छँटता कोहरा
पटना से राँची जाने वाली ट्रैन ज्योंही स्टेशन पर रुकी, यात्रियों की भीड़ इस कदर उमड़ पड़ी जैसे सारा शहर आज ही पटना को अलविदा कहने वाला हो। मीरा ने बच्चों के साथ अपना सामान एसी कोच में रखवाया तब जाकर उसे सुकून की साँस आई। एक तो गर्मी और ऊपर से लोगों की भीड़ ने तो जैसे वातावरण में आग ही लगा दी थी। ट्रैन चलने में अभी समय था। मीरा ने कोच में बैठे अपने सहयात्रियों की और नज़र दौड़ाना शुरू कर दिया। आख़िर ये जरूरी भी है कि आप इतना लंबा सफर तय करें तो आपके सहयात्रियों को जानना आपके लिए बेहद जरूरी है।
ट्रैन ने पटरी पर धीरे-धीरे रेंगना शुरू कर दिया था। सभी यात्रियों ने अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लिया। मीरा भी अपनी बर्थ पर आराम से बैठ गई। अचानक उसकी नज़र बगल वाली बर्थ पर पड़ी,तो देखा एक साधारण सी शक्ल सूरत वाली साँवली सी अधेड़ उम्र की महिला, जो देखने से ही असभ्य लग रही थी। अस्त व्यस्त साड़ी, बिखरे हुए बाल और चौकड़ी मारकर सीट पर बैठना तो उसकी फूहड़ता में चार चाँद लगा रहा था। महिलाओं वाली नज़ाकत तो उसमें बिल्कुल भी नहीं थीं। ऐसा लगा जैसे कोई जनरल डिब्बे की सवारी गलती से एसी कोच में चढ़ गई हो।
ट्रैन ने अब रफ़्तार पकड़ ली थी और पूरी ट्रैन धीरे-धीरे शांत होती जा रही थीं। मीरा का ध्यान उसी महिला पर केंद्रित था पर उसे इस बात की ख़बर कहाँ थी कि कोई उसको न केवल घूर घूर देख रही थी, बल्कि न जाने उसके बारे में क्या क्या राय भी कायम कर रही थी। अपने ही आप मे मग्न उस महिला ने अपनी बर्थ का पर्दा लगाया और बत्ती गुल कर दी।
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सुबह के पाँच बज रहे थे। "चाय...! गर्म चाय..!" की आवाज़ ने मीरा की नींद में ख़लल डाल दी थी। वो उठकर बैठ गई।
"चाय..!" एक तेज़ आवाज़ ने चाय वाले की रफ़्तार में बाधा डाल दी थी, वो ठिठक गया और आवाज़ की दिशा में मुड़ गया। उसकी आवाज़ में बिल्कुल भी भद्रता नही थी। इतनी जोर से आवाज़ सुनकर कर मीरा ने अपनी नज़र बगल वाली बर्थ की ओर दौड़ाई। मीरा को बड़ा अजीब लग रहा था, भला इतनी ऊँची आवाज़ में भी कोई बोलता है क्या!
राँची पहुंचने में अभी तीन घण्टे का सफ़र शेष था। सूर्य ने अपने आने की दस्तक दे दी थी। बच्चे भी तब तक जाग चुके थे और वो मीरा के पास ही आकर बैठ गए। मीरा ने सबके लिए चाय ले ली और चुस्कियों के साथ खिड़की से बाहर के नज़ारे का आनंद लेना शुरू कर दिया। बीच बीच में वो उस महिला की बर्थ की ओर अपनी निगाहें छोड़ती रहती। छंटती भौर ने मौसम की रंगत ही बदल दी थी। मीरा बच्चों के साथ बातों में मसरूफ़ हो गई।
वो अपनी बातों में इतनी मशरूफ़ थी कि उसे पता ही नही चला कि कब अचानक बातों-बातों में उसके मुँह से किसी बात को लेकर एक शब्द निकल गया, "शायद..!"
