एक कप चाय और तुम!
सर्द दिसम्बर और क्रिसमस की पूर्व संध्या पर मैं उसका बेसब्री से इंतजार कर रहा था। घर में इतनी खामोशी पसरी थी कि घड़ी के काँटे की आवाज़ भी मेरे अवचेतन मन में हथौड़े की तरह चोट कर रही थी। मैं बार-बार दरवाज़े की तरफ अपनी नज़रें दौड़ा रहा था। मेरा गौद में रखी मैगज़ीन के पन्नों को बार-बार पलटलना भी पढ़ने का महज़ एक बहाना ही था। साढ़े पांच बज चुके थे, दिन की रोशनी अब अंधेरे में तब्दील हो रही थी और उसकी गैरमौजूदगी की फिक्र का गुबार भी मेरे मन में उठने लगा था।
"कहाँ रह गई! इतनी देर क्यों लग गई! अब तक तो आ जाना चाहिए था उसको।" मैं अपने आप से प्रश्न पर प्रश्न कर रहा था, पर अफ़सोस कि मेरे पास कोई माकूल जवाब नहीं था उसकी गैरमौजूदगी का। मैं उठा और बालकनी में आ खड़ा हुआ,पर यहाँ से भी उसके आने का कोई भी संकेत मुझे दिखाई नहीं दिया। मैं फिर कमरे में आया और सोफ़े पर बैठ गया।
पिछले एक साल से मैं इस दिन का इंतजार कर रहा था कि वो मेरे साथ एक कप चाय शेयर करे, पर जब कभी भी मैंने उसे ऑफर किया उसने झट से नकार दिया। मैं लगभग एक साल पहले वाणी से अपने ऑफिस में मिला था और तब से ही मैं उसे पसन्द करने लगा था, पर वो थी कि मेरे दिल के हालातों से वाक़िफ़ होकर भी अनजान बनी रहती। मैं उसे कई दफ़ा कॉफ़ी, लंच और डिन्नर ऑफ़र कर चुका था,पर क्या मज़ाल जो उसने एक बार भी रेस्पॉन्स दिया हो। तीन दिन से लगातार उसके पीछे पड़े रहने के बाद उसने क्रिसमस ईव पर इस शर्त पर कि मैं उसे अपने हाथ से बनी चाय ही पिलाऊं; मेरे घर पर ही मिलना तय किया। मुझे यकीन नही था कि वो ऑफ़र एक्सेप्ट करेगी। दीवार पर टँगी घड़ी मेरा मुँह चिढ़ाती हुई धीरे-धीरे रेंग रही थी। मैं व्याकुल हो रहा था, आख़िर कोई सब्र करे भी तो कितना!
"कहीं उसने मुझसे मज़ाक तो नहीं किया था?..नहीं.. नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है। उसने कहा था वो आयेगी। तो फिर..... इतनी देर कहाँ हो गई?" मेरा बैचैन मन अपने ही सवाल जवाब के गणित में उलझ गया था।
मैंने फोन का रिसीवर कान से लगाया और ऑफिस का नम्बर डायल करने लगा।
"हेलो सर! मैं निधि बोल रही हूँ।" सामने से एक आवाज़ उभरी।
"हाँ! निधि, वाणी है क्या ऑफिस में?"
"नही सर! वो तो लंच के तुरन्त बाद निकल गई। कोई जरूरी मैसेज है क्या?"
