस छोड़ी और करवट बदल ली। मैं कुछ देर चुप रहा फिर धीरे से बोला। "वाणी!..क्या हम उस बच्ची को घर ले आयें?"
वो मेरी ओर पलटी और बोली। " पागल हो? खुद के बच्चे तो संभलते नहीं और चले हो दुसरो के बच्चे पालने.... सो जाओ।" उसका सीधा सपाट जवाब सुनकर मुझसे हिम्मत नहीं हुई दोबारा बात करने की। मैं करवट बदल कर सो गया पर नींद मुझसे कोसों दूर थीं। आज मैंने दो स्त्री रूप देखे, एक वो जिसने एक मासूम को जन्म दिया और मरने को छोड़ दिया और दूसरी, वो जो खुद एक माँ होकर भी मासूम का दर्द नही समझ पा रही थीं, पर मेरे अंदर छुपी नारी शायद ये महसूस कर रही थी। मैंने रात जैसे तैसे गुज़ारी और सुबह ऑफिस जाने से पहले अस्पताल पहुंच गया। मैं उस अधेड़ महिला को ढूंढ रहा था कि सहसा ही वो मेरे सामने आ गई। "वो नहीं मानी ना?" उसने मुझसे पूछा।
"कौन?" मैंने आश्चर्य से पूछा। "आपकी पत्नी।"
उसके चेहरे पर मुस्कान थी, मैं उससे झूठ नहीं बोल पाया और हामी में गर्दन हिला दी। वो मेरे नज़दीक आयी और बोली। "अक्सर ऐसा ही होता है सर। आप चाहें तो मैं कुछ महिलाओं को जानती हूँ जो एक संस्था चलाती है आप चाहें तो उनसे इस मासूम के बारे में बात कर सकतें है।" मुझे उसकी बात ज्यादा बेहतर लगी। मैंने उस महिला की मदद से एक संस्था से सम्पर्क किया और अस्पताल से छुट्टी मिलने के बाद एक सप्ताह में उसे वहाँ दाखिला दिला दिया। मैं उस बरसाती रात को कभी नही भूल पाया, मैंने उसका नाम "बरखा" रखा। हर महीने मैं उससे मिलने यहाँ आता हूँ, वो मुझे "सर" कहती है, मैं आज भी हमारे रिश्ते की पहचान नहीं कर पाया।
गाड़ी के शीशे पर दस्तक ने मेरी यादों के चक्र को तोड़ दिया। मैंने देखा वो मेरे सामने खड़ी थी, समंदर जैसी नीली आँखों वाली। मैंने दरवाज़ा खोला तो वो अन्दर आ गई। मैंने उसे बाहों में लिया और कस कर सीने से लगा लिया। मैं उससे अपने से दूर नही करना चाहता था।
"चलें.... सर!" उसने मुस्कुराते हुए अपनी मख़मली आवाज़ में कहा।
"जरूर।" मैं मुस्कुराया और फिर एक अनजान दिशा की तरफ गाड़ी दौड़ा दी।।■■■■■■


सुनील पंवार