"शा..... यद!" एक अजनबी आवाज़ ने मीरा का ध्यान इस क़दर आकर्षित किया कि वो पीछे मुड़कर देखे बिना ख़ुद को रोक नहीं पायी। देखा तो पर्दे से झाँकती हुई साँवली सी सूरत.. और उस पर बिखरी मुस्कान ने मीरा के मन को सुकूँन सा पहुंचाया। उसकी जुबान से निकले उस एक शब्द में इतनी रूमानियत थी कि वो मीरा के हृदय छू गई। वही फूहड़ सी दिखने वाली महिला मीरा को निहारे जा रही थी। उसने पर्दा हटाया और मीरा के सामने वाली बर्थ पर बैठ गई। व्यवस्थित ढंग से पहनी साड़ी, सलीके से बने हुए बाल और भाषा में इतनी नम्रता लिए उसने मीरा को चौंका ही डाला। वो कल रात से बिल्कुल विपरीत नज़र आ रही थीं। मीरा ने भी उसका स्वागत एक मीठी सी मुस्कान से किया। दोनों में बातचीत शुरू हुई और देखते ही देखते वो बातों में मशरूफ़ हो गईं।
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ट्रेन की रफ़्तार धीमी पड़ने लगी थी और तेज धूप भी चढ़ आई थी। राँची स्टेशन पहुँचने में अभी दस मिनिट शेष थे। उस महिला ने अपनी बेग से एक नीले कवर की पतली सी किताब निकाली और उसे मीरा की ओर बढ़ा दी।
"ये क्या है?" मीरा ने उत्सुकता से पूछा।
"कहानी संग्रह है। लघुकथाएँ! शायद आपको पढ़कर अच्छा लगे।" उसने मुस्कान बिखेरते हुए उत्तर दिया।
"इसका लेखक कौन है?" मीरा ने फिर सवाल किया।
"हम्म! इसका लेखक आपके सामने विराजमान है।" उसने लम्बी साँस छोड़ी। "इसमें मेरे फोन नम्बर भी है, अगर कभी स्मरण हो आये तो कॉल कर लीजिएगा।"
उसने अपना समान उठाया और दरवाज़े की तरफ चल पड़ी। मीरा ने उससे विदा लेने के बाद उस किताब को पलट कर देखा। "डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र!" जीवन परिचय पढ़ा तो मीरा दंग रह गई। जिसे वो देहाती, असभ्य और अनपढ़ समझ रही थी वो जानीमानी लेखिका और उच्च शिक्षा प्राप्त एक विदुषी थी। जो एक उच्च पद पर कार्यरत थी। मीरा ने किताब अपनी बेग में रखी और घर की तरफ चल पड़ी।।
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तीन साल बीत गए पर मीरा उस किताब को नहीं पढ़ पायी। आख़िर महिलाओं को इतनी फ़ुर्सत ही कहाँ कि चैन से बैठकर कहानियां पढ़ सके। वो जब भी अलमारी की सफाई करती, तो वो नीले कवर में लिपटी उसके सामने आ ही जाती। आज भी वो अचानक मीरा के सामने आ गई थी। मीरा भी आज फुर्सत से उसे पढ़ने का मन बना चुकी थी। एक के बाद एक कहानी वो पढ़ती गई, न समय का पता चला और न ख़ुद का। सरल भाषा में लिखी छोटी- छोटी कहानियों ने उसे बहुत प्रभावित किया। शाम के चार बजे चुक थे। मीरा डॉ0 मिथिलेश कुमारी से बात करने के लिए किताब में छपे फोन नम्बर को डायल करने लगी।
"ट्रिन.. ट्रिन" की आवाज़ ने उसे सुनिश्चि कर दिया कि सम्पर्क सध चुका है।
"हेलो..." सामने से किसी पुरुष की आवाज़ उभरी।
"हेलो...कौन?" मीरा ने पूछा।
जी। मैं आयुष्मान नीलाभ बोल रहा हूँ, आपको किससे बात करनी है?"
"मैं अहमदाबाद से मीरा जगनानी बोल रही हूँ। मुझे
डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र से बात करनी है।"
"आई एम सॉरी मेम! शायद आपको पता नहीं कि वो अब इस दुनियां में नहीं है। उन्हें गुज़रे तीन साल हो चुके हैं।" उसने बताया।
मीरा को ये सुनकर बहुत शौक़ लगा। अपने आप को संभाल कर मीरा ने फिर से बोलना शुरू किया।
"मेरी मुलाक़ात उनसे एक ट्रेन में हुई थी, उन्होंने मुझे अपनी पुस्तक भेंट की थी। मुझे माफ़ करना, मुझे पता नहीं था कि...!" वो बीच में ही रुक गई।