"नही! बस यूँही। थैंक यू।" मैंने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। मेरा मन बेचैन हो रहा था कि तभी
अचानक डोरबेल बज उठी। मैं लपक कर दरवाज़े की ओर बढ़ा, मुझे लगा जैसे तनिक भी देर करना वाज़िब नही था। होंठो पर मुस्कान बिखेरे वाणी दरवाज़े खड़ी थी। वो नीली साड़ी में खूब जँच रही थी। बड़े सलीके से बँधे लम्बे घने बाल, भूरी चपल आँखे, गोरा रंग और चेहरे पर लहराती लट तो उसकी खूबसूरती पर चार चाँद लगा रही थी। मैं उसे देखकर फ्रीज़ हो गया, बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में। उसे देखकर मेरे बेचैन दिल ने कुछ सुकून महसूस किया।
"अन्दर आने का नहीं कहोगे?" उसकी सिक्कों जैसी खनकदार आवाज़ ने मेरी तन्द्रा भंग कर दी।
"ओह! सॉरी। अन्दर आओ।" मैंने दरबान की तरह उसका स्वागत किया।
उसने ज्योंही घर मे क़दम रखा, हवा के एक झोंके ने उसका स्वागत कुछ यूँ किया कि खिड़की पर लगी विंड चाइम्स को हल्के से हिला दिया और उसके मधुर संगीत ने पूरे घर में बिखरी ख़ामोशी का क़त्ल कर दिया। अब घर की रौनक ही कुछ और थी। वो मेरे बगल में ही सोफ़े पर बैठ गई।
"यकीन नहीं हो रहा तुम यहाँ हो।" मैंने बात की शुरुआत करते हुए कहा।
"क्यों?"
"जब तुमने आने में इतनी देर कर दी तो मैंने सोचा शायद तुमने मुझसे मज़ाक किया होगा।"
वो हल्की सी मुस्कुरा दी। मैं उसके सामने काफ़ी नर्वस था। क्या बात करूँ! कैसे करूँ! बस इसी उधेड़बुन में उलझा रहा। मेरे साथ वही हो रहा था कि तन्हाई में तो हाल-ए-दिल सुना दें, पर मुलाकात में तो बात भी मुक्कमल ना हो।
"मैं चाय बनाकर लाता हूँ।" मैं उठा और रसोई की ओर बढ़ गया।
वाणी भी अपनी जगह से उठी और कमरे में लगी किताबों को देखने लगी। वो घर में सजी हर चीज को बड़ी बारीकी से देख रही थी। उसने मेरी लिखी शायरी की डायरी उठाई, जो मैंने उसके लिए ही लिखी थीं के पन्ने पलेटने लगी, पर वो मेरी तरह पढ़ने का बहाना नही कर रही थी। शायद उसमें लिखे हर लफ्ज़ को वो महसूस कर रही थी।
"लीजिये! चाय बनकर तैयार है।" मैंने चाय टेबल पर रखते हुए वाणी का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास किया।
उसने डायरी टेबल पर रख दी और आकर मेरी बगल वाले सोफ़े पर बैठ गई। उसने चाय का कप उठाया और बात शुरू की।
"क्रिसमस की सब तैयारियां हो गई?"
"मुझे क्या तैयारी करनी है! हर साल की तरह ये भी गुज़र जाएगा।"
"अरे वाह! तुमने तो बहुत अच्छी चाय बनाई है। मुझे अफ़सोस है कि मैं तुम्हारा ऑफर पहले एक्सेप्ट नहीं कर पायी।" वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई और फिर कप अपने होठों से लगा लिया।
मैंने उसका शुक्रिया अदा किया और मुस्कुरा दिया। वाणी ने अपने पर्स से एक छोटा सा गिफ़्ट निकाला और मेरी तरफ बढ़ा दिया। "तुम्हारा क्रिसमस गिफ़्ट।"
"अरे! इसकी क्या जरूरत थी? क्या है इसमें?" मैंने उत्सुकता से पूछा।