"कोई बात नही।" उसने कहा और फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।
मीरा ने भारी मन से फोन रखा और उस किताब को अपनी गौद में रखकर बच्चे की तरह सहलाने लगी। काश! उसने वो किताब समय रहते पढ़ ली होती तो शायद एक बार उनसे बात हो गई होती। ख़ैर! 'छँटता कोहरा' शीर्षक तो अच्छा था, पर उस दिन वाली ट्रेन की यादों का छाया कोहरा तो आज छँटने का नाम ही नही ले रहा था।
(ये कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। जैसा कि मुझे श्रीमती मीरा जगनानी अहमदाबाद ने बताया। स्व0 डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र को समर्पित।)
सुनील पंवार
पटना से राँची जाने वाली ट्रैन ज्योंही स्टेशन पर रुकी, यात्रियों की भीड़ इस कदर उमड़ पड़ी जैसे सारा शहर आज ही पटना को अलविदा कहने वाला हो। मीरा ने बच्चों के साथ अपना सामान एसी कोच में रखवाया तब जाकर उसे सुकून की साँस आई। एक तो गर्मी और ऊपर से लोगों की भीड़ ने तो जैसे वातावरण में आग ही लगा दी थी। ट्रैन चलने में अभी समय था। मीरा ने कोच में बैठे अपने सहयात्रियों की और नज़र दौड़ाना शुरू कर दिया। आख़िर ये जरूरी भी है कि आप इतना लंबा सफर तय करें तो आपके सहयात्रियों को जानना आपके लिए बेहद जरूरी है।
ट्रैन ने पटरी पर धीरे-धीरे रेंगना शुरू कर दिया था। सभी यात्रियों ने अपना-अपना स्थान ग्रहण कर लिया। मीरा भी अपनी बर्थ पर आराम से बैठ गई। अचानक उसकी नज़र बगल वाली बर्थ पर पड़ी,तो देखा एक साधारण सी शक्ल सूरत वाली साँवली सी अधेड़ उम्र की महिला, जो देखने से ही असभ्य लग रही थी। अस्त व्यस्त साड़ी, बिखरे हुए बाल और चौकड़ी मारकर सीट पर बैठना तो उसकी फूहड़ता में चार चाँद लगा रहा था। महिलाओं वाली नज़ाकत तो उसमें बिल्कुल भी नहीं थीं। ऐसा लगा जैसे कोई जनरल डिब्बे की सवारी गलती से एसी कोच में चढ़ गई हो।
ट्रैन ने अब रफ़्तार पकड़ ली थी और पूरी ट्रैन धीरे-धीरे शांत होती जा रही थीं। मीरा का ध्यान उसी महिला पर केंद्रित था पर उसे इस बात की ख़बर कहाँ थी कि कोई उसको न केवल घूर घूर देख रही थी, बल्कि न जाने उसके बारे में क्या क्या राय भी कायम कर रही थी। अपने ही आप मे मग्न उस महिला ने अपनी बर्थ का पर्दा लगाया और बत्ती गुल कर दी।
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सुबह के पाँच बज रहे थे। "चाय...! गर्म चाय..!" की आवाज़ ने मीरा की नींद में ख़लल डाल दी थी। वो उठकर बैठ गई।
"चाय..!" एक तेज़ आवाज़ ने चाय वाले की रफ़्तार में बाधा डाल दी थी, वो ठिठक गया और आवाज़ की दिशा में मुड़ गया। उसकी आवाज़ में बिल्कुल भी भद्रता नही थी। इतनी जोर से आवाज़ सुनकर कर मीरा ने अपनी नज़र बगल वाली बर्थ की ओर दौड़ाई। मीरा को बड़ा अजीब लग रहा था, भला इतनी ऊँची आवाज़ में भी कोई बोलता है क्या!
राँची पहुंचने में अभी तीन घण्टे का सफ़र शेष था। सूर्य ने अपने आने की दस्तक दे दी थी। बच्चे भी तब तक जाग चुके थे और वो मीरा के पास ही आकर बैठ गए। मीरा ने सबके लिए चाय ले ली और चुस्कियों के साथ खिड़की से बाहर के नज़ारे का आनंद लेना शुरू कर दिया। बीच बीच में वो उस महिला की बर्थ की ओर अपनी निगाहें छोड़ती रहती। छंटती भौर ने मौसम की रंगत ही बदल दी थी। मीरा बच्चों के साथ बातों में मसरूफ़ हो गई।
वो अपनी बातों में इतनी मशरूफ़ थी कि उसे पता ही नही चला कि कब अचानक बातों-बातों में उसके मुँह से किसी बात को लेकर एक शब्द निकल गया, "शायद..!"