"ख़ुद ही देख लो।" उसका सीधा सा जवाब सुनकर मैं गिफ़्ट से रैपर हटाने लगा। अचानक इतना प्यारा उपहार देख मैं खिल उठा। "अरे वाह! पियरी कार्डिन का पैन! ये तो बहुत खूबसूरत है!" मेरी बाँछें खिल उठी। "मुझे लगता है तुम्हारे लिए इससे बेहतर कोई गिफ़्ट नही हो सकता। अब जी भर के लिखना मेरी तारीफ़ में शे'र-ओ-शायरी।" उसने शरारत भरे लहज़े में कहा और मुस्कुरा दी। आज उसकी आँखों में बहुत शरारत थी।
"चलो तुम्हे यकीन तो हुआ कि मैं शायरी तुम्हारी ही तारीफ़ में करता हूँ।" मैं भी मुस्कुरा दिया।
चाय की चुस्कियों के साथ समय ने धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ना शुरू कर दिया और हमारी बातों ने भी।
"वाणी! इस दिन के इंतजार में मैंने एक अरसे का सफ़र तय किया है। मैंने हर पल, हर वक़्त तुम्हें महसूस किया है।" मेरे मन में भरी हसरतों ने अब अंगड़ाइयाँ लेना शुरू कर दिया था,और वो दिल के पिंजरे को तोड़कर ज़ुबा से बाहर आने को फड़फड़ा रही थीं। वाणी बस सिर्फ मुस्करा रही थी बिल्कुल मन्द-मन्द। शायद वो आज सब कुछ मेरी जुबान से ही कहलवाना चाहती थी।
बातों का सिलसिला कुछ यूँ चला की थमने का नाम ही नही ले रहा था। दीवार पर टँगी घड़ी, जो कुछ देर पहले मेरा मुँह चिड़ा रही थी अब अपनी ही भागमभाग में उलझ चुकी थी।
"कहाँ रह गई! इतनी देर क्यों लग गई! अब तक तो आ जाना चाहिए था उसको।" मैं अपने आप से प्रश्न पर प्रश्न कर रहा था, पर अफ़सोस कि मेरे पास कोई माकूल जवाब नहीं था उसकी गैरमौजूदगी का। मैं उठा और बालकनी में आ खड़ा हुआ,पर यहाँ से भी उसके आने का कोई भी संकेत मुझे दिखाई नहीं दिया। मैं फिर कमरे में आया और सोफ़े पर बैठ गया।
पिछले एक साल से मैं इस दिन का इंतजार कर रहा था कि वो मेरे साथ एक कप चाय शेयर करे, पर जब कभी भी मैंने उसे ऑफर किया उसने झट से नकार दिया। मैं लगभग एक साल पहले वाणी से अपने ऑफिस में मिला था और तब से ही मैं उसे पसन्द करने लगा था, पर वो थी कि मेरे दिल के हालातों से वाक़िफ़ होकर भी अनजान बनी रहती। मैं उसे कई दफ़ा कॉफ़ी, लंच और डिन्नर ऑफ़र कर चुका था,पर क्या मज़ाल जो उसने एक बार भी रेस्पॉन्स दिया हो। तीन दिन से लगातार उसके पीछे पड़े रहने के बाद उसने क्रिसमस ईव पर इस शर्त पर कि मैं उसे अपने हाथ से बनी चाय ही पिलाऊं; मेरे घर पर ही मिलना तय किया। मुझे यकीन नही था कि वो ऑफ़र एक्सेप्ट करेगी। दीवार पर टँगी घड़ी मेरा मुँह चिढ़ाती हुई धीरे-धीरे रेंग रही थी। मैं व्याकुल हो रहा था, आख़िर कोई सब्र करे भी तो कितना!
"कहीं उसने मुझसे मज़ाक तो नहीं किया था?..नहीं.. नहीं! ऐसा कैसे हो सकता है। उसने कहा था वो आयेगी। तो फिर..... इतनी देर कहाँ हो गई?" मेरा बैचैन मन अपने ही सवाल जवाब के गणित में उलझ गया था।
मैंने फोन का रिसीवर कान से लगाया और ऑफिस का नम्बर डायल करने लगा।
"हेलो सर! मैं निधि बोल रही हूँ।" सामने से एक आवाज़ उभरी।
"हाँ! निधि, वाणी है क्या ऑफिस में?"
"नही सर! वो तो लंच के तुरन्त बाद निकल गई। कोई जरूरी मैसेज है क्या?"
"नही! बस यूँही। थैंक यू।" मैंने फोन डिस्कनेक्ट कर दिया। मेरा मन बेचैन हो रहा था कि तभी
अचानक डोरबेल बज उठी। मैं लपक कर दरवाज़े की ओर बढ़ा, मुझे लगा जैसे तनिक भी देर करना वाज़िब नही था। होंठो पर मुस्कान बिखेरे वाणी दरवाज़े खड़ी थी। वो नीली साड़ी में खूब जँच रही थी। बड़े सलीके से बँधे लम्बे घने बाल, भूरी चपल आँखे, गोरा रंग और चेहरे पर लहराती लट तो उसकी खूबसूरती पर चार चाँद लगा रही थी। मैं उसे देखकर फ्रीज़ हो गया, बिल्कुल फ़िल्मी स्टाइल में। उसे देखकर मेरे बेचैन दिल ने कुछ सुकून महसूस किया।
"अन्दर आने का नहीं कहोगे?" उसकी सिक्कों जैसी खनकदार आवाज़ ने मेरी तन्द्रा भंग कर दी।
"ओह! सॉरी। अन्दर आओ।" मैंने दरबान की तरह उसका स्वागत किया।
उसने ज्योंही घर मे क़दम रखा, हवा के एक झोंके ने उसका स्वागत कुछ यूँ किया कि खिड़की पर लगी विंड चाइम्स को हल्के से हिला दिया और उसके मधुर संगीत ने पूरे घर में बिखरी ख़ामोशी का क़त्ल कर दिया। अब घर की रौनक ही कुछ और थी। वो मेरे बगल में ही सोफ़े पर बैठ गई।
"यकीन नहीं हो रहा तुम यहाँ हो।" मैंने बात की शुरुआत करते हुए कहा।
"क्यों?"
"जब तुमने आने में इतनी देर कर दी तो मैंने सोचा शायद तुमने मुझसे मज़ाक किया होगा।"
वो हल्की सी मुस्कुरा दी। मैं उसके सामने काफ़ी नर्वस था। क्या बात करूँ! कैसे करूँ! बस इसी उधेड़बुन में उलझा रहा। मेरे साथ वही हो रहा था कि तन्हाई में तो हाल-ए-दिल सुना दें, पर मुलाकात में तो बात भी मुक्कमल ना हो।
"मैं चाय बनाकर लाता हूँ।" मैं उठा और रसोई की ओर बढ़ गया।
वाणी भी अपनी जगह से उठी और कमरे में लगी किताबों को देखने लगी। वो घर में सजी हर चीज को बड़ी बारीकी से देख रही थी। उसने मेरी लिखी शायरी की डायरी उठाई, जो मैंने उसके लिए ही लिखी थीं के पन्ने पलेटने लगी, पर वो मेरी तरह पढ़ने का बहाना नही कर रही थी। शायद उसमें लिखे हर लफ्ज़ को वो महसूस कर रही थी।
"लीजिये! चाय बनकर तैयार है।" मैंने चाय टेबल पर रखते हुए वाणी का ध्यान अपनी ओर खींचने का प्रयास किया।
उसने डायरी टेबल पर रख दी और आकर मेरी बगल वाले सोफ़े पर बैठ गई। उसने चाय का कप उठाया और बात शुरू की।
"क्रिसमस की सब तैयारियां हो गई?"
"मुझे क्या तैयारी करनी है! हर साल की तरह ये भी गुज़र जाएगा।"
"अरे वाह! तुमने तो बहुत अच्छी चाय बनाई है। मुझे अफ़सोस है कि मैं तुम्हारा ऑफर पहले एक्सेप्ट नहीं कर पायी।" वो मेरी तरफ देखकर मुस्कुराई और फिर कप अपने होठों से लगा लिया।
मैंने उसका शुक्रिया अदा किया और मुस्कुरा दिया। वाणी ने अपने पर्स से एक छोटा सा गिफ़्ट निकाला और मेरी तरफ बढ़ा दिया। "तुम्हारा क्रिसमस गिफ़्ट।"
"अरे! इसकी क्या जरूरत थी? क्या है इसमें?" मैंने उत्सुकता से पूछा।