"शा..... यद!" एक अजनबी आवाज़ ने मीरा का ध्यान इस क़दर आकर्षित किया कि वो पीछे मुड़कर देखे बिना ख़ुद को रोक नहीं पायी। देखा तो पर्दे से झाँकती हुई साँवली सी सूरत.. और उस पर बिखरी मुस्कान ने मीरा के मन को सुकूँन सा पहुंचाया। उसकी जुबान से निकले उस एक शब्द में इतनी रूमानियत थी कि वो मीरा के हृदय छू गई। वही फूहड़ सी दिखने वाली महिला मीरा को निहारे जा रही थी। उसने पर्दा हटाया और मीरा के सामने वाली बर्थ पर बैठ गई। व्यवस्थित ढंग से पहनी साड़ी, सलीके से बने हुए बाल और भाषा में इतनी नम्रता लिए उसने मीरा को चौंका ही डाला। वो कल रात से बिल्कुल विपरीत नज़र आ रही थीं। मीरा ने भी उसका स्वागत एक मीठी सी मुस्कान से किया। दोनों में बातचीत शुरू हुई और देखते ही देखते वो बातों में मशरूफ़ हो गईं।
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ट्रेन की रफ़्तार धीमी पड़ने लगी थी और तेज धूप भी चढ़ आई थी। राँची स्टेशन पहुँचने में अभी दस मिनिट शेष थे। उस महिला ने अपनी बेग से एक नीले कवर की पतली सी किताब निकाली और उसे मीरा की ओर बढ़ा दी।
"ये क्या है?" मीरा ने उत्सुकता से पूछा।
"कहानी संग्रह है। लघुकथाएँ! शायद आपको पढ़कर अच्छा लगे।" उसने मुस्कान बिखेरते हुए उत्तर दिया।
"इसका लेखक कौन है?" मीरा ने फिर सवाल किया।
"हम्म! इसका लेखक आपके सामने विराजमान है।" उसने लम्बी साँस छोड़ी। "इसमें मेरे फोन नम्बर भी है, अगर कभी स्मरण हो आये तो कॉल कर लीजिएगा।"
उसने अपना समान उठाया और दरवाज़े की तरफ चल पड़ी। मीरा ने उससे विदा लेने के बाद उस किताब को पलट कर देखा। "डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र!" जीवन परिचय पढ़ा तो मीरा दंग रह गई। जिसे वो देहाती, असभ्य और अनपढ़ समझ रही थी वो जानीमानी लेखिका और उच्च शिक्षा प्राप्त एक विदुषी थी। जो एक उच्च पद पर कार्यरत थी। मीरा ने किताब अपनी बेग में रखी और घर की तरफ चल पड़ी।।
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तीन साल बीत गए पर मीरा उस किताब को नहीं पढ़ पायी। आख़िर महिलाओं को इतनी फ़ुर्सत ही कहाँ कि चैन से बैठकर कहानियां पढ़ सके। वो जब भी अलमारी की सफाई करती, तो वो नीले कवर में लिपटी उसके सामने आ ही जाती। आज भी वो अचानक मीरा के सामने आ गई थी। मीरा भी आज फुर्सत से उसे पढ़ने का मन बना चुकी थी। एक के बाद एक कहानी वो पढ़ती गई, न समय का पता चला और न ख़ुद का। सरल भाषा में लिखी छोटी- छोटी कहानियों ने उसे बहुत प्रभावित किया। शाम के चार बजे चुक थे। मीरा डॉ0 मिथिलेश कुमारी से बात करने के लिए किताब में छपे फोन नम्बर को डायल करने लगी।
"ट्रिन.. ट्रिन" की आवाज़ ने उसे सुनिश्चि कर दिया कि सम्पर्क सध चुका है।
"हेलो..." सामने से किसी पुरुष की आवाज़ उभरी।
"हेलो...कौन?" मीरा ने पूछा।
जी। मैं आयुष्मान नीलाभ बोल रहा हूँ, आपको किससे बात करनी है?"
"मैं अहमदाबाद से मीरा जगनानी बोल रही हूँ। मुझे
डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र से बात करनी है।"
"आई एम सॉरी मेम! शायद आपको पता नहीं कि वो अब इस दुनियां में नहीं है। उन्हें गुज़रे तीन साल हो चुके हैं।" उसने बताया।
मीरा को ये सुनकर बहुत शौक़ लगा। अपने आप को संभाल कर मीरा ने फिर से बोलना शुरू किया।
"मेरी मुलाक़ात उनसे एक ट्रेन में हुई थी, उन्होंने मुझे अपनी पुस्तक भेंट की थी। मुझे माफ़ करना, मुझे पता नहीं था कि...!" वो बीच में ही रुक गई।
"कोई बात नही।" उसने कहा और फोन डिस्कनेक्ट कर दिया।
मीरा ने भारी मन से फोन रखा और उस किताब को अपनी गौद में रखकर बच्चे की तरह सहलाने लगी। काश! उसने वो किताब समय रहते पढ़ ली होती तो शायद एक बार उनसे बात हो गई होती। ख़ैर! 'छँटता कोहरा' शीर्षक तो अच्छा था, पर उस दिन वाली ट्रेन की यादों का छाया कोहरा तो आज छँटने का नाम ही नही ले रहा था।
(ये कहानी सच्ची घटना पर आधारित है। जैसा कि मुझे श्रीमती मीरा जगनानी अहमदाबाद ने बताया। स्व0 डॉ0 मिथिलेश कुमारी मिश्र को समर्पित।)
सुनील पंवार