"ख़ुद ही देख लो।" उसका सीधा सा जवाब सुनकर मैं गिफ़्ट से रैपर हटाने लगा। अचानक इतना प्यारा उपहार देख मैं खिल उठा। "अरे वाह! पियरी कार्डिन का पैन! ये तो बहुत खूबसूरत है!" मेरी बाँछें खिल उठी। "मुझे लगता है तुम्हारे लिए इससे बेहतर कोई गिफ़्ट नही हो सकता। अब जी भर के लिखना मेरी तारीफ़ में शे'र-ओ-शायरी।" उसने शरारत भरे लहज़े में कहा और मुस्कुरा दी। आज उसकी आँखों में बहुत शरारत थी।
"चलो तुम्हे यकीन तो हुआ कि मैं शायरी तुम्हारी ही तारीफ़ में करता हूँ।" मैं भी मुस्कुरा दिया।
चाय की चुस्कियों के साथ समय ने धीरे-धीरे रफ़्तार पकड़ना शुरू कर दिया और हमारी बातों ने भी।
"वाणी! इस दिन के इंतजार में मैंने एक अरसे का सफ़र तय किया है। मैंने हर पल, हर वक़्त तुम्हें महसूस किया है।" मेरे मन में भरी हसरतों ने अब अंगड़ाइयाँ लेना शुरू कर दिया था,और वो दिल के पिंजरे को तोड़कर ज़ुबा से बाहर आने को फड़फड़ा रही थीं। वाणी बस सिर्फ मुस्करा रही थी बिल्कुल मन्द-मन्द। शायद वो आज सब कुछ मेरी जुबान से ही कहलवाना चाहती थी।
बातों का सिलसिला कुछ यूँ चला की थमने का नाम ही नही ले रहा था। दीवार पर टँगी घड़ी, जो कुछ देर पहले मेरा मुँह चिड़ा रही थी अब अपनी ही भागमभाग में उलझ चुकी थी।
"इस क्रिसमस को यादगार बनाने के लिए तुम्हारा बहुत शुक्रिया वाणी।"
"अरे! मैंने ऐसा कुछ भी तो नही किया जो तुम्हारा क्रिसमस यादगार बन गया! पर मैं दुआ करूँगी कि आज रात सैंटा क्लॉज़ आऐं और तुम्हारी सारी विश पूरी कर दे। वैसे तुम्हारे पास तो सब कुछ है सन्नी। तुम क्या विश माँगोंगे? क्या विश है तुम्हारी? तुम्हें क्या चाहिये?"
"मेरी विश! और मुझे क्या चाहिये?" मैंने उसकी आँखों में देखा और फिर बोलना शुरू किया।
"ह्म्म्म....! मेरी विश! अगर सेंटा मेरे पास आये तो उनसे सिर्फ एक विश माँगूँगा। सिर्फ एक।"
"वो क्या?" उसने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
मैं अपनी जगह से थोड़ा सा खिसक कर वाणी के नज़दीक गया और उसकी चपल भूरी मन्द मन्द मुस्कुराती आँखों में झाँककर धीरे से कहा।
"एक कप चाय और तुम!" मेरी बात सुनकर वो मुस्कुरा दी और अपनी दोनों पलकों को 'हाँ' के इशारे में झपका दिया,
जिसका सीधा सा मतलब था "आमीन!"
"अरे! मैंने ऐसा कुछ भी तो नही किया जो तुम्हारा क्रिसमस यादगार बन गया! पर मैं दुआ करूँगी कि आज रात सैंटा क्लॉज़ आऐं और तुम्हारी सारी विश पूरी कर दे। वैसे तुम्हारे पास तो सब कुछ है सन्नी। तुम क्या विश माँगोंगे? क्या विश है तुम्हारी? तुम्हें क्या चाहिये?"
"मेरी विश! और मुझे क्या चाहिये?" मैंने उसकी आँखों में देखा और फिर बोलना शुरू किया।
"ह्म्म्म....! मेरी विश! अगर सेंटा मेरे पास आये तो उनसे सिर्फ एक विश माँगूँगा। सिर्फ एक।"
"वो क्या?" उसने बड़ी उत्सुकता से पूछा।
मैं अपनी जगह से थोड़ा सा खिसक कर वाणी के नज़दीक गया और उसकी चपल भूरी मन्द मन्द मुस्कुराती आँखों में झाँककर धीरे से कहा।
"एक कप चाय और तुम!" मेरी बात सुनकर वो मुस्कुरा दी और अपनी दोनों पलकों को 'हाँ' के इशारे में झपका दिया,
जिसका सीधा सा मतलब था "आमीन!"
सुनील पंवार